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शापित सभ्यताओं का डोब कुंड, जहां खुले आसमान तले बिखरी पड़ीं हैं सैकड़ों खंडित मूर्तियां, शिलालेख

शापित सभ्यताओं का डोब कुंड, जहां खुले आसमान तले बिखरी पड़ीं हैं सैकड़ों खंडित मूर्तियां, शिलालेख

यहां 10 हजार साल पुराने शैलाश्रय और शैलचित्र मिलते हैं

यहां 10 हजार साल पुराने शैलाश्रय और शैलचित्र मिलते हैं

मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले स्थित डोब कुंड में आदिमानवों के शैलाश्रय, शैल चित्रों के अलावा हजार साल पुरानी नगरीय सभ्यता के भग्नावशेष, भग्न हरगौरी, जैन मंदिर, ध्वस्त स्तंभ, शिलालेख, सैकड़ों की संख्या में बिखरी पड़ीं खंडित मूर्तियां, शेरों के विशालकाय पिंजरे देखकर आप चौक जाएंगे.

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सदी दर सदी वक्त के थपेड़ों की मार सहते, बाढ़, बारिश, तूफानों से टकराते, लड़ते, जूझते हुए कई बार बनी और तबाह हुई सभ्यता का अक्स है डोब कुंड. डोब कुंड यानी घने जंगलोंं पत्थरों के बीच वो इलाका, जिसमें दाखिल होते ही लगेगा कि आप अबूझ, रहस्य, रोमांच से भरे ऐसे संसार में दाखिल हो गए हैं, जहां चंद पलों के भीतर हजारों सालों के इंसानी वजूद, सभ्यताओं के जन्म से लेकर तबाही तक के सफर का हाल देख रहे होंं. अगर तबाही के इस मंंजर और दर्द को आप महसूस कर सकें तो खुले आसमान तले पुरातत्व महत्व की विरासत को लावारिस हालत में पड़ा देखकर दर्द से कराह उठेंगे.

आदिमानवों के शैलाश्रय, शैल चित्रों के अलावा हजार साल पुरानी नगरीय सभ्यता के भग्नावशेष, भग्न हरगौरी, जैन मंदिर, ध्वस्त स्तंभ, शिलालेख, सैकड़ों की संख्या में बिखरी पड़ीं खंडित मूर्तियां, शेरों के विशालकाय पिंजरे देखकर आप चौंक जाएंगे. प्राचीन सभ्यता और पुरातत्व महत्व की इस अनमोल धरोहर को बचाने, संवारने और सहेजने के लिए सरकार की विशेष पहल की दरकार है.

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मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के कराहल तहसील क्षेत्र में 52 किलोमीटर दूर गोरस-श्यामपुर मार्ग पर सघन वन क्षेत्र के दायींं ओर एक मार्ग फूटता है, जहां से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित है डोब कुंड. प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान काल तक कई सभ्यताओं के साक्षी रहे डोब कुंड में जहां करीब 10 हजार साल पुराने शैलाश्रय और शैलचित्र मिलते हैं, वहीं 10-11 वीं शताब्दी में डोबकुंड कभी कच्छपयात राजाओं की राजधानी हुआ करता था. यहां के राजा यूं तो हिंदू देवी-देवताओं, प्रकृति स्वरूपों के उपासक थे, उन्होंने हरगौरी मंदिर व अन्य मंदिर बनवाए थे, लेकिन राजा धर्म को लेकर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करते थे. उन्होंने हिंंदू होते हुए भी जैन मंदिर का निर्माण कराया. साथ ही इस मंदिर की व्यवस्था मेंं सभी वर्गों को शामिल किया.

किवदंतियों का डोब कुंड
डोबकुंड में हमने जो कुछ देखा, उसे लेकर उपजी जिज्ञासाओंं और सवालों का साक्ष्यों और किवदंतियोंं के आधार पर समाधान किया कैलाश पाराशर ने. श्योपुर जिले की संस्कृति और इतिहास पर उनका विशेष अध्ययन है. अध्ययन के मुताबिक राजा विक्रमसिंह ने डोब को राजधानी बनाया था. उस समय यह नगर बहुत सुंदर हुआ करता था. गुजरते वक्त के साथ प्राकृतिक आपदाओं के चलते इस सुंदर नगरी की सभ्यता टुकड़े -टुकड़े होकर कुंड में तिरोहित हो गई. तो यह नगर डोबकुंड कहलाया होगा. यहां दो प्राकृतिक कुंड हैं, एक कुंड से नदी का उदगम है.

डोबकुंड जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे किसी के श्राप से ये शापित बिखरी पड़ी खंंडित मूर्तियां आपस में बातें कर रहीं हों. यहां सुंदर मूर्तियां तो दिखती हैं, लेकिन उन्हें गढ़ने वाले हाथ अतीत हो गए. आप मौजूदा हाल में इसे शापित सभ्यताओं का डोब कुंड भी कह सकते हैंं, जहां पिकनिक मनाने, देखने आने वाले तो बहुत से लोग हैं, लेकिन कद्र करने वाला कोई नहीं. खंडित मूर्तियों, स्तंभों, शिलालेखों पर पैर रखकर या टिक कर फेसबुक, टिवटर, इंस्टाग्राम पर डालने के लिए स्टाइलिश फोटो खिंचवाने से ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखती.

कुछ मूर्तियां संग्रहालयों में सज गईं, कुछ तस्कर उठा ले गए
यहां पूरे डोब क्षेत्र में बिखरी सैकड़ों मूर्तियों के अलावा बड़ी संख्या में मूर्तियां ग्वालियर, मुरैना और श्योपुर के संग्रहालयों में हैं. कई मूर्तियां तस्करों ने ऊंचे दामों में बेच दीं, जो देश-विदेश में ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही हैं. डोब कुंंड की कुछ देवी-देवताओं की मूर्तियां रांची पहुुंच गई हैं. लखनऊ संग्रहालय में डोब कुंड से लायी भगवान आदिनाथ की खडगासन में प्राचीन प्रतिमा स्थापित है! श्योपुर किले में भी डोब कुंड से प्राप्त सैकड़ों जैन प्रतिमाएं व मंदिर के अवशेष रखे हैं, जो 10वीं, 11वीं सदी और उससे भी पुराने हैं. किले के मुक्ताकाश में डोब कुंड से लाई गईंं भगवान शिव, ब्रह्मा, द्वारपालों, देवी चंवर धारिणी, घट, शंख धारिणी, जैन तीर्थंकरोंं आदि दर्जनों मूर्तियां, मंदिरों के अवशेष रखे हुए हैं.

कहते हैं शिलालेख, कैसे बने यहांं जैन मंदिर
पाराशर ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि संवत 1923 (1866 ईसवी) में कैप्टन मेन विले ने दो शिलालेख यहां खोज निकाले, जिनमें से एक शिलालेख में 61 पंक्तियां हैं, जिसमें प्रथम पंक्ति के कुछ भाग तथा 56 से 61 पंक्तियों को छोड़ श्लोक हैं, जिनकी भाषा संस्कृत है. इस शिलालेख में डोब नगर का वर्णन है. यह शिलालेख विक्रम संवत 1145 (1088 ईसवी) का विक्रम सिंह कच्छपयात के समय का है. इसमें विक्रम सिंह कच्छपयात से पहले उनके कौन से वंशज राजा बने, भोजपाल (वर्तमान में भोपाल) के गोंड राजा से उनके संबंधों का उल्लेख है.

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विक्रम सिंह कच्छपयात ने डोब की राजगद्दी संभालने, डोब को राजधानी का दर्जा देने के बाद जैनमुनि शांति देव के प्रभाव में आकर यहां नगर वासियों के माध्यम से विशाल जैन मंदिर का निर्माण कराया. नागरिकों को प्रेरित जैन मुनि के शिष्य विजय कीर्ति ने किया था. उस काल में मंदिर के संचालन के लिए अनाज के रूप में कर वसूला जाता था तथा तेल निकालने का काम करने वालों को मंदिर के लिए तेल दान देना होता था.

3 टुकड़ों में बंटी अर्हनाथ की मूर्ति
डोब कुंड में मुख्यद्वार के दाहिनी ओर खड़गासन तीर्थंंकर की तीन मूर्तियां स्थापित की गई थीं. इनमें महावीर स्वामी की लगभग 10 फीट ऊंची मूर्ति कुछ हद तक सुरक्षित है. स्वामी अर्हनाथ की मूर्ति को चोरी के चक्कर में गिरा दिया गया. आगे भव्य और भग्न हरगौरी मंदिर है, जहां पार्षद की मुद्रा में हनुमान जी की अति सुंदर प्रतिमा है. पास में ही एक भग्न राजमहल है और उसी के पास एक और जैन मंदिर है, जो पत्थरों के ढेर में तब्दील हो गया है.

चमत्कृत करती है जैन मंदिर की स्थापत्य कला
यह मंदिर आज चाहे भग्नावस्था में पहुंंच गया हो, लेकिन उसकी स्थापत्य कला चमत्कृत करती है. यहां का मूर्ति शिल्प बेजोड़ है. मंंदिर में 81 फीट के चबूतरे चौबीसी का निर्माण किया गया है.चौबीसी के चारों ओर एक प्लेटफार्म पर गजरथ का निर्माण कर इसे सुुंदरता प्रदान की गई है. कलात्मक चौबीसी के प्रत्येक भाग तीर्थंकर विराजमान थे, पर अब ये खाली है. बताते हैं कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो कलात्मक स्तंभ थे, जो नजर नहीं आते.

पत्थरों के ढेर में तब्दील हो गया डोब, दूर तक बिखरे पड़े हैं अवशेष
इस बारे में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक यहां विक्रम संवत 1156 (1129 ईसवी) विक्रम संवत 1124 (1067 ईसवी) तथा विक्रम संंवत 1202 (1145 ईसवी) की लेखयुक्त जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं. किले के परकोटे से होकर दूसरे कुंड तक जाने का मार्ग है. परकोटे के बाहर भी डोबकुंड के अवशेष नजर आते हैं, जो काफी दूर तक बिखरे पड़े हैं. जो यह दिखाते हैं कि यह काफी विशाल तथा सुव्यवस्थित नगर था, पर अभी तो डोब पत्थरों के ढेर में तब्दील हो गया है.

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अकेले डोब क्षेत्र में ही 15–20 शैलाश्रय मिले हैं, जिनमें रहने वाले आदिमानवों ने अपने हाथों से अमिट शैलचित्रों का निर्माण किया था. इन शैलचित्रों को यहां आए पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 10 हजार वर्ष पुराना बताया था. इन शैलचित्रों में चिड़िया और मानव की आकृतियों के साथ-साथ कुछ ज्यामितीय आकृतियां भी शामिल हैं. कूनो नेशनल पार्क के अंतर्गत आने वाला डोब कुंड क्षेत्र 118 साल पहले शेरों को रखने के लिए बनाए बड़े-बड़े बैरकनुमा पिंजरोंं के लिए भी मशहूर है. इन पिंजरों को सिंधिया राजवंश के माधौराव सिंंधिया ने 1904-05 में बनवाया था.

डोबकुंड क्षेत्र को चाहिए संरक्षण
बताया जाता हैै कि कुछ साल पहले ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने डोब कुंंड को अपने संरक्षण में लेने की पहल की थी, लेकिन स्टेेट ऑर्कियोलॉजििकल डिपार्टमेंट ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, उसकी मंशा डोब कुंड को अपने पास रखने की थी, कहने को तो कूनो पालपुर वनमंंडल के अंतर्गत आने वाले डोब कुंड क्षेत्र में प्रवेश करते ही श्योपुर जिला पुरातत्व एवंं पर्यटन परिषद के सौजन्य से एक बोर्ड लगा मिलता है, लेकिन सैलानियों की सुरक्षा, उनके खानपान के लिए कैंटीन, धूप-बारिश से बचाव के लिए जरूरी शेल्टर की व्यवस्थाओं की दरकार है. इसके अलावा डोबकुंंड जाने वाले सैलानी शैलचित्रों और शैलाश्रयों को भलीभांति देख सकें, इसके लिए सीढ़ियों और सुव्यवस्थित पहुंच की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत है. अब जब कूूनो नेशनल पार्क में अफ्रीकी चीतों को लाने की तैयारियां चल रही हैं, ऐसे में डोब कुंंड क्षेत्र को संरक्षण में लेते हुए ईको पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित किया जाता है, तो यह सैलानियां को आकर्षित करने की दिशा में बड़ा कदम होगा.
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सैलानियों की सुरक्षा, उनके खानपान के लिए कैंटीन, धूप-बारिश से बचाव के लिए जरूरी शेल्टर, डोब कुंड तक जाने के लिए सीढ़ियों, आदि व्यवस्थाओं की दरकार है, ताकि सैलानी शैलचित्रों और शैलाश्रयों को भलीभांति देख सकें- कैलाश पाराशर, संस्कृति, इतिहासविद्, श्योपुर.

Tags: News18 Hindi Originals

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