राज्यसभा उपसभापति चुनाव: खुद ही 'महागठबंधन' को हरा देंगे राहुल गांधी?

बीजेपी के खिलाफ 2019 में राष्ट्रीय स्तर के महागठबंधन की बात कर रहे राहुल गांधी उस बीजेडी तक को नहीं साध पायी जो ओडिशा विधानसभा चुनाव बीजेपी के ही खिलाफ लड़ने जा रही है.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 2:37 PM IST
राज्यसभा उपसभापति चुनाव: खुद ही 'महागठबंधन' को हरा देंगे राहुल गांधी?
राहुल गांधी (फ़ाइल फोटो)
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 2:37 PM IST
राज्यसभा के उपसभापति चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. आम आदमी पार्टी ने खुलकर ये कह दिया है कि वो कांग्रेस के पक्ष में मतदान देने के लिए तैयार थे लेकिन राहुल ने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को एक फोन कॉल करना ज़रूरी नहीं समझा. बीजेपी के खिलाफ 2019 में राष्ट्रीय स्तर के महागठबंधन की बात कर रही कांग्रेस उस बीजेडी तक को नहीं साध पायी जो ओडिशा विधानसभा चुनाव बीजेपी के ही खिलाफ लड़ने जा रही है. बता दें कि 41 साल से डिप्टी चेयरमैन का ये पद कांग्रेस के पास रहा था.

क्या हुआ चुनाव में
पत्रकार और जेडीयू के सांसद हरिवंश को राज्यसभा का नया उपसभापति चुनने के लिए 232 सदस्यों ने वोट किए. ऐसे में विपक्ष के उम्मीदवार बी के हरिप्रसाद के 105 वोटों के मुकाबले एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को 125 वोट हासिल हुए. हरिवंश के के समर्थन में बीजेपी, बीजेडी, एआईएडीएमके, बीजेडी, टीआरएस, जेडीयू, अकाली दल और शिवसेना रहे. जबकि कांग्रेस के हरिप्रसाद के पक्ष में कांग्रेस, टीएमसी, एसपी, बीएसपी, डीएमके, एनसीपी और आरजेडी ने वोट किया. राज्यसभा में कुल सदस्यों की संख्या फिलहाल 244 है. जिसमें से उपसभापति के लिए 232 सदस्यों ने वोट किए. बीजेपी की जीत में बीजेडी का बड़ा हाथ रहा जिसके राज्यसभा में 9 सदस्य हैं.

News18 India के पॉलिटिकल एडिटर अमिताभ सिन्हा के मुताबिक बीजेपी और एनडीए के पास सिर्फ 92 वोट थे लेकिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कुशलता ने एनडीए के उम्मीदवार की जीत तय कर दी. सबसे पहले एआईएडीएमके के 13 सांसदों को अपने पक्ष में किया गया था. नीतीश कुमार को बीजेडी और टीआरएस से बात करने की जिम्मेदारी दी गई क्योंकि उम्मीदवार जेडीयू का ही था. ऐसे 15 सांसदों का इंतजाम हो गया. तीन निर्दलीय सांसदों और तीन नामांकित सांसदों का वोट अपने पाले में सुनिश्चित कराया गया जिससे 244 में से 125 वोटों के जरिए जीत तय हो गई.

कहां चूक गए राहुल ?
बीजेडी के 9 और टीआरएस के 6, आप के 3 सदस्यों को अपने पाले में न कर पाना कांग्रेस या कहें तो महागठबंधन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई. आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह पिछले दो दिनों तक लगातार यही कहते रहे कि राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन के चुनाव में अगर कांग्रेस को हमारा वोट चाहिए, तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को हमारे राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से बात करनी होगी. बहरहाल न राहुल ने फोन किया और न आप के राज्यसभा सांसद चुनाव में शामिल हुए.



दूसरी तरफ बीजेपी ने जेडीयू के उम्मीदवार को मैदान में उतारकर ये संदेश दिया कि एनडीए में बाकी दलों की भी एहमियत है. जेडीयू उम्मीदवार होने के चलते नाराज़ चल रहे टीआरएस, बीजेडी और शिवसेना को साधने में मदद मिली. बीजेडी के लिए एनडीए के पक्ष में मतदान करना इसलिए और भी आसान हो गया क्योंकि अब वो विधानसभा चुनावों में सवाल उठने पर ये कह सकती है कि उन्होंने जेडीयू का समर्थन किया था बीजेपी का नहीं. उधर कांग्रेस पहले लगातार कह रही थी कि डिप्टी चेयरमैन के लिए वो अपना उम्मीदवार नहीं लाने वाली है ऐसे में टीएमसी या एनसीपी से उम्मीदवार आने की चर्चा सामने आ रही थी. हालांकि आखिरी मौके पर कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार उतार दिया जिससे बीजेडी, टीआरएस का समर्थन मिलने की रही सही उम्मीद भी जाती रही.

गौरतलब है कि करीब एक साल पहले हुए राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस के रणनीतिकार अहमद पटेल ने राज्यसभा चुनावों में एनडीए की नाक के नीचे से सीट जीत ली थी. इस बार राहुल के पास आंकड़ों के लिहाज से भी बेहतर स्थिति थी साथ ही एनडीए कुनबे की पार्टियां विभाजित भी नज़र आ रही थी. हालांकि राहुल की तरफ से ऐसी कोई पहल नज़र नहीं आई जिससे वो इसी के चलते टीडीपी, वायएसआर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सांसद वोट देने के दौरान अनुपस्थित रहे. और बीजेपी से दूरी बनाते हुए भी एनडीए उम्मीदवार को बीजेडी, अन्ना द्रमुक और टीआरएस का समर्थन भी मिल गया. बताया जा रहा है कि एनडीए के पार्टनर्स को खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने कॉल किया था लेकिन कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने तो आप, टीआरएस, टीडीपी और बीजेडी से बातचीत की लेकिन राहुल खुद इस मामले में चुप्पी बनाए रहे.

महागठबंधन कैसे होगा ?
क्या राहुल की निष्क्रियता से कांग्रेस उपसभापति का चुनाव हारी इसके जवाब में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल रहीम कहते हैं कि राहुल सिर्फ कहने भर से महागठबंधन के नेता नहीं मान लिए जाएंगे. वो 2004 को याद करते हुए बताते हैं कि तब अटल सरकार के खिलाफ यूपीए को एकजुट करने का जिम्मा सोनिया गांधी के पास था और उन्होंने खुद फोन कर सबसे बात की और चुनाव में साथ आने का प्रस्ताव रखा था.

अब्दुल भी मानते हैं कि कांग्रेस की हार तभी तय हो गई थी जब उसने मन करते रहने के बावजूद आखिरी वक़्त पर गठबंधन के साथियों को इग्नोर कर अपना कैंडिडेट उतार दिया. उनके मुताबिक सबसे अच्छी रणनीति तो ये होती कि बीजेडी के सदस्य को महागठबंधन का उम्मीदवार बना दिया जाता, लेकिन इसके लिए राहुल को महागठबंधन के सदस्यों का विश्वास हासिल करना होता जो फिलहाल उनके पास नहीं दिखाई दे रहा है.



CNN-News18 की सीनियर एडिटर पल्लवी घोष भी बताती हैं कि उपसभापति के चुनाव के नतीजे आते ही कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, 'हम से न हो पाएगा.' पल्लवी के मुताबिक बीजेपी को इस चुनाव से दो फायदे हुए एक तो उन्होंने सहयोगी दलों को ये बता दिया कि सारे चुनाव सिर्फ बीजेपी के लिए नहीं है. उन्होंने जेडीयू के उम्मीदवार को चुनाव जिताकर ये संदेश दे दिया कि एनडीए में अब भी बाकी पार्टियों अपना अस्तित्व है. जिस दिन ये चुनाव हो रहे थे उस दिन शिवसेना के नेता आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र के मंत्रियों नितिन गडकरी, प्रकाश जावड़ेकर और सुनील प्रभु से मिलने के लिए संसद में आए. आदित्य ठाकरे की मौजूदगी ने ये जता दिया कि शिवसेना हमेशा की तरह बीजेपी के साथ है. जबकि कांग्रेस के लिए सबसे खराब चीज़ ये है कि बीजेपी के साथ कड़वाहट के बावजूद पीडीपी ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया.

क्या कांग्रेस पहले ही हार मान चुकी थी ?
हालांकि जानकारों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी जानती थी कि आप के तीन सांसदों के वोट से उसके उम्मीदवार को जीत नहीं मिलने वाली, बल्कि केजरीवाल से राहुल गांधी का समर्थन मांगना कांग्रेस के कद को कम करेगा, इसलिए कांग्रेस ने आप से राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में समर्थन देने के लिए कोई बात ही नहीं की और यही बात आम आदमी पार्टी को खटक रही है.

केजरीवाल और नवीन पटनायक पर हमले से क्या होगा ?
उपसभापति चुनाव के नतीजे आते ही कांग्रेस ने बीजेडी पर आरोप लगाया कि नवीन पटनायक एक तरफ तो एनडीए सरकार पर ओडिशा को नजरंदाज करने का आरोप लगा रहे हैं दूसरी तरफ बड़ी चालाकी से नोटबंदी, जीएसटी लागू करने, राष्ट्रपति चुनाव और लोकसभा- विधानसभा चुनाव साथ कराने जैसे ज्यादातर मुद्दों पर बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं. कांग्रेस ने आप को भी निशाने पर लिया और दिल्ली महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने केजरीवाल पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया कि राहुल गांधी एक ऐसे शख्स से समर्थन क्यों मांगेंगे, जो खुलेआम यह कह चुके हैं कि अगर नरेंद्र मोदी उनकी मांगें मान लेते हैं, तो वह 2019 के चुनावों में उन्हें सपोर्ट करेंगे और उनके कैंपेन भी करेंगे. राजनीति विचारधाराओं की लड़ाई है, लेन-देन में लगे अवसरवादियों का अखाड़ा नहीं.



कांग्रेस नेता अजय माकन ने कहा कि वह आम आदमी पार्टी को यह याद दिलाना चाहते हैं कि मुख्य न्यायाधीश के महाभियोग के मुद्दे पर राज्यसभा में उसने बीजेपी का साथ दिया था. वहीं 2014 के लोकसभा चुनावों में भी आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारकर बीजेपी को जिताया था. माकन ने बिहार और उड़ीसा के मुख्य मंत्रियों की ओर इशारा करते हुऐ कहा हम एक और नीतीश और पटनायक नहीं बनाना चाहते, जिन्होंने कांग्रेस को धोखा देकर बीजेपी से हाथ मिला लिया. इसके बाद हरियाणा में एक रैली के दौरान केजरीवाल ने भी साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी महागठबंधन का हिस्सा नहीं रहेगी. बहरहाल सवाल यही उठता है कि जिन क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लाकर महागठबंधन का सपना देखा जा रहा है वो ऐसे ही दूर होती रहीं तो बेहद मजबूत एनडीए का सामना कैसे किया जाएगा ?
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर