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...फिर क्यों कहें 'नाम में क्या रखा है'!

...फिर क्यों कहें 'नाम में क्या रखा है'!

क्या नाम बदलने का सियासी लाभ मिलता है?

क्या नाम बदलने का सियासी लाभ मिलता है?

जिलों, कस्बों, प्रतिष्ठानों के नाम बदलने का खेल बहुत पुराना है. इसमें कोई एक पार्टी शामिल नहीं है.

    शेक्सपियर ने कहा था 'नाम में क्या रखा है'. गुलाब को चाहे जिस नाम से पुकारो गुलाब ही रहेगा. लेकिन नाम में बहुत कुछ रखा है. ऐसा न होता तो राजनीतिक दल नाम की सियासत न करते. जिलों, कस्बों, प्रतिष्ठानों के नाम बदलने का खेल बहुत पुराना है. इसमें कोई एक पार्टी शामिल नहीं है. कांग्रेस, बसपा, सपा... और भाजपा सब इसमें शामिल हैं.

    हमने बॉम्बे से मुंबई, कलकत्ता से कोलकाता, मद्रास का नाम चेन्नई और  बैंगलोर का नाम बेंगलुरु होते देखा है.  ताजा मामला हरियाणा का है. यहां सरकार ने यमुनानगर जिले के मुस्तफाबाद का नाम बदलकर सरस्वती नगर रख दिया है. कहा जा रहा है कि यहां से सरस्वती नदी बहती थी.

    इससे पहले यहां साइबर सिटी गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया गया था. दावा किया गया कि यह द्रोणाचार्य का शहर है, इसलिए गुरुग्राम नाम ज्यादा अच्छा होगा. इसके खिलाफ उद्योग जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी.

    गुड़गांव में एक मेट्रो ट्रेन स्टेशन का नाम भी द्रोणाचार्य के नाम पर है. इस बदलाव के बाद दलित समाज, खासतौर पर बहुजन समाज पार्टी के नेताओं ने सरकार से मांग की थी कि यहां एक स्टेशन का नाम एकलव्य के नाम पर रखा जाए, लेकिन उनकी वह मांग पूरी नहीं की गई.



    फिर मेवात जिले का नाम बदलकर नूंह किया गया, हालांकि यह मेव बहुल क्षेत्र है. सरकार ने दावा किया कि मेवात की छवि बदलने के लिए नाम बदला गया है. जब यहां के अपराधी दूसरे जिलों में पकड़े जाते हैं तो लोग उसे 'मेवाती गैंग' कहकर पुकारते हैं.

    इसी साल अप्रैल में हरियाणा सरकार ने एनसीआर में आने वाले बल्‍लभगढ़ कस्बे का नाम बदलकर बलरामगढ़ कर दिया था. इसके पीछे तर्क दिया गया कि फरीदाबाद के कस्बे बल्लभगढ़ में एक जाट रियासत थी, जिसकी स्‍थापना सन् 1739 में बलराम सिंह ने की थी. बलराम सिंह को 1753 में मुगलों ने मरवा दिया. इसके बाद उनके मित्र और भरतपुर रिसायत के राजा सूरजमल ने बलराम सिंह के बेटों को फिर बल्लभगढ़ की गद्दी दिलवाई.

    लेकिन मनोहरलाल सरकार को उस वक्त नाम बदलने पर झटका लगा, जब सामाजिक कार्यकर्ता जसवंत सैनी ने इस बदलाव के खिलाफ आवाज उठाई. उन्‍होंने 15 हजार लोगों में रायशुमारी करवाई, 95 फीसदी लोगों ने नाम बदलने का विरोध किया. इसका सबूत सरकार को भेजा गया तो फिर से इसका नाम बल्लभगढ़ कर दिया गया.

    The Bahujan Samaj Party renamed many districts, towns, cities, public places and institutions and justified it in the name of honouring the ‘forgotten’ Dalit icons of India. but Samajwadi Party government restore the original names. Now the BJP is also doing Name Change Politics, बहुजन समाज पार्टी ने कई जिलों, कस्बों, शहरों, सार्वजनिक स्थानों और संस्थानों का नाम बदला. उन्हें दलित नेताओं के नाम पर किया. लेकिन समाजवादी पार्टी सरकार ने मूल नामों को बहाल किया. अब बीजेपी भी नाम बदलने की राजनीति कर रही है. Name Change Politics in India        बल्लभगढ़ का नाम बलरामगढ़ कर दिया गया था लेकिन...

    सितंबर 2016 में दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) ने ‘रेस कोर्स रोड’ का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया था. इसी मार्ग पर प्रधानमंत्री का निवास है. इसी साल अगस्त में केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार की सिफारिश पर मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भारतीय जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रख दिया था.

    उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने उपाध्याय की विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश के तहत यह प्रस्ताव दिया था. तर्क यह दिया गया था कि उपाध्याय की मुत्यु 1968 में इसी जंक्शन पर हुई थी. गौर करने वाली बात यह है कि मुगलसराय पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म स्थान भी है.

    नाम के नाम पर सियासत करने में बहुजन समाज पार्टी काफी आक्रामक रही है. मायावती ने लखनऊ के जाने-माने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर अपनी पार्टी के आदर्श पुरुष छत्रपति शाहूजी महाराज के नाम पर रख दिया था. इसका नाम बदले जाने पर देश-वि‍देश में आलोचना हुई. अखिलेश यादव ने 2012 में फिर से इसका पुराना नाम बहाल कर दिया. इसकी नींव 21 दिसंबर 1905 को प्रिंस ऑफ वेल्स ने रखी थी. जबकि उद्घाटन जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी ने किया था.

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    मायावती ने अपने शासनकाल में कई जिलों के नाम दलित उत्थान का काम करने वाले उन लोगों के नाम पर रखे जिन्हें बसपा के पोस्टरों में जगह मिलती है. लेकिन अखिलेश यादव ने फिर से पुराने नाम कर दिए.

    वर्ष 2012 में उन्होंने महामाया नगर का नाम हाथरस, कांशीराम नगर का नाम कासगंज, रमाबाई नगर का नाम कानपुर देहात और प्रबुद्ध नगर का नाम शामली कर दिया. इसी प्रकार छत्रपति शाहूजी महाराज नगर का नाम बदलकर अमेठी किया, जो उसका पुराना नाम था. इसी क्रम में पंचशील नगर का नाम बदलकर हापुड़ और ज्योतिबा फूले नगर का नाम अमरोहा किया गया.

    कनॉट प्लेस हुआ राजीव चौक लेकिन...

    कांग्रेस पार्टी जितनी पुरानी पार्टी है उसकी नामकरण करने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है. कांग्रेस शासनकाल में लगभग हर स्थान-भवन का नाम नेहरू-गांधी परिवार पर रखा गया.  यहां तक कि विश्व प्रसिद्द कनॉट प्लेस का नाम बदल डाला. 12 जनवरी, 1996 को कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक कर दिया गया. एरिया का नाम तो बदल दिया गया, लेकिन आज तक लोग इसे कनॉट प्लेस ही बोलते आ रहे हैं.

    कनॉट प्लेस के साथ ही कनॉट सर्कस का नाम भी बदल दिया गया. दोनों जगहों के नाम एक दिन ही बदले गए. कनॉट सर्कस का नाम इंदिरा गांधी चौक किया गया. कनॉट प्लेस की तरह ही कनॉट सर्कस को भी लोग इसी नाम से जानते हैं. इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था.

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    हालांकि, हरियाणा सरकार ने लोगों की मांग पर ऐसे गांवों के नाम बदलकर अच्छा किया है, जिन्हें बताने में लोगों को शर्म महसूस होती थी. उदाहरण के लिए फरीदाबाद के गंदा गांव को अजीत नगर बना दिया गया है. हिसार के चमारखेड़ा को सुंदरखेड़ा नाम दिया गया है.

    आरटीआई एक्टिविस्ट एवं पत्रकार अभय जैन कहते हैं कि "राजनीतिक  दलों को नाम बदलने का फायदा मिलता रहा है. जब तक कांग्रेस का शासन था तब तक गांधी, नेहरू के नाम पर फायदा लिया गया. बसपा ने अपने आदर्श पुरुषों के नाम आगे बढ़ाए. बीजेपी भी यही कर रही है. नाम रखने एक खास वर्ग का झुकाव उस पार्टी और सरकार की ओर होता है."

    हरियाणा के उद्योग मंत्री विपुल गोयल इस बदलाव के पीछे जनता की मांग बताते हैं. वह कहते हैं कि "लोगों की मांग पर ही नाम बदले जाते हैं. गुड़गांव का नाम बदलने का भी प्रस्ताव आया था और इन गांवों से भी."

    Tags: BJP, Bombay, BSP, Chennai, Gurugram, Kolkata, Mumbai, गुड़गांव

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