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नरेंद्र मोदी का कैबिनेट विस्तार ... उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी?

नरेंद्र मोदी (narendra modi) का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहला कैबिनेट विस्तार (Modi cabinet expansion) या पुनर्सगंठन कई स्तर पर उल्लेखनीय है. इस तरह से बगैर पिछले दरवाजे से किसी को प्रवेश दिए, पेशेवर लोगों को जगह दी गई है. इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी के लिए वफादारी और भरोसा कितना मायने रखता है और उनके हर फैसले में चुनावी रणनीति किस कदर शामिल रहती है. ऐसा माना जा रहा था कि मोदी के कैबिनेट विस्तार या कमज़ोर कड़ियों मे बदलाव की शुरुआत बंगाल चुनाव में हुए उलटफेर से हो गई थी.

नरेंद्र मोदी (narendra modi) का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहला कैबिनेट विस्तार (Modi cabinet expansion) या पुनर्सगंठन कई स्तर पर उल्लेखनीय है. इस तरह से बगैर पिछले दरवाजे से किसी को प्रवेश दिए, पेशेवर लोगों को जगह दी गई है. इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी के लिए वफादारी और भरोसा कितना मायने रखता है और उनके हर फैसले में चुनावी रणनीति किस कदर शामिल रहती है. ऐसा माना जा रहा था कि मोदी के कैबिनेट विस्तार या कमज़ोर कड़ियों मे बदलाव की शुरुआत बंगाल चुनाव में हुए उलटफेर से हो गई थी.

नरेंद्र मोदी (narendra modi) का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहला कैबिनेट विस्तार (Modi cabinet expansion) या पुनर्सगंठन कई स्तर पर उल्लेखनीय है. इस तरह से बगैर पिछले दरवाजे से किसी को प्रवेश दिए, पेशेवर लोगों को जगह दी गई है. इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी के लिए वफादारी और भरोसा कितना मायने रखता है और उनके हर फैसले में चुनावी रणनीति किस कदर शामिल रहती है. ऐसा माना जा रहा था कि मोदी के कैबिनेट विस्तार या कमज़ोर कड़ियों मे बदलाव की शुरुआत बंगाल चुनाव में हुए उलटफेर से हो गई थी.

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    नई दिल्‍ली. नरेंद्र मोदी ( narendra modi) का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहला कैबिनेट विस्तार (Modi cabinet expansion) या पुनर्सगंठन कई स्तर पर उल्लेखनीय है. इस तरह से बगैर पिछले दरवाजे से किसी को प्रवेश दिए, पेशेवर लोगों को जगह दी गई है. इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी के लिए वफादारी और भरोसा कितना मायने रखता है और उनके हर फैसले में चुनावी रणनीति किस कदर शामिल रहती है. ऐसा माना जा रहा था कि मोदी के कैबिनेट विस्तार या कमज़ोर कड़ियों मे बदलाव की शुरुआत बंगाल चुनाव में हुए उलटफेर से हो गई थी. साथ में महामारी से हुई तबाही ने प्रबंधन की खामियों को खुल कर जाहिर कर दिया. हालांकि जिस तरह से उन्होंने बड़े बड़े मंत्रियों जैसे रवि शंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, ( जो सरकार के मुख्य प्रवक्ता होने के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे) हर्षवर्धन, संतोष गंगवार को हटाया है उससे साफ हो जाता है कि पार्टी में कोई उनको चुनौती देने का बूता नहीं रखता है.

    इसमें कोई शंका नहीं है कि मोदी के मंत्रिमंडल को साफ सफाई की बेहद ज़रूरत नज़र आ रही थी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अश्विनी वैष्णव जो एक पूर्व नौकरशाह हैं और अटल बिहारी के पीएमओ में इन्हें भाजपा और नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के बीच में एक ब्रिज बनने का काम किया था. अब इन्हें दो बड़े मंत्रालय, रेलवे और सूचना एवं तकनीक और संचार का कार्यभार दिया गया है. इसी तरह हरदीप पुरी जिन्हें ना सिर्फ पदोन्नत करके कैबिनेट मंत्री बनाया बल्कि उन्हें शहरी एवं आवास मामलों के साथ पेट्रोलियम और नेचुरल गैस का कार्यभार दिया गया है. ठीक इसी तरह से जावड़ेकर का जाना दिखाता है कि जब सरकार को ज़रूरत थी तब वो सही प्रदर्शन नहीं कर पाए.

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    उप्र के लिए जाति की नीति और शतरंज पर अपनी बिसात बिछा ली
    उत्तर प्रदेश से सात मंत्री, ऐसा लगता है भाजपा वहां पर अपराजित होने के बावजूद कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती है. इसलिए अनुप्रिया पटेल जो अपना दल (सोनेलाल) की प्रमुख हैं, उन्हें लाया गया है. पूर्वी उत्तरप्रदेश में मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया कुर्मी (पिछड़ी जाति) का प्रतिनिधित्व करती हैं. कुर्मी की ज़रूरत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि महाराजगंज से सांसद पंकज चौधरी को मंत्री परिषद में स्थान दिया गया है. इसी तरह मोहनलाल गंज के एक और सांसद कौशल किशोर जो सीपीआई के सदस्य थे और प्रदेश सरकार के खिलाफ जिन्होंने सबसे पहले आवाज़ उठाई थी. उन्हें भी मंत्री परिषद में शामिल किया गया है. किशोर दलित पासी हैं उन्हें अंदर लाने के पीछे शायद भाजपा की नीति दलित की उप जातियों को जोड़ना है. भाजपा ने प्रदेश की राजनीति में जाति की शतरंज पर अपनी बिसात बिछा ली है.

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    उत्तर प्रदेश के आगे प्रदेश और भी हैं
    गुजरात जहां 2022 नवंबर-दिसंबर में चुनाव होने हैं. भाजपा ने संतुलन अपनाया है. दो पटेल, एक पुरुषोत्तम रूपाला और मनसुख मंडाविया को कैबिनट का ओहदा दिया गया है. तीन पिछड़ी जाति के सांसद देवुसिंद चौहान, दर्शना जरदोश और महेंद्र मुंजपारा को मंत्री बनाया गया. 2024 को ध्यान में रखते हुए भाजपा हर कोने में अपना विस्तार चाहती है. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के चार सांसदों को भाजपा परिषद में लाई है. भाजपा ने बंगाल में विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भी बंगाल को ये तोहफा इसलिए दिया क्योंकि वो लोकसभा की अपनी पिछली जीत को बरकरार रखना चाहती है.

    ओडिशा- भाजपा के लिए उत्तर पूर्व में सूर्योदय की तरह है, यहां के प्रतिनिधित्व के तौर पर अश्विनी वैष्णव (राज्य सभा सांसद) और बिश्वेश्वर तुडू (राज्य मंत्री, आदिवासी कल्याण और जल शक्ति मंत्रालय) को चुना गया है. हालांकि ओडिशा से भाजपा के सबसे चर्चित नेता धर्मेंद्र प्रधान को भारी निवेश वाले पेट्रोलियम से शिक्षा की ओर ले जाया गया. इसी तरह, कर्नाटक को छोड़कर, दक्षिण अभी भी एक चुनौती बना हुआ है. हालांकि जी. किशन रेड्डी, तेलंगाना के नेता और सांसद, को कैबिनेट रैंक में पदोन्नत किया गया था. उन्हें संस्कृति, पर्यटन और उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास विभागों को दिया गया था, जिसकी निगरानी पीएम करेंगे. कुल मिलाकर मोदी और भाजपा ने कुछ संभावित दूरगामी परिवर्तन तो किए हैं लेकिन इसका असर आने वाले चुनावों में नज़र आएगा. उसके बाद तय हो सकेगा कि लिए गए फैसले सही थे या नहीं.

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