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नगालैंड के विद्रोही गुट NSCN-K चीफ ने कहा, हमें चीन से पहले भी मदद मिली, आगे भी मिलेगी

News18Hindi
Updated: November 1, 2019, 4:49 PM IST
नगालैंड के विद्रोही गुट NSCN-K चीफ ने कहा, हमें चीन से पहले भी मदद मिली, आगे भी मिलेगी
एनएससीएन के (NSCN-K) के पूर्व मुखिया खापलांग (दाएं) के साथ वर्तमान चीफ यंग औंग (Yung Aung).

मीडिया को दिए पहले इंटरव्यू में न्यूज़ 18 (News18) से ख़ास बातचीत में निर्वासित नगा सरकार के अध्यक्ष यंग औंग (Yung Aung) ने विद्रोह और नगालैंड (Nagaland) के भविष्य की चर्चा की. उनकी बात से इस बात का भी संकेत मिल गया कि पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने में चीन का भी हाथ है.

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बीजू कुमार डेका
नगालैंड के विद्रोही समूह एनएससीएन(के) के अध्यक्ष यंग औंग ने कहा है कि शुरुआती दिनों में चीन की ओर से नगा विद्रोहियों को मदद मिली. इसके लिए वह हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे. उम्मीद है कि हमें जब जरूरत होगी, तब उससे मदद मिलेगी. उन्होंने कहा, यद्यपि चीनी ताकत जरूरी है पर नगालैंड के लोगों की ताकत इस संघर्ष की असली ताकत है, मीडिया को दिए अपने अब तक के पहले इंटरव्यू में न्यूज़ 18 से ख़ास बातचीत में निर्वासित नगा सरकार के अध्यक्ष ने विद्रोह और नगालैंड के भविष्य की चर्चा की.

नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नगालैंड के खापलांग धड़े (एनएससीएन-के) ने अगस्त 2018 में अध्यक्ष खंगो कोन्याक के स्थान पर युंग औंग के रूप में अपने नए प्रमुख का चुनाव किया. युंग औंग मात्र 46 साल के हैं. कोन्याक की उम्र 70 वर्ष से अधिक है. उन्होंने जुलाई 2017 में एसएस खापलांग की 6 जून को हुई मौत के बाद इस गुट के अध्यक्ष का पद संभाला. कोन्याक को मई 2011 में इस प्रतिबंधित गुट का उपाध्यक्ष चुना गया था.

नव नियुक्त अध्यक्ष युंग औंग इस गुट के ‘डिफेंस किलोंसेर’ के रूप में कार्य कर रहे थे. ऐसा माना जाता है कि यूनाइटेड लिबरेशन ऑफ़ असोम-इंडिपेंडेंट (यूएलएफए-आई) के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ के साथ उनके घनिष्ठ संबंध हैं. युंग औंग ने कहा, 'आज चीन सहित पूरी दुनिया हमारे मसले पर ज्यादा ध्यान दे रही है. नगा लोग अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में सहयोग और नैतिक समर्थन के लिए हमेशा ही चीन के शुक्रगुजार रहे हैं. एक संघर्षशील देश के रूप में, यह सही है कि नगाओं को मदद की जरूरत है, पर हम अपनी सीमाओं को जानते हैं.' न्यूज़ 18 की विशेष पेशकश-

आजाद नगा राष्ट्र की मांग के लिए क्या तत्मादाव (म्यांमार सेना) और शक्तिशाली भारतीय सेना के ऑपरेशन को रोकना संभव है?
युंग औंग: जब तक भारत और म्यांमार का हमारे देश में प्रभुत्व रहेगा, संघर्ष होगा ही. हम तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर लेते. हम उनके संयुक्त राजनीतिक और सैनिक ऑपरेशन को रोक नहीं सकते, क्योंकि हमारे संघर्ष को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए उनके पास यह एकमात्र विकल्प है. पर इसका मतलब यह नहीं है कि एनएससीएन/जीपीआरएन कमजोर हो जाएगा. तथ्य यह है कि इस समय हम पहले से कहीं अधिक मजबूत हैं. जब तक हमारे पास हमारे अधिकार हैं और लोगों का समर्थन हमें मिल रहा है, दुनिया की कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती है.

भारत सरकार एनएससीएन-आईएम और अन्य एनएनपीजी के साथ समझौता करने जा रही है. आपका क्या कहना है?
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युंग औंग : एनएससीएन/जीपीआरएन भारत सरकार, एनएससीएन (आईएम) और एनएनपीजी के बीच हो रही बातचीत भारतीय संविधान के दायरे में हो रही है और पूर्ण आजादी के लिए नगा संघर्ष से इसका कोई लेना-देना नहीं है.  जब तक भारत यह सोचता है कि नगा राजनीतिक समस्या उसका आतंरिक मुद्दा है, तब तक इसका कोई अच्छा हल नहीं निकलेगा.

आज हर आदमी जानता है कि एनएनपीजी को सिर्फ वर्तमान नगालैंड राज्य के नगाओं से ही मतलब है. ये ‘भ्रम में जीनेवाले’ नगा हैं, जिनके पास कोई ठोस एजेंडा नहीं है; इसलिए वे संपूर्ण नगा राजनीतिक मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं करते. आज हमारा स्टैंड स्पष्ट है. पूरी आजादी के अलावा, भारत से किसी और बात की मांग या उसके साथ बहस का कोई अर्थ नहीं है. अगर भारत नगाओं की विशिष्ट राजनीतिक स्थिति को स्वीकार करता है तो उसे मुख्य मुद्दों से निपटने में व्यावहारिकता का परिचय देना चाहिए. जब ब्रिटिश ने पूरी आजादी दी, तो भारत को नगा संप्रभुता को स्वीकार करना क्यों मुश्किल लग रहा है.

क्या चीन आपके आन्दोलन को मदद देने के लिए तैयार है?
युंग औंग : आज चीन सहित पूरी दुनिया हमारे मसले पर ध्यान दे रही है. नगा लोग अपने संघर्ष के शुरूआती दिनों में सहयोग और नैतिक समर्थन के लिए हमेशा ही चीन के शुक्रगुजार रहे हैं. एक संघर्षशील देश के रूप में, यह सही है कि नगाओं को मदद की जरूरत है, पर हम अपनी सीमाओं को जानते हैं. हर बात के लिए हम दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते. हम चीन का आदर करते हैं और एक वैश्विक ताकत के रूप में उसकी स्थिति को समझते हैं. एक समय आयेगा जब नगाओं को उसकी मदद की एक बार फिर जरूरत पड़ेगी. आज, हमारे नगा लोगों का निरंतर समर्थन और सहयोग समय की मांग है. यह उनकी ताकत और उम्मीद ही है जो हमें अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के लिए जरूरी ऊर्जा और ताकत देती है.

अगर म्यांमार-भारत सरकार आपको बातचीत के लिए आमंत्रित करती है तो क्या आप बातचीत करेंगे?
युंग औंग : एनएससीएन/जीपीआरएन किसी बातचीत या राजनीतिक संवाद के खिलाफ नहीं है. दरवाजा हमेशा खुला है. हालांकि, किसी भी स्वस्थ और निष्कर्षकारी समझौते पर पहुँचने का आधार आपसी समझ और सच्चा आदर होना चाहिए. किसी भी मुद्दे को सुलझाने के लिए यह मुख्य कारक है. एनएससीएन/जीपीआरएन (बातचीत के लिए) तैयार है अगर यह वास्तविक रूप से नगा मुद्दों पर आधारित है; जैसे नगाओं को पूर्ण संप्रभुता. हालांकि, अगर हम भारत और म्यांमार दोनों के वर्तमान रवैये का विश्लेषण करें, तो लगता है कि वे सच्चे अर्थों में बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं, दोनों में से किसी की भी इस मामले को सुलझाने में दिलचस्पी नहीं है.

1980 के दशक से हजारों नगा विद्रोही अपनी जान दे चुके हैं, लेकिन वैश्वीकरण के कारण नई पीढ़ी के विचार बदले हुए हैं, आपका क्या मानना है?
युंग औंग: नगाओं ने 1951 में जनमत संग्रह किया, जिसमें 99 प्रतिशत लोगों ने पूर्ण आजादी का समर्थन किया, लोगों ने 1952 में भारत के पहले आम चुनाव का बहिष्कार किया. नगाओं ने 1947 में बर्मा के पंगलोंग समझौते में शामिल होने से मना कर दिया और संघ में भी शामिल होने से इनकार कर दिया. इतिहास सच बोलता है. बलात बनाई गई सीमा के दोनों और के नगाओं के इन निर्णयों से उनके एकजुट और स्वतंत्र रहने की इच्छा का पता चलता है. वैश्वीकरण की वर्तमान मानसिकता के बावजूद, युवा ज्यादा शिक्षित हैं, ज्यादा तैयार और ज्यादा समर्थन दे रहे हैं. आज वे अपने अधिकारों और इतिहास के बारे में अपने पूर्वजों की तुलना में ज्यादा जानकारी रखते हैं.

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First published: November 1, 2019, 4:46 PM IST
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