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कोरोना से बचाव का टीका लगाने में सामर्थ्यवान नहीं, जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने जा रही है मोदी सरकार

भारत में 22 फरवरी तक एक करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना से बचाव का टीका लग चुका है. (फोटो: AP)
भारत में 22 फरवरी तक एक करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना से बचाव का टीका लग चुका है. (फोटो: AP)

ये सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि हेल्थ वर्कर्स और फ्रंटलाइन वर्कर्स के बाद अब आम जनता को कब लगेगा कोरोना से बचाव का टीका. इस सवाल से जल्दी ही पर्दा उठ सकता है. मोदी सरकार अगले कुछ हफ्तों में अपनी उस महत्वाकांक्षी योजना को सामने लाने वाली है, जिसके तहत पचास साल से अधिक उम्र के उन लोगों को टीका लगाने की शुरुआत हो सकती है, जिनके लिए कोरोना ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसे में पैसे के बल पर टीका लेकर जो लोग निश्चिंत हो जाना चाहते थे, उनको निराशा हाथ लग सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 23, 2021, 6:51 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना से बचाव के लिए मोदी सरकार ने जो टीकाकरण अभियान शुरु किया है, उसको एक महीने से ज्यादा हो गए हैं. ऐसे में इस बात पर लगातार चर्चा हो रही है कि क्या ये टीका सबको नहीं उपलब्ध कराया जा सकता या फिर जो लोग टीका खरीद कर लगाना चाहते हैं, उनके लिए इसे मुहैया कराने में हर्ज क्या है. सवाल ये भी किया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर का इस्तेमाल कर टीकाकरण अभियान को ज्यादा गति क्यों नहीं दी जा सकती या फिर ये कि जो संगठन या कंपनियां अपने कर्मचारियों को टीका खरीद कर लगवाना चाहती हैं, वो ऐसा कर पाएंगी क्या और फिर इसमें हर्ज क्या है.

किसको लगेगा टीका, लाख टके का सवाल
जाहिर है, इन सवालों पर सोशल मीडिया में खूब चर्चा हो रही है. लोगों को उत्सुकता भी है कि आखिर उनका नंबर कब आएगा. एक सौ तीस करोड़ की आबादी के देश में सबका टीकाकरण फटाफट हो, ये संभव भी नहीं है. लेकिन कई लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि सरकार इस अभियान में निजी क्षेत्र का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रही है. जितने मुंह, उतने सवाल. सवाल ये भी कि आखिर नेताओं, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को कब लगेगा टीका. और सबसे बड़ा सवाल कि आखिर किस आधार पर लोगों को लगाया जाएगा टीका, कैसे आएगा नंबर.

हेल्थ वर्कर्स और फ्रंटलाइन वर्कर्स से हुई है शुरुआत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने 16 जनवरी से टीकाकरण अभियान की शुरुआत की. प्राथमिकता में सबसे पहले रखा गया हेल्थ वर्कर्स को. स्वाभाविक तौर पर डॉक्टरों, नर्सों और उन स्वास्थ्य कर्मियों को टीका की सबसे ज्यादा जरूरत थी, जो पिछले एक साल से कोरोना के केस हैंडल कर रहे हैं, दिन-रात अपनी जान की परवाह किए बगैर इस महामारी से ग्रस्त मरीजों की सेवा कर रहे थे, इलाज कर रहे थे और कोरोना से लोगों की जान न जाए, ये कोशिश कर रहे थे. इसके बाद 2 फरवरी से उन फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगाने की शुरुआत हुई, जो कोरोना की लड़ाई में स्वास्थ्य कर्मियों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं. चाहे सोशल डिस्टैंसिंग का पालन कराना हो या फिर मास्क के इस्तेमाल के लिए लोगों को सचेत करना हो या फिर आवाजाही नियंत्रित करना हो. राज्य सरकार की तरफ से ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिसमें पुलिसकर्मी और होमगार्ड के जवानों से लेकर नगर निगम और राजस्व विभाग के कर्मचारी तक शामिल हैं, जो कोरोना का प्रसार न हो, इसको सुनिश्चित करने और रोकथाम के तमाम उपायों को करने में लगे हैं.



अभी तक लग चुका है एक करोड़ पांच लाख लोगों को टीका
केंद्र सरकार की निगरानी में और राज्य सरकारों के सहयोग से अभी तक जो टीकाकरण अभियान देश के तमाम हिस्सों में चला है, उसके तहत कल शाम तक एक करोड़ सतरह लाख डोज दिए जा चुके हैं. एक करोड़ पांच लाख लोगों को पहला डोज दिया जा चुका है, जबकि बारह लाख लोगों को दूसरा डोज दिया जा चुका है. नियम के हिसाब से पहला डोज दिए जाने के महीने भर बाद दूसरा डोज दिया जा सकता है. जाहिर है, जिन स्वास्थ्यकर्मियों ने 16 जनवरी से शुरु हुए टीकाकरण अभियान के तहत सबसे पहले टीका लिया, अब उन्हें दूसरा डोज भी दिया जा रहा है.

जल्दी ही पचास साल से ज्यादा उम्र के लोगों को लगेगा नंबर
सवाल ये उठता है कि हेल्थ वर्कर्स और फ्रंट लाइन वर्कर्स के बाद किसका नंबर आएगा. अगर सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें, तो अब उन लोगों को टीका का लाभ मिलना शुरु हो जाएगा, जिनकी उम्र पचास साल से ज्यादा है. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में पचास साल से ज्यादा उम्र के लोगों की तादाद 26 करोड़ के आसपास है. इन लोगों को कोरोना से बचाव वाले टीका का लाभ सबसे पहले मिलेगा. इनमें भी उन लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनकी उम्र साठ वर्ष से ज्यादा है. सवाल ये उठता है कि आखिर पचास वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को ही टीका क्यों. इसका जवाब भी कोरोना के सामने अभी तक हुई दुनिया की लड़ाई में ही छुपा है. देखा ये गया है कि कोरोना ज्यादा जानलेवा उन लोगों के लिए साबित हुआ है, जिनकी उम्र पचास वर्ष से ज्यादा है. युवाओं और बच्चों पर इसका असर काफी कम हुआ है. अगर युवा संक्रमित भी हुए हैं, तो ज्यादातर मामलों में वो कोरोना को मात देने में कामयाब रहे हैं.

सरकार की प्राथमिकता में वो लोग भी हैं, जिनकी उम्र तो पचास वर्ष से कम है, लेकिन वो कोमोरबिडिटी के शिकार हैं. देखा ये गया है कि अगर किसी को ब्लडसुगर या फिर हार्ट या किडनी की गंभीर समस्या है, तो उसके लिए कोरोना की महामारी जानलेवा साबित हुई है. देश में इस तरह के गंभीर लक्षणों वाले पचास साल से कम उम्र के लोगों की तादाद एक करोड़ के आसपास है. ऐसे लोगों को भी टीकाकरण के नए चरण में जगह मिल सकती है, उन्हें टीका लगाया जाएगा, ताकि उनकी जान पर कोई खतरा न हो.


ली जा रही है निजी क्षेत्र की मदद
देश में कई लोगों के मन में भ्रम है कि टीकाकरण के इस अभियान में निजी क्षेत्र की मदद नहीं ली जा रही है. अभी तक के आंकड़े इसके उलट हैं. अभी तक जिन दस हजार अस्पतालों और उनमें काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की मदद टीकाकरण के लिए ली गई है, उसमें से दो हजार अस्पताल प्राइवेट सेक्टर के हैं. प्राइवेट सेक्टर के इन अस्पतालों के डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों को भी पहले चरण में ही टीका लगाया गया है, सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच कोई फर्क नहीं किया गया. आगे चलने वाले अभियान में भी निजी क्षेत्र की मदद ली जानी है, जब अगले छह महीनों में करीब 27 करोड़ लोगों को टीका लगाया जाएगा.

सामर्थ्य नहीं, जरूरत है टीकाकरण का आधार
देश में कई कंपनियों और संगठनों ने अपने कर्मचारियों और सदस्यों को नई वैक्सीन का इजाद होते ही टीका लगाने की योजना बनाई थी. लेकिन मौजूदा प्रावधानों के तहत वो ऐसा कर नहीं सकते. मोदी सरकार की साफ सोच है कि टीकाकरण का लाभ उन्हें दिया जाएगा, जिन्हें उसकी जरूरत सबसे ज्यादा है, उन्हें नहीं जो खरीद कर लगाने की सामर्थ्य रखते हैं. इसके पीछे की सोच यही है कि पैसे के जोर पर अमीर और सामर्थ्यवान लोग पहले टीका लगा लें और गरीब पीछे छूट जाए, ऐसा नहीं हो सकता. यही वजह है कि सरकार ने वैक्सीन की खुले तौर पर बिक्री की इजाजत नहीं दी है.

दुनिया में कही नहीं हो रही है वैक्सीन की खुली बिक्री
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में कोरोना वैक्सीन की बाजार में बिक्री पर प्रतिबंध है. दुनिया के सभी देशों में यही हो रहा है. भारत की तरह ही दुनिया के सभी देशों में इस वैक्सीन की ओपन मार्केट एक्सेस नहीं है, बल्कि इमरजेंसी यूज अथॉराइजेशन के तहत टीका दिया जा रहा है. कोरोना की भयावहता को देखते हुए स्टेज थ्री ट्रायल के इफिकेसी डाटा का इंतजार किए बगैर दुनिया की तमाम सरकारों ने इसके इस्तेमाल की इजाजत दी. इसीलिए इसे इमरजेंसी यूज अथॉराइजेशन कहा जा रहा है. जब आप किसी वैक्सीन का डोज इमरजेंसी यूज अथॉराइजेशन के तहत देते हैं, तो इसका ओपन मार्केट एक्सेस नहीं दिया जा सकता. लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि वैक्सीन सेफ नहीं है. कोई वैक्सीन सेफ है या नहीं, इसका परीक्षण फेज 2 ट्रायल के दौरान ही हो जाता है. फेज 3 ट्रायल के तहत इसकी असरकारकता का विस्तृत अध्ययन किया जाता है, जो फेज 2 में संभव नहीं है. लेकिन कोरोना की भयावहता को देखते हुए तमाम देशों की सरकारों ने कोविड वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत इमरजेंसी यूज अथॉराइजेशन के तहत दी, ताकि जिन लोगों पर इसके जानलेवा असर की आशंका ज्यादा है, उनके जीवन को सुरक्षित किया जा सके. इसी के मद्देनजर भारत में ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक की तरफ से निर्मित हुए वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत दी.

जरूरतमंदों को सबसे पहले टीका का लाभ मिले, इसके लिए भी नियंत्रण
इमरजेंसी यूज अथॉराइजेशन के नियम के साथ ही सरकार ये भी सुनिश्चित करना चाहती थी कि वैक्सीन का लाभ सबसे पहले उन लोगों को मिले, जिन्हें इसकी ज्यादा आवश्यकता है. प्रोडक्शन की चुनौतियों के बीच इसकी खुले बाजार में बिक्री करने पर न सिर्फ इसकी ब्लैक मार्केटिंग और होर्डिंग कर मुनाफाखोरी का खतरा ज्यादा बढ़ जाता, बल्कि जरूरतमंदों की जगह सक्षम लोग इसका फायदा उठा ले जाते. जाहिर है, मोदी सरकार को ये मंजूर नहीं था. इसलिए वैक्सीन को नियंत्रण में रखने और राज्य सरकारों की निगरानी में ही इसे जरूरतमंदों को देने का फैसला किया गया.

सरकार के पास है मास वैक्सीनेशन का इंतजाम
सवाल ये भी उठाया जा रहा है कि क्या सरकार तेजी से टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल कर पाएगी. क्या सरकार के पास इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर या ट्रेन्ड मैनपावर है. अगर सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें, तो ये लक्ष्य हासिल करने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. सरकार के इस आत्मविश्वास की कुछ ठोस वजह भी हैं. दरअसल ज्यादातर लोगों को ये ध्यान में नहीं आता कि हर साल करीब साठ करोड़ लोगों को सरकारी संसाधनों के जरिये ही टीका लगाया जाता है. इसमें बच्चों से लेकर गर्भवती महिलाएं तक शुमार हैं. पल्स पोलियो से लेकर इंद्रधनुष अभियान तक, हर साल देश की करीब आधी आबादी जैसी संख्या टीकाकरण अभियान का हिस्सा बनती है. जाहिर है, साल दर साल इस तरह का टीकाकरण करने का अनुभव सरकार के पास है. इसके अलावा सरकारी और निजी क्षेत्र में कुल मिलाकर करीब नब्बे लाख हेल्थ वर्कर हैं. इन सबके सहयोग से 2021 के वर्ष में ही उन तमाम लोगों को कोरोना से बचाव का टीका लगा दिया जाएगा, जिनको इस महामारी से नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा है. और अगर ऐसा हो जाता है, तो बाकी की युवा आबादी के लिए चुनौतियां कम होंगी. एक तरफ संक्रमण की आशंका वाले लोगों की तादाद कम हो जाएगी, दूसरी तरफ हर्ड इम्युनिटी भी पूरी तरह विकसित हो जाएगी और कोरोना की स्थिति वैसी ही हो जाएगी, जैसी किसी और किस्म के इंफ्लुएंजा बुखार की होती है.

पीएम मोदी भी लगवाएंगे अब टीका
अगले छह-सात महीनों में जिन करीब 28 करोड़ लोगों को टीका लगना है, उसकी जद में वो तमाम नेता, मंत्री और सांसद-विधायक भी आ जाएंगे, जिनकी उम्र पचास वर्ष से ज्यादा है. जाहिर है, ऐसे में पीएम मोदी भी टीका लगवाएंगे, जिनके बारे में विपक्षी नेता अक्सर सवाल खड़ा करते थे कि आखिर पीएम खुद क्यों वैक्सीन नहीं लगवा रहे, अगर वो इतनी सुरक्षित है तो. दरअसल आम जनता के साथ सीधे संवाद और उसकी नब्ज पकड़ने के मामले में अपनी काबिलियत का लोहा पूरी दुनिया को मनवा चुके मोदी इस वैक्सीनेशन ड्राइव में भी बड़ा संदेश दे रहे हैं. उनके और उनकी सरकार के लिए आम जनता और जरूरतमंद लोग ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि रसूखदार और वीआईपी, जो पहले की सरकारों में हमेशा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर प्राथमिकता पाते रहे हैं. मोदी कोरोना के सामने लड़ाई को लेकर देश और दुनिया में पहले ही बड़ी शोहरत हासिल कर चुके हैं और वैक्सीनेशन का ये मॉडल उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक नीति में और चार चांद ही लगाएगा.
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