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RCEP से पीछे हटने का कारण राजनीति या कूटनीति नहीं बल्कि ट्रंप और Brexit है!

News18Hindi
Updated: November 5, 2019, 7:44 AM IST
RCEP से पीछे हटने का कारण राजनीति या कूटनीति नहीं बल्कि ट्रंप और Brexit है!
ASEAN इंडिया समिट में पीएम नरेंद्र मोदी (AP)

जब साल 2012 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) पर बातचीत शुरू हुई तो कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सत्ता में था और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी (PM Modi) के पहले कार्यकाल के दौरान तक इस संबंध में बातचीत जारी रही. तो अब वार्ता बंद क्यों?

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  • Last Updated: November 5, 2019, 7:44 AM IST
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ज़का जैकब
नई दिल्ली.
 सात सालों में 28 दौर की वार्ता के बाद भारत आखिरकार क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) से बाहर हो गया. अगर भारत इसमें शामिल होता तो RCEP दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक संघ के रूप में विकसित होता जो यूरोपीय संघ से बड़ा है. RCEP में सभी 10 आसियान देशों (Asean) के साथ-साथ उसके छह मुक्त व्यापार साझेदारों का भी साथ मिलता, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान और चीन शामिल हैं.

सरकार द्वारा RCEP से दूर जाने का कारण मूल रूप से आर्थिक बताया गया है: यह भारतीय बाजार में चीन के सस्ते सामानों की बाढ़ ला देगा. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से सस्ते कृषि सामान और डेयरी आयात होगी, जो भारतीय किसानों में हड़बड़ी भरा माहौल पैदा कर देगा. इसलिए सरकार ने किसानों और छोटे व्यवसायों के हितों को मुक्त व्यापार से ऊपर रखने का फैसला किया है.

वार्ता के सात साल बाद बाहर क्यों हो गए?

जब साल 2012 में बातचीत शुरू हुई तो कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सत्ता में था और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान तक इस संबंध में बातचीत जारी रही. तो अब वार्ता बंद क्यों?

ऐसा इसलिए है कि RCEP से बाहर निकलने का असली कारण राजनीतिक हो सकता है न कि आर्थिक या कूटनीतिक.

ऐसा क्यों : डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) के कुछ और ब्रिटेन के ब्रेक्जिट (Brexit) को देखें तो मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण के लिए अब अधिक इच्छाशक्ति नहीं दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने सबसे पहले NAFTA (उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता) को पटरी से उतार दिया, जो दुनिया का सबसे पुराना मुक्त व्यापार समझौता था.
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वह चीन (China) के खिलाफ बयान देने के साथ उसकी निंदा कर रहे हैं. ट्रंप को इस बात का एहसास हुआ और ब्रेक्जिट का समर्थन करने वाले भी जल्दी ही इसी लीक पर चले कि पश्चिम में लोग वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार को 'नौकरी छीने जाने' के रूप में देखते हैं.

सस्ती विनिर्माण नौकरियां चीन के हिस्से में
पश्चिमी देशों में सस्ती विनिर्माण नौकरियां चीन और अन्य एशिआई देशों के हिस्से में है, जबकि पश्चिम ने विशेष रूप से उच्चतर बौद्धिक नौकरियों पर ध्यान केंद्रित किया. परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग की फैक्ट्री की नौकरी लगभग पूरी तरह से पश्चिम से गायब हो गई और इसने अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के दिल में 'रस्ट बेल्ट' और 'मिल टाउन' जैसे शब्दों को जन्म दिया. यह प्रणाली पश्चिम में कारगर रही क्योंकि इससे यहां के देशों की कंपनियों के लाभ में वृद्धि हुई. उन्होंने इसके जरिए सस्ते एशियाई श्रम का उपयोग करके मजदूरी को कम रखा.

कॉरपोरेट मुनाफे में मध्य अमेरिका और इंग्लैंड के मिडलैंड्स में असमानता थी. इसलिए 'फर्गाटन पीपल (भूले हुए लोग)' शब्द का जन्म  हुआ. यह वही भूले हुए लोग हैं जो डोनाल्ड ट्रम्प और ब्रेक्जिट के सबसे बड़े समर्थक थे.

और यही असली कारण है कि ...
RCEP को गरीब-विरोधी और भारतीय-किसान और उद्योग के रूप में बताने में भारत में विपक्षी राजनेताओं को बहुत अधिक वक्त नहीं लगा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने RCEP पर गरीब विरोधी होने के लिए हमला किया और मोदी पर भारत के हितों को बेचने का आरोप लगाया था.

वाम दल और यहां तक ​​कि संघ के स्वदेशी जागरण मंच भी इस मुद्दे पर शोर कर रहे थे. सच्चाई यह है कि एक भारतीय नेता के लिए वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए कोई राजनीतिक प्रोत्साहन मिलेगा जब पश्चिम खुद इससे दूर जा रहा है और यही असली कारण है कि मोदी ने क्यों RCEP से दूर जाने का फैसला किया.

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First published: November 5, 2019, 3:02 AM IST
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