OPINION: चिदंबरम जी, शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम कार्ड खेलकर ही आर्टिकल 370 को हासिल किया था!

देश के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम (P. Chidambaram) अपने बयानों से विवाद पैदा कर अक्सर चर्चा में रहते हैं. एक बार फिर से उन्होंने यही काम किया है अनुच्छेद 370 (Article 370) की समाप्ति से जुड़ा यह ताजा बयान देकर.

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 12, 2019, 7:19 PM IST
OPINION: चिदंबरम जी, शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम कार्ड खेलकर ही आर्टिकल 370 को हासिल किया था!
देश के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम अपने बयानों से विवाद पैदा कर अक्सर चर्चा में रहते हैं. (Photo- PTI)
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 12, 2019, 7:19 PM IST
अगर जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) हिंदू बहुल राज्य होता, तो बीजेपी (BJP) अनुच्छेद 370 (Article 370) को कभी खत्म नहीं करती. बीजेपी ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि इस इलाके में मुस्लिमों की बहुलता है. यह बयान है पी. चिदंबरम (P. Chidambaram) का.

देश के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम अपने बयानों से विवाद पैदा कर अक्सर चर्चा में रहते हैं. एक बार फिर से उन्होंने यही काम किया है अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जुड़ा यह ताजा बयान देकर. सवाल उठता है कि अनुच्छेद 370 को बीजेपी ने सिर्फ इसलिए समाप्त करने का फैसला किया, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों की बहुलता है. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या अगर जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल नहीं होता, तो क्या इसके लिए विशेष सहूलियत के तौर पर अनुच्छेद 370 का प्रावधान करने की जरूरत पड़ती भी क्या.

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, उस वक्त सरदार पटेल (Sardar Patel) भारत में 562 देसी रियासतों को अपने साथ जोड़ चुके थे. सिर्फ तीन बड़ी रियासतें ऐसी थीं, जिन्होंने भारत के साथ जुड़ने में तब तक आनाकानी की थी. ये तीन रियासतें थीं- जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़. जम्मू-कश्मीर में मुस्लिमों की तादाद अधिक थी, तो हैदराबाद और जूनागढ़ में हिंदुओं की. खास बात ये थी कि मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह (Maharaja Hari Singh) जहां हिंदू थे, वही हिंदू बहुल हैदराबाद के शासक निजाम मीर उस्मान अली खान थे, तो जूनागढ़ के शासक नवाब महाबत खान तृतीय.

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, उस वक्त सरदार पटेल भारत में 562 देसी रियासतों को अपने साथ जोड़ चुके थे. (Photo-PTI)


...इस तरह भारत में शामिल हुईं तीन रियासतें
ये तीनों अविभाजित भारत की बड़ी रियासतों में शुमार होती थीं. दरअसल, हैदराबाद के निजाम और कश्मीर के महाराजा भारत या पाकिस्तान किसी भी डोमिनियन में शामिल न होकर स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के ख्वाब देख रहे थे. वहीं जूनागढ़ के नवाब, जिनका कुत्ता प्रेम काफी मशहूर था, वो या तो हैदराबाद और कश्मीर की तर्ज पर स्वतंत्र बने रहने की इच्छा रख रहे थे या फिर इसमें दिक्कत आने पर वो भारत की जगह पाकिस्तान में शामिल होने का मन बना रहे थे. जूनागढ़ के नवाब को एक बड़ा भय ये भी था कि स्वतंत्र भारत के साथ जुड़ने पर उनके कुत्तों को जहर देकर मार दिया जाएगा. नवाब के मन में ये भय मुस्लिम लीग के कुछ नेताओं ने डाल दिया था जो हर कीमत पर जूनागढ़ को पाकिस्तान से जोड़ने की जुगत में लगे थे. लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था. इन तीनों ही रियासतों के शासकों के मंसूबे पूरे नहीं हुए.

इन तीन के भारत में विलय की लंबी कहानी का सार ये है कि कश्मीर के महाराजा हरि सिंह भारत के साथ जुड़ने के करारनामे पर 26 अक्टूबर, 1947 को तब हस्ताक्षर करने को मजबूर हुए, जब पाकिस्तान ने कबाइलियों की मदद से कश्मीर पर हमला कर दिया और महाराजा को अपनी राजधानी श्रीनगर छोड़कर जम्मू आना पड़ा. जूनागढ़ में प्रजा के विद्रोह के कारण नवाब को अपनी रियासत छोड़ कर पाकिस्तान भागने को मजबूर होना पड़ा, जिस रियासत का उसने तकनीकी तौर पर पाकिस्तान में विलय कर दिया था. नवाब के भागने के बाद अस्थायी सरकार बनाई गई, जिसके अनुरोध पर भारत सरकार के प्रतिनिधि ने 9 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ का शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया.
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हैदराबाद के मामले में रजाकरों का आतंक बढ़ने और बहुसंख्यक हिंदू प्रजा पर उनके अत्याचार के मद्देनजर वहां 13 सितंबर 1948 को भारतीय फौज ने कूच किया, जिसे पुलिस एक्शन कहा गया. करीब एक सौ आठ घंटे में ही भारतीय सेना ने अपने काम को अंजाम दिया, जिसे ‘ऑपरेशन पोलो’ के तौर पर सैन्य इतिहास के पन्नों में जाना जाता है. 17 सितंबर 1948 को निजाम की सेना ने भारतीय फौज के सामने आत्म समर्पण किया और इस तरह हैदराबाद के निजाम भारत में अपनी रियासत का विलय करने को मजबूर हो गए.

कश्मीर में क्यों लागू हुआ अनुच्छेद 370
सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि आजादी के बाद महज तेरह महीने के अंदर भारत के पाले में आने को मजबूर हुई इन रियासतों में से हैदराबाद और जूनागढ़ के लिए अनुच्छेद 370 जैसा कोई प्रावधान नहीं करना पड़ा, लेकिन जम्मू-कश्मीर के मामले में ऐसा किया गया. ये सवाल संविधान सभा की बैठक के दौरान भी उठाया गया था, जब कश्मीर मामले को देख रहे जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) सरकार के मंत्री एन गोपालस्वामी आयंगर (N Gopalaswami Ayyangar) ने 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 306ए के नाम से एक नई व्यवस्था डालने का प्रस्ताव रखा. यही अनुच्छेद 306ए बाद में अनुच्छेद 370 के नाम से मशहूर हुआ, जिसके ज्यादातर प्रावधानों को आखिरकार इसी 6 अगस्त को नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की सरकार ने संसद में प्रस्ताव पास कराने के साथ ही राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद दफन कर दिया है.

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इसी 6 अगस्त को नरेंद्र मोदी की सरकार ने संसद में प्रस्ताव पास कराने के साथ ही राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अनुच्छेद 370 दफन कर दिया है. (Photo- PTI)


ध्यान रहे कि जब आयंगर ने अनुच्छेद 306ए को पास करने के लिए संविधान सभा से अनुरोध किया था, उस वक्त किसी हिंदू ने नहीं, बल्कि मौलाना हसरत मोहानी (Hasrat Mohani) ने ये सवाल खड़ा किया था कि जब जम्मू-कश्मीर को विशेष सुविधा दी जा सकती है, तो फिर बड़ौदा जैसी रियासत को क्यों नहीं, जिसका प्रशासन जम्मू-कश्मीर से काफी बेहतर रहा है और जिसे जबरदस्ती बंबई प्रांत का हिस्सा बनाया जा रहा है. मोहानी ने साफ तौर पर कहा था कि सिर्फ शेख अब्दुल्ला (Sheikh Abdullah) को खुश करने के लिए ऐसा किया जा सकता है तो फिर बड़ौदा जैसी रियासत का क्या दोष, जिसने अपने कुशल प्रशासन और सुधारों से अपने लिए खास जगह बनाई है.

आयंगर ने उस समय साफ तौर पर कहा था कि जम्मू-कश्मीर की विशेष परिस्थितियों के कारण अस्थाई तौर पर इस तरह का प्रबंध किया जा रहा है, क्योंकि एक तरफ जहां ये मामला सुरक्षा परिषद के पचड़े में फंसा हुआ है, वहीं इसका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है. साथ ही जम्मू-कश्मीर में कोई संविधान सभा भी नहीं है, जो इस मसले पर विचार कर सके. आयंगर के मुताबिक वहां की सरकार महज एक राजनीतिक पार्टी यानी नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं वाली थी. जब तक जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान सभा का निर्माण उचित तरीके से चुनाव के बाद नहीं होता, तब तक महाराजा कश्मीर से हुए विलय समझौते के तहत भारत सरकार सिर्फ वैदेशिक मामलों, सुरक्षा और संचार से जुड़े प्रावधान ही भारतीय संविधान के तहत जम्मू-कश्मीर में लागू करेगी, बाकी प्रावधान राज्य की संविधान सभा के गठन और उसकी सहमति के बाद लागू किए जाएंगे और तब अनुच्छेद 306ए के इस अस्थाई प्रावधान को खत्म कर दिया जाएगा.

अनुच्छेद 306ए, जो भारतीय संविधान (Indian Constitution) के लागू होने के साथ ही अनुच्छेद 370 के तौर पर अगले सत्तर वर्षों तक लगातार विवाद के केंद्र में रही, उसकी उपधारा 3 में ही राष्ट्रपति को ये अधिकार दिया गया था कि वे सार्वजनिक विज्ञप्ति से इस आर्टिकल के अंश या मुकम्मल तौर पर इसे अप्रभावी करने की घोषणा कर सकते हैं. सवाल ये उठता है कि आखिर ये अस्थाई धारा क्यों सत्तर साल तक लगातार चलती रही, वैसा न हो पाया, जैसा खुद नेहरू ने कहा था कि बहुत जल्दी ये घिसते-घिसते घिस जाएगी.

नेहरू के साथ किया वादा नहीं निभाया शेख अब्दुल्ला ने
दरअसल, जिस शेख अब्दुल्ला के प्यार में नेहरू ने मंत्रिमंडल के अपने साथियों के विरोध के बावजूद अनुच्छेद 370 को न सिर्फ लागू किया, बल्कि जारी रखा, वो शेख अब्दुल्ला नेहरू के साथ किए गए अपने वादों को भी ईमानदारी से नहीं निभा पाये, बल्कि पहला मौका मिलते ही दगाबाजी पर उतर आए. जो शेख हिंदू-मुस्लिम एकता के सिपाही के तौर पर अपने आपको गांधी और जवाहरलाल नेहरू के सामने पेश करते थे, उनके दिल में अगर कुछ था तो सिर्फ मुस्लिम हित को लेकर आगे बढ़ना. मुस्लिम हित से आगे बढ़ता हुआ उनका ये सफर जल्दी ही निजी हित में तब्दील हो गया, जिसका अंदाजा नेहरू को महज तीन-चार सालों में लग गया. खुद नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए ही शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त करते हुए जेल में डाला गया. नेहरू के पास कोई विकल्प बचा नहीं था, क्योंकि दिल्ली में राष्ट्रवादी बनने वाले शेख कश्मीर की घाटी में पहुंचते-पहुंचते संकीर्ण विचारों वाले सांप्रदायिक नेता बन जाते थे. वहां वो घाटी के मुस्लिमों के भारत पर विश्वास न होने की बात कर हमेशा अपने लिए विशेष स्थिति की मांग करते थे, जो कई बार स्वतंत्र कश्मीर की मांग तक पहुंच जाती थी.

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जो शेख हिंदू-मुस्लिम एकता के सिपाही के तौर पर अपने आपको गांधी और जवाहरलाल नेहरू के सामने पेश करते थे, उनके दिल में अगर कुछ था तो सिर्फ मुस्लिम हित को लेकर आगे बढ़ना. (Photo- Wikicommons)


यही वजह थी कि अनुच्छेद 370, जिसके बारे में सोच ये थी कि वो महज कुछ वर्षों के अंदर खत्म हो जाएगी, लगातार खिंचता रहा. ये जरूर हुआ कि 9 अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त किए जाने के बाद सत्ता में आए बख्शी गुलाम मोहम्मद ने भारतीय संविधान के कई हिस्सों को जम्मू-कश्मीर में लागू कर दिया. मसलन सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के न्याय क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर आ गया और केंद्रीय चुनाव आयोग जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव कराने लगा.

बाद के दिनों में प्रधानमंत्री और सदर-ए-रियासत जैसे पदनाम भी तब्दील हुए और आगे चलकर जम्मू-कश्मीर में भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री की परिपाटी शुरु हुई। इसके बाद अगले छह दशकों में जम्मू-कश्मीर के अंदर भारतीय संविधान के कई बड़े हिस्से एक के बाद एक लागू होते रहे, लेकिन अनुच्छेद 370 को खत्म नहीं किया जा सका. एक वजह तो यह थी कि कश्मीर की राजनीति में अब्दुल्ला परिवार लगातार तीन पीढ़ियों तक बना रहा. दूसरी तरफ, केंद्र सरकार इस खौफ के मारे इसे हटाने के फैसले को टालती रही कि इससे मुस्लिम नाराज होंगे, पाकिस्तान नाराज होगा और दुनिया में पता नहीं क्या संदेश जाएगा. लेकिन इसकी वजह से ये सवाल भी लगातार उठता रहा कि आखिर जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 क्या सिर्फ इसलिए बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं. अगर यही आधार है, तो फिर सबके लिए समान प्रावधान की बात करते हुए एक ही देश में इस तरह का विशेषाधिकार देकर किसी खास समुदाय को प्रोत्साहित करने का मतलब क्या.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के बाद तेज हुआ विरोध
23 जून 1953 को श्रीनगर (Srinagar) में रहस्यमय परिस्थितियों में भारतीय जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के कारण अनुच्छेद 370 के विरोध की आंधी बहनी शुरू हुई. लेकिन इस आंधी को तूफान बनने में अगले साढ़े छह दशक लग गए और आखिरकार जनसंघ की उत्तराधिकारी बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के दौर में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति हुई है. मुखर्जी ने नारा दिया था – एक देश में दो विधान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो निशान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे. उनके इस नारे को पूरी सफलता अब जाकर मिली है, जब शेख अब्दुल्ला की तरफ से खेले गए मुस्लिम कार्ड को तवज्जो देने वाली सरकार दिल्ली में सत्ता में नहीं है. बल्कि वो सरकार है, जिसकी नीति खास तौर पर मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति का विरोध करने की रही है और जो मानती है कि आर्टिकल 370 के कारण ही कश्मीर घाटी के लोग पूरी तरह से भारत से जुड़ नहीं पाए, बल्कि वहां अलगाववाद पनपा.

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First published: August 12, 2019, 7:08 PM IST
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