हाथरस, कफील खान, प्रशांत भूषण का जिक्र कर जस्टिस लोकुर बोले- कानून को उलट-पलट कर फ्रीडम ऑफ स्पीच पर हुआ हमला

रिटायर्ड जज मदन बी लोकुर की फाइल फोटो
रिटायर्ड जज मदन बी लोकुर की फाइल फोटो

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर (Madan B lokur) राजद्रोह कानून, निषेधाज्ञा के कथित दुरुपयोग और इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगाने के आलोचक रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 13, 2020, 2:25 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बी लोकुर (Justice Madan B Lokur) ने सोमवार को कहा कि स्वतंत्र प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि बोलने का साहस करनेवालों की स्वतंत्रता को बुरी तरह प्रभावित करने के लिए ‘कानून के उपयोग और दुरुपयोग के घातक कॉकटेल’ का इस्तेमाल किया जा रहा है.

शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश राजद्रोह कानून, निषेधाज्ञा के कथित दुरुपयोग और इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगाने के आलोचक रहे हैं. वह ‘हमारे मौलिक अधिकारों के रक्षण एवं संरक्षण-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रदर्शन के अधिकार’ विषय पर 2020 बी जी वर्गीज स्मृति व्याख्यान में बोल रहे थे.

राजद्रोह कानूनों को हथियार बनाने के अलग-अलग रास्ते बना लिए
कार्यक्रम का आयोजन मीडिया फाउंडेशन ने किया. इस अवसर पर फाउंडेशन ने उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए महिलाओं को 2019 का चमेली देवी जैन पुरस्कार भी दिया. यह पुरस्कार ‘ आरफा खानम शेरवानी और बेंगलूरू की स्वतंत्र पत्रकार रोहिणी मोहन को मिला. रिटायर्ड जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का सबसे बुरा स्वरूप व्यक्ति पर राजद्रोह का आरोप लगा देना है.’
वह सुप्रीम कोर्ट के उन चार वरिष्ठ न्यायाधीशों में शामिल थे जिन्होंने 12 जनवरी 2018 को तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ संवाददाता सम्मेलन कर विवाद पैदा कर दिया था. अपने व्याख्यान में जस्टिस लोकुर ने कहा कि बोलने की स्वतंत्रता को सीमित करने का सबसे ज्यादा गंदा तरीका व्यक्ति पर देशद्रोह का आरोप लगाना है. उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1962 में ही स्पष्ट रूप से और देशद्रोह कानून को हटा दिया था, फिर भी  प्रशासन ने राजद्रोह कानूनों को हथियार बनाने के अलग-अलग रास्ते अख्तियार कर लिए.



पिंजरा तोड़ के सदस्य की गिरफ्तारी पर बोले लोकुर
जस्टिस लोकुर ने पिंजरा तोड़ के सदस्य देवांगना कालिटैना दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तारी की भी बात की और कहा कि किसी भी नागरिक को एक परी कथा के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है और उसे स्वतंत्र होने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा. उन्होंने कहा कि कानून की व्याख्या हमेशा वस्तुनिष्ठ रूप से की जाती है लेकिन हाल में व्यक्तिपरक संतुष्टि ने उस पर काबू पा लिया गया है और परिणाम अप्रभावी हैं.

उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखने की आड़ में  आदेशों के माध्यम से लगातार इंटरनेट शटडाउन एक अत्यधिक प्रतिकूल प्रतिक्रिया है. लोकुर ने कहा, 'फ्री स्पीच के लिए मौलिक अधिकार किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.'




कफील, प्रशांत भूषण मामले का भी किया जिक्र
लोगों की 'आवाज चुप कराने' के बारे में बात करते हुए, उन्होंने कहा कि इनमें एक वक्ता  ऐसा है जिसने कभी कुछ नहीं कहा और फिर भी उस व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की गई. उन्होंने कई मामलों का भी उल्लेख किया, जिसमें डॉ कफील खान की हिरासत भी शामिल है .कहा कि इसमें  कानून की लगभग हर प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया था.

उन्होंने अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई का उल्लेख किया, और 2012 में मुंबई की दो लड़कियों की गिरफ्तारी' का भी जिक्र किया जिन्हें 'ठाकरे विरोधी' माना गया था. कहा कि 'सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को यह सबक सिखाने की कोशिश की थी कि अपने रिस्क पर ट्वीट करें.'

शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त जज ने आरोप लगाया कि सीआरपीसी की धारा 144 लागू करना 'हाथरस गैंगरेप मामले से मीडिया को बाहर रखने के लिए कानून के विचित्र दुरुपयोग के जरिए प्रेस की स्वतंत्रता का भयानक उल्लंघन है.' (भाषा इनपुट के साथ)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज