NDA की सबसे पुरानी पार्टी ने अलग किये रास्ते, ऐसा रहा BJP-अकाली दल का 23 साल का सफर

अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल के साथ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)
अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल के साथ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)

शिवसेना (Shiv Sena) के बाद अपने दूसरे सबसे पुराने सहयोगी को खोना बीजेपी (BJP) के लिए एक बड़ा झटका है. अकाली दल न सिर्फ एनडीए (NDA) के सबसे पुरानी घटकों में एक था बल्कि वह एनडीए में शामिल सबसे पुराना दल (Oldest Party) भी था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2020, 5:30 AM IST
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नई दिल्ली. शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने एनडीए (NDA) छोड़ दिया है. अकाली दल (Akali Dal) के अध्‍यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने यह जानकारी दी है. उन्होंने कहा है कि यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है. इससे पहले ही मोदी कैबिनेट (Modi Cabinet) में अकाली दल से आने वाली एकमात्र मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय (Ministry of Food and Processing) से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद कृषि बिलों (Farm Bills) पर सरकार का विरोध करने के चलते अकाली दल और बीजेपी (BJP) मे तनातनी चल रही थी. अब चूंकि यह गठबंधन टूट गया है तो निस्संदेह शिवसेना (Shiv Sena) के बाद अपने दूसरे सबसे पुराने सहयोगी को खोना बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका है.

बीजेपी (BJP) और अकाली दल (SAD) की ये साझेदारी दो दशक से ज्यादा पुरानी थी. साल 1992 तक अकाली दल और बीजेपी पंजाब (Punjab) में अलग-अलग ही चुनाव लड़े लेकिन सरकार (Government) बनाने के लिए एक-दूसरे का साथ देना था तो आगे आ गये. वैसे बता दें कि न सिर्फ अकाली दल एनडीए (NDA) के सबसे पुरानी घटकों में एक था बल्कि वह एनडीए में शामिल सबसे पुराना दल (Oldest Party) भी था.

मोगा घोषणा पर हस्ताक्षर के बाद दोनों पार्टियों ने 1997 में साथ लड़ा पहला चुनाव
बीजेपी और अकाली दल 1996 में अकाली दल के मोगा डेक्लरेशन नाम के एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद साथ आए. जिसके बाद ही पहली बार दोनों ने मिलकर 1997 में चुनाव लड़ा. तभी से यह रिश्ता चला आ रहा था. बता दें कि मोगा डेक्लरेशन एक तरह का समझौता पत्र था, जिसमें विजन को लेकर तीन प्रमुख बातों पर जोर था- पंजाबी पहचान, आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय सुरक्षा. दरअसल 1984 के बाद से ही माहौल बहुत खराब हो गया था तो ऐसे में इन मूल्यों के साथ दोनों पार्टियों ने हाथ मिलाया था.
विशेषज्ञों ने इस गठबंधन को यूं देखा कि अकाली पूरे सिख समाज को अपने पीछे एकजुट नहीं कर सकते थे. सिख समाज बंटकर वोट कर रहा था. ऐसे में बीजेपी में उन्होंने एक ऐसा सहयोगी देखा, जो उनके वोटबैंक में सेंध लगाए बिना उसे बढ़ाने का काम करता. और कोई सहयोगी उन्हें इसलिए नहीं मिला क्योंकि 1984 के दंगों के बाद से जो हुआ, उससे कांग्रेस ऐसे गठबंधन किसी के लिए अयोग्य हो गई थी. इसलिए अकालियों ने बीजेपी से हाथ मिलाया.



हर बार सरकार बदलने वाले पंजाब को लगातार दो सरकार देने वाला विरला गठबंधन
वैसे अकाली दल को बीजेपी से गठबंधन का राज्य विधानसभा के चुनावों में फायदा भी हुआ. पंजाब में एक ही पार्टी है, जो पिछले कुछ दशकों में दो बार लगातार चुनाव जीत सकी है. और वो है बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन. यह गठबंधन 2007 से 2017 तक पंजाब में सत्ता में रहा. हालांकि इस गठबंधन के हमेशा दिन अच्छे नहीं रहे, कई बार मात भी खानी पड़ी. लेकिन उतार-चढ़ावों के बीच भी गठबंध टूटा नहीं.

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हालिया प्रकरण में पंजाब में कृषि बिलों के भारी विरोध के बीच अकाली दल को अपने वोटबैंक के खिसकने का डर भी लगातार लग रहा था. विशेषज्ञ इस गठबंधन के टूटने के पीछे उसे भी एक वजह के तौर पर देखते हैं. संसद के मानसून सत्र के दौरान अकाली दल ने कृषि बिलों का मुखरता से विरोध किया था.
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