नवंबर 2020 तक NDA को मिल जाएगा राज्यसभा में पूर्ण बहुमत

यदि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विस चुनाव में NDA का बेहतर प्रदर्शन रहता है तो इससे 2020 के नवंबर तक संसद के उच्च सदन में एनडीए का आधार मजबूत हो जाएगा. अभी से लेकर नवंबर 2020 तक 75 राज्यसभा सीटों पर निर्वाचन कराया जाएगा.

News18Hindi
Updated: May 27, 2019, 1:44 PM IST
नवंबर 2020 तक NDA को मिल जाएगा राज्यसभा में पूर्ण बहुमत
राज्यसभा
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Updated: May 27, 2019, 1:44 PM IST
लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी का अगला मिशन राज्यसभा में बहुमत पाने का है. भाजपा और उसके नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में अल्पमत की स्थिति से उबरने की कोशिश कर रहा है, जिसने पिछली एनडीए सरकार के कुछ विधेयकों को राज्यसभा से पास होने में बाधा उत्पन्न की.

राज्यसभा में पूर्ण बहुमत से एनडीए को विधि निर्माण करने में अपेक्षाकृत आसानी होगी, जो पिछले कई सालों से कानून बनाने के मामले में एनडीए के लिए बड़ी बाधा बना हुआ है. ट्रिपल तलाक, मोटर वेहिकल एक्ट और सिटीजनशिप एक्ट में सुधार जैसे अहम बिल राज्यसभा में एनडीए के बहुमत न होने के कारण पास नहीं हो सके हैं.



राज्यसभा का कार्यकाल 6 साल का होता है
लोकसभा के सदस्यों की तरह राज्यसभा के सांसदों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से वोटरों के द्वारा नहीं किया जाता है, बल्कि उनका निर्वाचन राज्यों की विधानसभाओं और विधानमंडलों के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा किया जाता है. जिस पार्टी के पास जितने अधिक विधायक होंगे, वह उतने ही अधिक सांसदों को राज्यसभा में भेज सकती है. राज्यसभा सांसद का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, जबकि निचले सदन लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है. सबसे अहम बात यह है कि राज्यसभा के सभी सदस्य एक साथ नहीं चुने जाते हैं, जैसे लोकसभा में चुने जाते हैं.

राज्यसभा में हैं यूपीए के 66 सांसद
पिछले साल, स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस को पीछे छोड़कर राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. 245 सीटों वाले उच्च सदन में एनडीए के सांसदों की संख्या 101 है. कांग्रेस नीत यूपीए के राज्यसभा में 66 और अन्य दलों के भी कुल 66 सांसद राज्यसभा में हैं.

एनडीए को स्वप्न दासगुप्ता, मैरी कॉम व नरेंद्र जाधव और 3 स्वतंत्र सांसदों का भी समर्थन प्राप्त है. 2020 की शुरुआत में यूपीए द्वारा मनोनीत केटीएस तुलसी रिटायर हो जाएंगे, तो एनडीए को उनकी जगह अपनी पसंद के एक सांसद को मनोनीत करने का भी अवसर मिल जाएगा.
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नवंबर 2020 में इन राज्यों से एनडीए को मिलेंगी इतनी सीटें
नवंबर 2020 में एनडीए को 19 राज्यसभा सीटें और मिल जाएंगी. इनमें से ज्यातादर उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, गुजरात और मध्य प्रदेश से मिलेंगी. इन प्रांतों की सीटों को जीतने के बाद गठबंधन की राज्यसभा में 125 सीटे हो जाएंगी, जबकि इस सदन में बहुमत के लिए केवल 123 सीटें चाहिए. उसके बाद पिछले 15 सालों में यह भारत की पहली ऐसी सरकार होगी जिसका देश के उच्च सदन में बहुमत होगा.

यूपी से मिलेंगी सर्वाधिक सीटें
इनमें से अधिकतर सीटें उत्तर प्रदेश से आएंगी जहां विधानसभा में अधिकतम सीटें 403 हैं और भाजपा ने 310 सीटें जीती हैं. पार्टी को 6 सीटें तमिलनाडु से भी मिलेंगी जिसके लिए पार्टी AIADMK को धन्यवाद ज्ञापित करेगी. पार्टी को 3 सीटें असम से, दो राजस्थान से और शायद 1 सीट ओडिशा से भी मिल सकती है. ओडिशा की एक सीट के लिए भाजपा बीजेडी पर निर्भर रहेगी.

इन राज्यों से मिलेंगी एक-एक सीटें
भाजपा को एक-एक सीटें कर्नाटक, मिजोरम, मेघालय, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से भी मिलेंगी, जबकि पार्टी को राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से कुछ सीटों का नुकसान भी होगा.

इसी साल (2019) के आखिरी महीनों में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड विधानसभा के चुनाव होंगे. यदि इन राज्यों में भाजपा नीत एनडीए बेहतर प्रदर्शन करता है तो इससे एनडीए का आधार 2020 के नवंबर तक सदन के उच्च सदन में मजबूत हो जाएगा. अभी से लेकर नवंबर 2020 तक 75 राज्यसभा सीटों पर निर्वाचन कराया जाएगा.

एनडीए के लिए सरदर्द की तरह रहा है राज्यसभा में बहुमत न होना
पिछले पांच सालों में एनडीए के बड़े नेताओं और प्रबंधकों के लिए राज्यसभा में बहुमत न होना एक सरदर्द की तरह रहा है. इसी कारण से भूमि अधिग्रहण बिल को राज्यसभा में नहीं पेश किया गया क्योंकि सभी गैर एनडीए विरोधी दलों ने एक सुर में इस बिल का विरोध किया था. ट्रिपल तलाक को अपराध बनाने वाले बिल को संसद की स्वीकृति नहीं मिल पाई क्योंकि विपक्ष को इस पर बहस तक मंजूर नहीं था.

एनडीए के लिए निर्मित हुई थी शर्मनाक स्थिति
2016 में तो एक ऐसा अवसर आया था जब संगठित विपक्ष ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर अपना संशोधन पास कर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए शर्मनाक स्थिति निर्मित कर दी थी. इसके बाद मोदी सरकार ने आधार बिल को मनी बिल के रूप में लोकसभा से पारित कराया जिससे वह बिल राज्यसभा में न फंसा रहे क्योंकि अनेक विरोधी दलों ने इस बिल का भी विरोध करने का निर्णय कर लिया था.

पहले के यूपीए शासनकाल के दौरान भाजपा ने भी PFRDA और इंश्योरेंस लॉ अमेंडमेंट बिल के कुछ प्रावधानों से भाजपा सहमत नहीं थी, जो उस समय सदन की मुख्य विपक्षी पार्टी थी. यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में पेंशन फंड बिल को किसी तरह से पास कराया, जबकि गतिरोध के कारण इंश्योरेंस बिल फंसा रहा और अन्ततोगत्वा यह बिल तब पास हो पाया जब एनडीए पावर में आया.

राज्यसभा में केवल बहुमत पर्याप्त नहीं: अफजल अमानुल्लाह
संसदीय कार्य मंत्रालय के पूर्व सचिव अफजल अमानुल्लाह ने कहा कि, “राज्यसभा में केवल बहुमत पर्याप्त नहीं हो सकता है. पिछले कुछ सालों में, यह चलन बढ़ रहा है कि 5-6 सांसदों का एक ग्रुप संसद की कार्यवाही को रोक सकता है. भले ही पार्टी के पास अपना बहुमत हो, बिल प्राय: सदन के किसी एक कोने में व्यवधान होने से भी अटक जाते हैं. एनडीए के लिए, संसद में अगले 5 साल एक महत्वपूर्ण परीक्षा जैसे होंगे क्योंकि बहुत से सुधारात्मक कार्य करने के लिए बिल पास कराने की जरूरत होगी, लेकिन फिर भी बहुमत वाले पार्टी या गठबंधन को सदन में विपक्ष की छोटी पार्टी के भी उग्र विरोध से होने वाले व्यवधान का सामना करना पड़ सकता है.

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