एमपी-राजस्थान: चुनाव जीतने के बाद अब CM के चेहरे को लेकर पसोपेश में कांग्रेस

एमपी-राजस्थान: चुनाव जीतने के बाद अब CM के चेहरे को लेकर पसोपेश में कांग्रेस
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ सचिन पायलट और अशोक गहलोत (पीटीआई)

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है. लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किलें चुनाव जीतने से कम मुख्यमंत्री चुनने में भी नहीं है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 13, 2018, 8:05 AM IST
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2014 के लोकसभा चुनावों मिली हार के बाद कांग्रेस एक अरसे से जीत के लिए तरस रही थी. पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से तीन राज्यों में कांग्रेस की बढ़त, सफलता की पहली सीढ़ी मानी जा सकती है. राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरका बनाने जा रही है. लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किल चुनाव जीतने से कम मुख्यमंत्री चुनने में भी नहीं है.

कांग्रेस कैंप में नई समस्या यह है कि तीनों राज्यों में किसे मुख्यमंत्री चेहरा बनाया जाए. यह मुकाबला राजस्थान और मध्यप्रदेश में कहीं ज्यादा रोचक है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के पास मुख्यंत्री पद के दो-दो प्रमुख दावेदार हैं जिन्हें जनता चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री मानकर चल रही थी.

मध्यप्रदेश और राजस्थान में दो युवा चेहरे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट. दोनों का पर्याप्त जनाधार है. हालांकि पार्टी हाईकमान इन दोनों नेताओं को डिप्टी सीएम बनाकर राज्य काफी हद तक पार्टी में जारी घमासान कम कर सकते हैं.



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राजस्थान में दो बार के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत और पूर्व सांसद सचिन पायलट एक ही लाइन में खडे हैं. दोनों की भूमिका विधानसभा चुनावों में बेहद महत्वपूर्ण रही. दोनों मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं.

मध्य प्रदेश में भी पूर्व केंद्रीय मंत्री और लंबे समय तक सांसद रहे प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ हैं तो वहीं गुना से युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री पद के दावेदार देखे जा रहे हैं.

दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री पद के दो-दो सटीक दावेदार देख, कांग्रेस के आलाकमान 1998 में चली गई चाल दोहरा सकते हैं. उस वक्त अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे और पहली बाहर कांग्रेस ने कमला बेनिवाल को डिप्टी मुख्यमंत्री बनाया था.

मध्यप्रदेश में 1980 में कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह की कैबिनेट में शिव भानु सिंह सोलंकी डिप्टी सीएम रह चुके हैं. इसके बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे सुभाष गंगाराम यादव 1993 से 1998 के दौरान दिग्विजय सिंह सरकार में डिप्टी सीएम का कार्यभार संभाल चुके हैं. उनके बाद 1998 में ही जमुना देवी डिप्टी सीएम बनाई गईं.

नए चेहरे से कैसा है डर
राजस्थान पर पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ का मानना है कि भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है. इसलिए किसी भी नौसिखिया को प्रांत की जिम्मेदारी देने से पहले कांग्रेस के हाईकमान 10 बार सोचेंगे. बारेठ के मुताबिक अक्सर राजनीतिक पार्टियां नेता चुनने से पहले राजनीति, प्रशासन, जाति व्यवस्था और भूगोल पर मंथन करती हैं.

किसी भी नए नेता को बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार करने से पहले उसे डिप्टी सीएम बनाना ज्यादा बेहदतर है. वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं कि यह नई पीढ़ी और युवा पीढ़ी के बीच बैलेंस बराबर रख सकता है. उनका मानना है कि कांग्रेस क्षेत्रीय स्तर पर अच्छे नेताओं की कमी से जूझ रही है. कांग्रेस को ऐसे नेता की जरूरत है जिसकी पैठ सभी वर्ग में हो.

बारेठ के मुताबिक 1998 में बेनीवाल को डिप्टी सीएम बनाने के पीछे कांग्रेस ने जातीय समीकरणों पर मंथन किया था. इसी वजह से उन्हें लाया गया था.

डिप्टी सीएम की जरूरत क्यों
राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर मानते हैं कि मध्य प्रदेश की राजनीति में ऐसे उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि डिप्टी सीएम का चुनाव उस पर निर्भर करता है जिसे राज्य की कमान मिलने वाली होती है. उनके मुताबिक अगल कमलनाथ मुख्यमंत्री बनते हैं तो डिप्टी सीएम की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि डिप्टी सीएम की जरूरत तब पड़ती है जब मुख्यमंत्री का व्यक्तित्व कमजोर हो.

उदाहरण देते हुए गिरिजा शंकर बताते हैं अर्जुन सिंह जब मुख्यमंत्री चुने गए थे तो उनके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं था. लेकिन दिल्ली के दबाव के चलते उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. वहीं सोलंकी को लोगों ने सपोर्ट किया था तभी उन्हें डीप्टी सीएम बनाया गया.

शंकर के मुताबिक पर्याप्त जनाधार वाले नेता को डिप्टी सीएम इसलिए बनाया जाता है जब सीएम की स्वीकार्यता राज्य में पर्याप्त नहीं होती है. कमलनाथ मध्यप्रदेश में वरिष्ठ नेता हैं इसलिए उनकी उम्मीदवारी ज्यादा महत्वपूर्ण है.

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शंकर का मानना है कि शुरुआती इलेक्शन कैंपेनिंग के दौरान कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया एक कतार में खड़े नजर आ रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे कमलनाथ की दावेदारी बढ़ती गई और अब कमलनाथ के अलावा दूसरा या तीसरा कोई नाम नहीं है.

शंकर कहते हैं, 'कमलनाथ के लिए मुख्यमंत्री पद का रास्ता साफ होने के पीछे दो कारण हैं. पहला कारण है कि राज्य के दो प्रमुख नेता अरुण यादव और अजय सिंह राहुल भले ही जनता में न प्रसिद्ध हों लेकिन उनकी ओर से थोड़ा सा प्रतिरोध मिलेगा अगर कमलनाथ मुख्यमंत्री पद पर चुने जाते हैं. दूसरा जातीय समीकरण को तभी संभाल लिया गया था जब जुलाई में कमलनाथ ने कार्यकारी समिति बनाई थी. समिति में एससी, एसटी और ओबीसी नेताओं को तरजीह दी गई थी. इसलिए सरकार बनाने के लिए किसी तरह का समीकरण बनाने की जरूरत नहीं है. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए कमलनाथ तैयार हैं.'

कांग्रेस ने अब तक दोनों राज्यों में किसी एक नेता को ज्यादा तरजीह देने से परहेज करती रही है. राजस्थान में बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाकर पेश भी किया राज्य में सीएम पद का दावेदार तक नहीं है. इसलिए सीधी लड़ाई की कोई बात ही नहीं है.

सचिन पायलट अक्सर उन सवालों का जवाब देने से कतराते नजर आए जब यह उनसे पूछा गया कि राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन है. पार्टी के दो खेमें में बंटे होने पर भी हमेशा पायलट मुकरते आए हैं. उन्होंने कई बार कहा कि मुख्यमंत्री पद किसे मिलेगा यह पार्टी तय करेगी. हम कभी भी चुनावों से पहले मुख्यमंत्री चेहरे का ऐलान नहीं करते हैं. इलेक्शन के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक मुख्यमंत्री चुनते हैं.

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