OPINION: DMK की रस्साकशी में अलागिरी बढ़ा सकते हैं स्टालिन का सिरदर्द?

OPINION: DMK की रस्साकशी में अलागिरी बढ़ा सकते हैं स्टालिन का सिरदर्द?
अलागिरी और स्टालिन

पिछले चार सालों से सक्रिय राजनीति से दूर रहे अलागिरी बिना शक्ति परीक्षण के रास्ते से हटने को तैयार नहीं दिखते और अब उन्होंने स्टालिन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

  • News18.com
  • Last Updated: August 27, 2018, 10:30 AM IST
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टीएस सुधीर
एमके स्टालिन मंगलवार को डीएमके के अध्यक्ष बन जाएंगे. स्टालिन के पिता एम. करुणानिधि 49 सालों से जिस पद पर काबिज़ रहे उस पद को पाना उनके लिए उतना मुश्किल नहीं दिख रहा. हालांकि स्टालिन के सामने सबसे बड़ा चैलेंज उनके बड़े भाई एमके अलागिरी हैं, जो डीएमके की गद्दी पर उन्हें बैठे नहीं देखना चाहते.

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से काफी नाटकीय रही है. अलागिरी ने करुणानिधि की मौत के सिर्फ एक हफ्ते बाद ही स्टालिन को पार्टी का जिम्मा सौंपे जाने पर सवाल खड़े कर दिए. यहां गौर करने वाली बात यह है कि 2014 में जब दोनों भाइयों के बीच बढ़ती दरार को पाटना मुश्किल हो गया था तो अलागिरी को पार्टी से बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया गया था. तब से लेकर अब तक स्टालिन के पास ही पार्टी की कमान रही है. इस दौरान स्टालिन ने पार्टी में हर स्तर पर अपने लोगों को तैनात कर दिया.

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हालांकि पिछले चार सालों से सक्रिय राजनीति से दूर रहे अलागिरी बिना शक्ति परीक्षण के रास्ते से हटने को तैयार नहीं दिखते और अब उन्होंने स्टालिन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इसीलिए करुणानिधि के समाधि स्थल मरीना बीच से उन्होंने कहा था कि डीएमके कार्यकर्ता उनके साथ हैं. उन्होंने कहा कि स्टालिन कार्यकारी अध्यक्ष हैं, लेकिन काम नहीं करते और वो पार्टी को जिताने की क्षमता नहीं रखते.



अलागिरी ने ऐसा कहकर स्टालिन की दुखती रग पर हाथ रख दिया. दरअसल 2014 का लोकसभा चुनाव डीएमके ने स्टालिन की अगुवाई में ही लड़ा था, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. इसके अलावा सिर्फ दो साल बाद 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी जयललिता को सत्ता से बाहर नहीं कर पाई. अब 2019 का चुनाव स्टालिन के लिए लिटमस टेस्ट है, क्योंकि लगातार तीन चुनाव हारना उनके लिए खतरे की घंटी हो सकता है.

खास बात ये है कि अलागिरी 5 सितंबर को चेन्नई में रैली करने वाले हैं. 1980 में दोनों भाइयों के बीच बढ़ती दरार को कम करने के लिए करुणानिधि ने अलागिरी को दक्षिण तमिलनाडु में पार्टी की कमान संभालने के लिए भेज दिया था. अब चेन्नई में रैली करके अलागिरी, स्टालिन को एक तरह से उन्हीं के क्षेत्र में ललकार रहे हैं.

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अलागिरी का कहना है कि उनके साथ रैली में करीब एक लाख लोग होंगे. हो सकता है ये बात बढ़ा-चढ़ा कर कही गई हो, लेकिन इस बात में भी बहुत संदेह नहीं है कि विपक्षी पार्टियां डीएमके पार्टी में पड़ी इस फूट का फायदा उठाने के लिए अलागिरी की मदद कर सकती हैं.

हालांकि इस बात की संभावना कम है कि वो डीएमके के किसी धड़े को अपने साथ मिला पाएंगे. युवाओं से जुड़ने के लिए स्टालिन टीम ने करीब दो साल पहले अपने पहनावे में भी बदलाव किया. उन्होंने वेष्टि की जगह पतलून और सफेद शर्ट की जगह रंगीन कपड़े पहनना शुरू कर दिया.

लेकिन सिर्फ इन्हीं चीज़ों से वोटर डीएके की तरफ खिंचेंगे इसकी संभावना कम ही लगती है. स्टालिन को मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने के लिए अपने पिता से भी बेहतर गवर्नेंस का कोई नया मॉडल देना पड़ेगा. कारण कि सत्ता विरोधी लहर डीएके को इतना फायदा नहीं पहुंचाएगी.

हालांकि 1984 और 2016 को छोड़ दें तो तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन को लेकर एक पैटर्न मिलता है. हर बार तमिलनाडु की जनता सत्ता पर काबिज़ पार्टी को बाहर कर देती है. सत्ता लगातार डीएमके और एआईएडीएके के बीच बदलती रही है. लेकिन इस बार स्थितियां बदल गई हैं. एआईएडीएके के मूल वोटर्स के पास वास्तविक एआईएडीएमके और टीटीवी दिनाकरन की अगुवाई वाली एआईएडीएमके के बीच चुनने का विकल्प है. इसलिए स्टालिन को किसी विज़न पर काम करना पड़ेगा पुरानी शराब को नई बोतल में भरकर पेश करने से काम नहीं चलेगा.

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अलागिरी अगर नई पार्टी बनाते हैं, तो वो बहुत कुछ तो नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर उन्होंने स्टालिन के विरोधियों से हाथ मिला लिया तो दक्षिण तमिलनाडु में उन्हें काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं. अलागिरी इसीलिए अपने आपको करुणानिधि के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश कर रहे हैं. कुल मिलाकर इस वक्त वो ऐसे हालात बनाना चाहते हैं कि 2019 के बाद उनकी वापसी डीएमके में अपरिहार्य हो जाए.
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