बिना पूड़ी तले भी तो बता सकते थे- 'मंगलयान कैसे भेजें'

कोई आदमी इसलिए रिसर्च नहीं छोड़ता कि उसकी शादी हो गई है या वो बाप बन गया है. घर-परिवार वाली औरतों के लिए किसी ऐसे काम में जिंदगी खपाना ज्यादा मुश्किल है, जिसमें काम के घंटे लंबे हैं, मेहनत ज्यादा और पैसा कम.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 23, 2019, 11:10 AM IST
बिना पूड़ी तले भी तो बता सकते थे- 'मंगलयान कैसे भेजें'
होम साइंस के जरिए मंगल जाने की टेकनीक
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 23, 2019, 11:10 AM IST
औरतें चाहे घर की चारदीवारी से उठकर कॉरपोरेट दफ्तर पहुंच जाएं, चाहे धरती से उठकर मंगल ग्रह पर, जाने से पहले और लौटने के बाद पूड़ियां तलने से उनकी जान नहीं छूटेगी. ये अन्नपूर्णा औरत के सिस्टम में रसोई ऐसे फिट हो गई है, जैसे कंप्यूटर से मदरबोर्ड.

ऐसा न होता तो पांच महिला वैज्ञानिकों की टीम के साथ मंगल ग्रह जाने की तैयारी कर रहे अक्षय कुमार पूड़ी तलने से बेहतर कोई उदाहरण दे सकते थे ये बताने के लिए कि ये यान मंगल पर जाएगा कैसे. मैं बात कर रही हूं 15 अगस्त को रिलीज हो रही फिल्म मिशन मंगल के ट्रेलर की, जो अभी पिछले हफ्ते ही रिलीज हुआ है. उस ट्रेलर में औरतों के मसीहा बने अक्षय कुमार पूड़ी तलने की डीटेल बताते हुए मंगल जाने की टेकनीक समझा रहे हैं.

अव्वल तो हमारे यहां ऐसी फिल्में बनती नहीं, जिसमें औरतों के पास प्रेमिका होने, लहंगा पहनकर डांस करने, अग्नि के सात फेरे लेने, पति के पेट से होकर उसके दिल का रास्ता तय करने और मुहब्बत में जान देने के अलावा कोई और काम हो. कहानी के केंद्र में औरत हुई तो भी औरत के केंद्र में कोई आदमी ही होता है. तो एक तरह से तो ये रेअर टाइप का मौका है कि इस फिल्म में औरतें इसरो की वैज्ञानिक बनी
हुई हैं.

एक तरफ 22 जुलाई को सफलतापूर्वक लांच हुए चंद्रयान 2 मिशन की कमान दो महिला वैज्ञानिकों रितु करिधाल श्रीवास्तव और वनिता मुथैया ने संभाली थी और दूसरी ओर पॉपुलर मीडिया में पहली बार दिख रही महिला वैज्ञानिकों का प्रोजेक्‍शन इतनी खराब रौशनी में किया गया है.



वैज्ञानिक होना दाल-भात है क्या और वो भी औरत होकर वैज्ञानिक होना. वैसे विज्ञान के नियम की मानें तो उच्च शिक्षा हासिल कर प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखने का औरतों का ग्राफ नीचे से ऊपर की ओर जाना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से विज्ञान का ये नियम विज्ञान पर ही लागू नहीं होता. देश की किसी भी बड़ी यूनिवर्सिटी में बीएससी-एमएससी की कक्षाओं में लड़के-लड़कियों का अनुपात तकरीबन बराबर है और कहीं तो लड़कियों की संख्या ज्यादा है. लेकिन एमएससी के बाद आप जैसे-जैसे एमफिल, पीएचडी और आगे रिसर्च में जाते जाएंगे, लड़कियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. यहां तक कि जितने रिसर्च के आखिरी मुकाम तक साथ थीं, वैज्ञानिक होने के काम में वो भी साथ नहीं हुईं. पूरी दुनिया में विज्ञान के क्षेत्र में औरत-मर्द का अनुपात सबसे खराब है. इसे ठीक से समझने के लिए अमेरिकन साइंस हिस्‍टॉरियन मारग्रेट डब्‍ल्‍यू. रॉजिटर की किताब “राइटिंग वुमेन इन टू साइंस” पढ़नी चाहिए. हालांकि इस किताब में वो अमेरिका के बारे में बात कर रही हैं. लेकिन अगर अमेरिका, जहां विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी 44 प्रतिशत है, में स्थिति इतनी खराब है तो आप अपने देश का अंदाजा लगा लीजिए, जहां 2013 में सिर्फ 14 प्रतिशत महिलाएं विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय थीं. ये डाटा 2013 की यूनेस्‍को की साइंस रिपोर्ट का है.
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एमबीए करके इतनी लड़कियां नौकरी के बाजार से गायब नहीं हो रहीं, जितना साइंस पढ़कर हो रही हैं.
एक बार इलाहाबाद के एक बड़े साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर ने कहा था कि हम लंबे रिसर्च प्रोग्राम में लड़कियों को लेना अवॉइड करते हैं. ये कोई जेंडर बायस नहीं है, बल्कि उनका ड्रॉप रेट काफी ज्यादा है. साइंस रिसर्च में औरतों के ड्रॉप रेट का डाटा यूनेस्‍को की रिपोर्ट और मारग्रेट की किताब में भी है. अकसर शादी या बच्चों की वजह से वो रिसर्च बीच में ही छोड़ देती है. नुकसान प्रोजेक्ट को होता है. कोई आदमी इसलिए रिसर्च नहीं छोड़ता कि उसकी शादी हो गई है या वो बाप बन गया है. घर-परिवार वाली औरतों के लिए किसी ऐसे काम में जिंदगी खपाना ज्यादा मुश्किल है, जिसमें काम के घंटे लंबे हैं, मेहनत ज्यादा और पैसा कम.

किसी केमिकल लेबोरेटरी में काम कर रही महिलाएं, मैनचेस्‍टर, ब्रिटेन, 1914, (फोटो स्रोत: यूबीसी लाइब्रेरी)
किसी केमिकल लेबोरेटरी में काम कर रही महिलाएं, मैनचेस्‍टर, ब्रिटेन, 1914, (फोटो स्रोत: यूबीसी लाइब्रेरी)


अगर आपको इस बात में कोई भी शुबहा या जिज्ञासा हो तो इंटरनेट पर दुनिया में साइंस रिसर्च के जेंडर अनुपात पर हुए सर्वे और स्टडीज देख लीजिए. कुछ हायरपरलिंक स्टोरी में हैं. बाकी ढूंढकर पढ़ सकते हैं.
फिलहाल कहने का आशय सिर्फ इतना था कि उपरोक्त तथ्य इस बात की गंभीरता को समझने के लिए काफी हैं कि वास्तविक मंगल मिशन से जुड़ी महिला वैज्ञानिकों के लिए वैज्ञानिक हो पाना कितनी बड़ी बात रही होगी और कितनी अपवाद भी. और ऐसे में उस पर बनी फिल्म के पोस्टर और ट्रेलर में जिस तरह एक पुरुष वैज्ञानिक केंद्र में है और बाकी महिला वैज्ञानिक उसके गिर्द सर-सर करती घूम रही हैं, वो काफी ईरीटेटिंग है. और विद्या बालन का फूली हुई पूड़ियां तलना तो एकदम बकवास है.

मैं ट्रेलर देखकर फिल्म का रिव्यू नहीं लिख रही. मुमकिन है फिल्म मर्दाने इंटेलीजेंस का ऐसे गुण गाती न दिखे, जैसे ट्रेलर गा रहा है. लेकिन अगर आपको लगता है कि पूड़ियां तल रही साइंटिस्ट या सर-सर कर रही महिला वैज्ञानिक कोई इतनी बड़ी बात नहीं कि औरतों को बुरी लग जाए तो आपको एक बार अपने गिरेबान में झांककर देखने की जरूरत है. बहुत मुमकिन है कि आपने ये जान-बूझकर न किया हो. ये आपकी स्क्रिप्ट में वैसे ही सहजता से आ गया हो, जैसे छींक आ जाती है. लेकिन आपकी ये सहजता वैसी ही है, जैसा सहज है आपके अवचेतन में बैठा पुरुष श्रेष्ठताबोध. पुरुषों का नेतृत्व करना, उनका औरतों का मसीहा बनना, उनको बताना कि अब वो क्या करें, क्या न करें. आपका हमेशा टॉप पर रहना और हमारा पूड़ियां तलना.

ये करने के लिए आपको अलग से कोई मेहनत करने की जरूरत नहीं. ये न करने के लिए आपको अपने आपसे सवाल करना, अपने शॉविनिज्म को लगातार चेक करना, उसको ठीक करना पड़ेगा. आपको पॉलिटिकली करेक्ट रहना पड़ेगा और ये करेक्ट रहना एक सचेत फैसला होगा. वरना छींकने जैसी सहज तो पैट्रीआर्की है ही.

फिल्‍म मिशन मंगल की महिला वैज्ञानिक
फिल्‍म मिशन मंगल की महिला वैज्ञानिक


औरत और रसोई की बात चले तो मुझे छह साल पुराना ये किस्सा याद आता है. 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने 63 सालों के इतिहास में पहली बार तीन महिला वकीलों को सीनियर एडवोकेट की उपाधि दी तो मैं उनमें से एक 57 साल की वकील किरण सूरी का इंटरव्यू करने गई. वो उनके लंच का समय था. जब उन्होंने मेरे सामने अपना टिफिन खोला तो खोलते-खोलते अचानक रुक गईं, जैसे कुछ याद आया हो. उन्होंने टिशु पेपर से सावधानी से हाथ पोंछा और पहले अपने डॉक्यूमेंट, कागज मेज से उठाकर पीछे वाली मेज पर पर रखे. फिर टिफिन खोलते हुए हंसकर बोलीं, “कोर्ट में अगर हमारे डॉक्यूमेंट पर अचार का मसाला या हल्दी लग जाए तो मर्द हमारा मजाक उड़ाते हैं.”

तो ऐसा है डियर डायरेक्टर कि स्टीरियोटाइपिंग तो हर जगह है. जनता को न्याय का भरोसा देने वाली देश की सर्वोच्च संस्‍था के कोर्टरूम में भी.

उम्मीद है आप हमारी बात समझ गए होंगे. क्योंकि प्रॉब्लम पूड़ियां तलने से नहीं है. प्रॉब्लम स्टीरियोटाइपिंग से है और इस बात से कि प्रॉब्लम क्या है, ये प्रॉब्लम आपको समझ में नहीं आती.

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First published: July 23, 2019, 10:51 AM IST
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