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Modi@8: पीएम मोदी की राजनीतिक इच्छाशक्ति, ट्रिपल तलाक कानून से लाखों महिलाओं की जिंदगी तबाह होने से बची

पीएम नरेंद्र मोदी ने दिलाया मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक के दंश से छुटकारा. फाइल फोटो

पीएम नरेंद्र मोदी ने दिलाया मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक के दंश से छुटकारा. फाइल फोटो

ट्रिपल तलाक को भारत के मुस्लिम समाज में धार्मिक हक के तौर पर देखा जाता था, जबकि तीन तलाक न तो इस्लामिक था और न ही कानूनी. इसके बावजूद ट्रिपल तलाक की सामाजिक बुराई को वोट के सौदागरों का राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा था.

नई दिल्ली. मानव समाज में समय के साथ ऐसी बुराइयां पनपने लगती हैं, जिनको धर्म के नाम पर जायज ठहराने की कोशिश होती है. जबकि वास्तव में उनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता है. हिंदू समाज में मध्यकाल में पनपी सती प्रथा एक ऐसी ही सामाजिक बुराई थी. जिसका अंत राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों का समर्थन मिलने के बाद ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर किया था. हिंदुओं के भीतर भी चली आ रही बहुविवाह जैसी बुराइयों को आजादी के बाद ‘1955 में हिंदू विवाह अधिनियम’ बनाकर खत्म करने का काम किया गया. जबकि देश में मुस्लिम समाज की महिलाओं को इन सुधारों का लाभ नहीं मिल सका. मुस्लिम समाज में भी कई कुरीतियां हैं. जिनके खिलाफ कदम उठाने से आजादी के बाद से ही राजनीतिक नेतृत्व हिचकता रहा है.

जब भी देश में मुस्लिम समाज में फैली समस्याओं खासकर महिलाओं के अधिकारों की बात होती थी तो वोटों की राजनीति के कारण सत्ता में बैठे लोग तत्काल तुष्टिकरण का खेल शुरू कर देते थे. इससे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का मामला जहां का तहां लटका रह जाता. जब हिंदू विवाह अधिनियम जैसे कानून बनाए जा रहे थे, उस समय भी मुस्लिम महिलाओं के हक को महफूज रखने के लिए उनके लिए कानून बनाने की मांग उठी थी. खासकर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दंश से छुटाकारा दिलाने की आवाज लंबे समय से उठती रही है. फिर भी सरकारों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बन सकता था कानून
तीन तलाक को भारत के मुस्लिम समाज में धार्मिक हक के तौर पर देखा जाता था. जबकि तीन तलाक न तो इस्लामिक था और न ही कानूनी. इसके बावजूद ट्रिपल तलाक की सामाजिक बुराई को वोट के सौदागरों से राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा था. तीन तलाक की सामाजिक बुराई के खिलाफ कानून 1986 में बनाया जा सकता था. जब सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला दिया था. कांग्रेस के पास कानून बनाने के लिए संसद में पूर्ण बहुमत था. इसके बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खत्म करने और मुस्लिम महिलाओं को उनके संवैधानिक और मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए संसद में अपनी ताकत का इस्तेमाल किया. तत्कालीन सरकार ने कुछ कट्टरपंथियों की तर्कहीन बातों के सामने झुककर मुस्लिम महिलाओं को उनके जायज अधिकारों से वंचित कर दिया.

दूसरी बार सत्ता में आते ही पीएम मोदी ने दिखाई इच्छाशक्ति
बहरहाल दूसरी बार सत्ता में आने के तत्काल बाद पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई और मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक के दंश से छुटकारा दिलाने का काम किया. उन्होंने कम से कम इतना संदेश देने की कोशिश की है कि भारत संविधान के आधार पर चलने वाला देश है. जहां हर इंसान के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाएगी. धार्मिक आधार पर महिलाओं के अधिकारों में कोई अंतर नहीं किया जा सकता है. वैसे भी ट्रिपल तलाक कानून का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. यह कानून विशुद्ध रूप से एक सामाजिक बुराई, अमानवीय, क्रूर और असंवैधानिक प्रथा को समाप्त करके लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है. मौखिक रूप से तीन बार तलाक कहकर तत्काल तलाक देना अवैध है. कई ऐसी घटनाएं भी सामने आई थीं जिनमें महिलाओं को पत्र, फोन या मैसेज और व्हाट्सएप के जरिए भी तलाक दिया गया था. इस तरह की घटनाएं एक संवेदनशील देश और समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती हैं.

ज्यादातर इस्लामिक देशों में ट्रिपल तलाक गैर-कानूनी
दुनिया के कई मुस्लिम बहुल देशों ने पहले ही तीन तलाक को अवैध और गैर-इस्लामिक घोषित कर दिया था. मिस्र पहला मुस्लिम राष्ट्र था जिसने 1929 में इस सामाजिक बुराई को खत्म कर दिया था. 1929 में सूडान, 1959 में इराक, 1953 में सीरिया, 1969 में मलेशिया ने तीन तलाक की प्रथा को समाप्त कर दिया था. यहां तक कि भारत से अलग होकर एक नया देश बने पाकिस्तान में भी 1956 में ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया गया था. जबकि अपनी आजादी के एक साल में ही 1972 में बांग्लादेश ने ट्रिपल तलाक को अवैध घोषित कर दिया था. इसके अलावा साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, ईरान, ब्रुनेई, मोरक्को, कतर, यूएई जैसे देशों ने भी कई साल पहले इस सामाजिक बुराई को खत्म किया था. लेकिन भारत को इस अमानवीय और क्रूर प्रथा से छुटकारा पाने में 70 साल लग गए. क्योंकि यहां मुस्लिम धर्म के तथाकथित अगुवा अपनी अल्पसंख्यक पहचान के लिए ट्रिपल तलाक को जायज ठहरा रहे थे.

कानून से लाखों महिलाओं का वैवाहिक जीवन हुआ सुरक्षित
वैसे भी संसद में कानून बनने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई, 2017 को तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावी बनाने के लिए तीन तलाक के खिलाफ कानून बना दिया. तीन तलाक को खत्म कर मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक, मौलिक और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत किया है. तीन तलाक के खिलाफ कानून पारित हुए 3 साल होने वाले हैं. मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019, 1 अगस्त 2019 को पारित किया गया था. उसके बाद तीन तलाक के मामलों में करीब 82 फीसदी की गिरावट आई है.

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ट्रिपल तलाक को अवैध घोषित करने वाले कानून के बनने के बाद लाखों मुस्लिम महिलाओं का वैवाहिक जीवन ज्यादा सुरक्षित हुआ है. केवल उत्तर प्रदेश में ही 2019 तक ट्रिपल तलाक के करीब 64 हजार मामले थे, जबकि कानून बनने के बाद 3 साल में ट्रिपल तलाक के मामलों की केवल मामूली संख्या ही सामने आई है. इसी तरह 2019 से पहले बिहार में ट्रिपल तलाक के 38 हजार से ज्यादा मामले थे. वहां भी कानून बनने के बाद से तीन तलाक में भारी गिरावट देखी गई है. पूरे देश में लाखों मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की सुरक्षा का काम ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाने से ही संभव हो पाया है. इससे साफ है कि अगर नेतृत्व के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो हर बाधा को दूर करके नागरिक हितों की सुरक्षा की जा सकती है.

Tags: Pm narendra modi, PM Narendra Modi News, Triple Talaq law

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