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दो मां और दो राह- अफगानिस्तान की जेल में बंद बेटियों को छुड़ाने के लिए एक पहुंची कोर्ट, दूसरी ने रखी शर्त

केरल निवासी कुछ लड़कियां इस्लामिक स्टेट के चंगुल में फंस गई थीं (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केरल निवासी कुछ लड़कियां इस्लामिक स्टेट के चंगुल में फंस गई थीं (प्रतीकात्मक तस्वीर)

निमिशा एक हिंदु और मेरिन क्रिश्चियन है, दोनों ने ही इस्लाम कबूल किया था और दो क्रिश्चियन भाइयों से शादी कर ली थी, जिन्होंने बाद में इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था. ये लोग उन 21 लोगों में से थे जिन्होंने मई-जून 2016 में आईएस में शामिल होने के लिए भारत छोड़ दिया था.

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    नई दिल्ली. बिंदु संपत एक मां है, जिसने केरल हाईकोर्ट (Kerala Highcourt) में अर्जी दाखिल की. अर्जी में गृह मंत्रालय (Home Ministry) और विदेश मंत्रालय (MEA) को उनकी बेटी निमिशा उर्फ फातिमा इजा और उसकी चार साल की पोती को देश में वापस के लिए निर्देश देने की गुहार लगाई है. पांच साल पहले इनकी बेटी ने इस्लामिक स्टेट (Islamic State) में शामिल होने के लिए भारत छोड़ दिया था और फिर उसे अफगानिस्तान में जेल हो गई. बिंदु संपत अकेली ऐसी मां नहीं है. एक मां और है जिसने अपनी बेटी को घर वापस लाने के लिए दूसरा रास्ता अख्तियार किया. इनका नाम है मिनी, जो मेरिन उर्फ मिरियम की मां है.

    अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मिनी अपनी बेटी को इसी शर्त पर वापस लाना चाहती है कि वह इस्लामिक स्टेट को पूरी तरह से त्याग दे और अपने किए पर उसे पछतावा हो. मिनी का कहना है कि वो अपनी बेटी का मौजूदा रुख क्या है, वह यह जानना चाहती हैं. मिनी का मानना है कि उनके लिए देश कहीं ऊपर है और उनकी बेटी ने जो कुछ किया वो गलत है. इस्लामिक स्टेट में शामिल होना अपराध है. अगर वो इसी पर अड़ी रहती है तो हम किसी भी हालत में अपनी बेटी को वापस नहीं लाना चाहेंगी. अगर वो एक अच्छी इंसान बनकर आती है तो ठीक है ऐसी लड़की जो दूसरों को प्यार करे ना कि नफरत.

    निमिशा एक हिंदु और मेरिन क्रिश्चियन है, दोनों ने ही इस्लाम कबूल किया था और दो क्रिश्चियन भाइयों से शादी कर ली थी, जिन्होंने बाद में इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था. ये लोग उन 21 लोगों में से थे जिन्होंने मई-जून 2016 में आईएस में शामिल होने के लिए भारत छोड़ दिया था. खुफिया एजेंसियों के मुताबिक ये समूह अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण वाले नांगरहर क्षेत्र में भेज दिया गया था. इस समूह के कुछ आदमी जिसमें निमिशा और मेरिन के पति भी थे. ऐसा माना जा रहा है कि यूएस के हमले में वे दोनों मारे गए थे और उनकी पत्नियों को अफगानिस्तान सरकार ने हिरासत में ले लिया था.

    धर्म परिवर्तन के वक्त बीडीएस की छात्रा थी निमिशा
    30 वर्षीय निमिशा जब शादी करके इसा बनी उस दौरान वो कासारगोड में सेंचुरू डेंटल कॉलेज में बीडीएस की अंतिम वर्ष की छात्र थी. वहीं 26 वर्षीय मेरिन जब शादी करके याहिया बनी उस वक्त वो कोच्चि में कम्यूनिकेटिव इंग्लिश में अपना बीए पूरा कर चुकी थी. अर्जी में बिंदु ने बेटी के खिलाफ इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस का मुद्दा भी उठाया है. उनका कहना है कि प्रत्यर्पण के लिए द्विपक्षीय संधि के तहत, कोई व्यक्ति जिसका नाम इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस में होता है उसे अस्थायी तौर पर हिरासत में लेकर या आत्मसमर्पण के बाद हिरासत में लेकर संबंधित देश मे प्रत्यर्पित कर दिया जाता है.

    अर्जी में कहा गया है कि अस्थायी गिरफ्तारी को उसके असल रूप में समझे तो इसकी प्रकृति में गिरफ्तारी या नज़रबंदी के दौरान ही अस्थायी होने का संकेत मिलता है. मौजूदा द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि साल 2016 में वजूद में आई थी और साल 2019 के बाद दोनों देशों में इसे लागू करने में समर्थन जताया था. इस आधार पर इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने पर केंद्र सरकार आरोपी के प्रत्यर्पण के लिए जरूरी कदम उठाने को बाध्य है. बिंदु ने तिरुवनंतपुरम में गुहार लगाते हुए कहा कि निमिशा और उसकी बेटी किसी भी तरह से राष्ट्र की सुरक्षा में खतरा नहीं होंगे, बच्चे को समाज में दोबारा लाने का प्रयास किया जाना चाहिए. दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियों और कानून को निमिशा के मामले में कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, जो मानवाधिकार के अनुरूप है.

    वहीं मेरिन की मां इस मामले में अलग रुख अपनाए हुए है. परिवार का अपनी बेटी के लिए अदालत में जाने की कोई योजना नहीं है. उनका कहना है कि मैं अपनी बेटी के मुंह से सुनना चाहती हूं कि उसने आंतकवादी संगठन को पूरी तरह से छोड़ दिया है. इसी हाल में वो अपनी बेटी का मुंह देखना चाहती हैं. उनका कहना है कि मैं हर बात अपनी बेटी के मुंह से सुनना चाहती हूं किसी और से नहीं. केंद्र से उनकी इतनी ही अर्जी है कि वो उसे ऐसा करने का मौका दे. उनका कहना है कि अगर उनकी बेटी अभी भी आईएस के साथ है तो वो देश के लिए खतरा है. किसी एक आदमी की करनी की सजा पूरे समाज को नहीं मिल सकती है.

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