किसानों से जुड़े तीन कानूनों में बदलाव को तैयार है सरकार, फिर क्यों नहीं थम रहा है विरोध?

कृषि कानून के विरोध में किसानों का प्रदर्शन जारी है.

Farmer Protest: दिल्ली बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा. संगठनों का ये भी दावा है कि ये नए कृषि कानूनों से कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा और नुकसान किसानों के खाते में आएगा.

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    नई दिल्ली. नए कृषि कानूनों (Farm Law 2020) के खिलाफ कई दिनों से दिल्ली बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों (Farmer Protest) का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है. केंद्र सरकार और किसान संगठनों की कई बार वार्ता हो चुकी है, लेकिन नतीजा शून्य रहा है. किसान लगातार मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार इन तीनों कानूनों को वापस ले. एक तरफ किसान अपनी मांगों पर डटे हुए हैं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार कानून वापस लेने की बजाए सिर्फ संशोधन का प्रस्ताव दे रही है. इसी बीच किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है.

    किसानों ने ऐलान किया है कि उनका आंदोलन और तेज होने वाला है. आने वाले दिनों में वे देश भर में विरोध प्रदर्शन करेंगे और कई हाइवे को ब्लॉक करेंगे. दरअसल इसी साल सितंबर में आयोजित लोकसभा सत्र में केंद्र सरकार किसानों से जुड़े तीन बिल लेकर आई और विरोध के बावजूद ये बिल कानून बन गए हैं. किसान आंदोलन के बीच आइए जानते हैं आखिरकार क्या हैं नए कृषि कानून और अब तक इनमें क्या-क्या बदलाव हो चुका है और किसान क्यों इनका विरोध कर रहे हैं.

    इन तीनों कृषि कानूनों से पहले क्या था कानून?
    1955 के आवश्यक वस्तु कानून के तहत 'आवश्यक वस्तुओं' की बिक्री, उत्पादन, आपूर्ति आदि को आम जनता के हित के लिए नियंत्रित किया जाता है. इस कानून के अंतर्गत सरकार इस बात पर ध्यान देती थी कि देश के उपभोक्ताओं को सभी चीजें सही कीमत पर उपलब्ध हो रही हैं या नहीं. पुराने कानून में केंद्र सरकार के पास अधिकार था कि वह राज्यों को स्टॉक लिमिट तय करने और जमाखोरों पर नकेल कसने के लिए कहे ताकि उपभोक्ताओं को होने वाली आपूर्ति प्रभावित न हो सके. इसके साथ ही चीजों के दामों में ज्यादा इजाफा न हो. कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जिसके बिना जीवन व्यतीत करना मुश्किल होता है. ऐसी चीजों को सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत आवश्यक वस्तु की सूची में डाल देती है.



    नए कानून में क्या कुछ बदलाव हुआ है?
    1955 के इस कानून में संशोधन किया गया है. नए कृषि कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट से बाहर कर दिया गया है. कहा जा रहा है कि कानून के प्रावधानों से किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा क्योंकि बाजार में कॉम्पीटिशन बढ़ेगा.

    क्यों किसान कर रहे हैं इसका विरोध?
    दिल्ली बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा. संगठनों का ये भी दावा है कि ये नए कृषि कानूनों से कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा और नुकसान किसानों के खाते में आएगा. नए कानून के अनुसार सरकार आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई पर अति-असाधारण परिस्थिति में ही नियंत्रण लगाएंगी. ये स्थितियां अकाल, युद्ध, कीमतों में अप्रत्याशित उछाल या फिर गंभीर प्राकृतिक आपदा हो सकती है.

    नए कानून में उल्लेख है कि इन चीजों और कृषि उत्पाद की जमाखोरी पर कीमतों के आधार पर एक्शन लिया जाएगा. सरकार इसके लिए तब आदेश जारी करेगी जब सब्जियों और फलों की कीमत 100 फीसदी से ज्यादा हो जाएगी या फिर खराब ना होने वाले खाद्यान्नों की कीमत में 50 फीसदी तक का इजाफा होगा.

    किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) 2020

    पहले क्या कानून था?
    एपीएमसी यानी एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड लाइव स्टॉक मार्केट कमेटी, किसानों की भाषा में समझें तो इसे मंडी कहा जाता है. मंडी में किसानों द्वारा उत्पादन बेचने पर राज्य सरकारें व्यापारियों से टैक्स वसूलती हैं और मंडियों का संचालन करती हैं. हर राज्य में इनसे जुड़ा एपीएमसी एक्ट भी होता है.

    नए कानून में क्या बदला?
    नए कानून में केंद्र सरकार ने पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण का प्रावधान किया गया है. किसान इस कानून के जरिए अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे. निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे. लेकिन, सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है. इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है. बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं.

    जानकारों का कहना है कि मंडियों में मिली इस तरह की खुली छूट आने वाले वक्त में एपीएमसी मंडियों की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी. एपीएमसी मंडी के बाहर नए बाजार पर पाबंदियां नहीं हैं और न ही कोई निगरानी. सरकार को अब बाजार में कारोबारियों के लेनदेन, कीमत और खरीद की मात्रा की जानकारी नहीं होगी. इससे सरकार को भी आगे चलकर नुकसान हो सकता है.

    क्यों किसान कर रहे हैं इसका विरोध?
    नए किसान कानून लाने के बाद सरकार कह रही है कि वो मंडियों से खरीद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देना जारी रखेगी. लेकिन किसानों का कहना है कि जब सरकार पूरे देश में खरीद-बिक्री का नियम ला रही है, तो निजी क्षेत्र में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य अनिवार्य क्यों नहीं कर रही है.

    कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020

    पहले क्या कानून था?
    इसके तहत पहले भी किसान और व्यापारियों के बीच एग्रीमेंट होता था, लेकिन कोई ऐसा कानून नहीं था कि सबसे पहले शिकायत कहां करें. यानी किसान और व्यापारी थाने में भी शिकायत कर सकता था या सीधे कोर्ट में अपनी शिकायत के लिए अर्जी डाल सकता था.

    नए कानून में क्या बदलाव हुआ?
    इस बिल में कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रावधान किया गया है. विधेयक में कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फार्म सेवाओं, कृषि बिजनेस फर्मों, थोक विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्‍त करता है. गुणवत्ता पूर्ण बीज, तकनीकी सहायता और फसल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फसल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी.

    क्यों किसान कर रहे हैं इसका विरोध?
    किसान इसका विरोध इस वजह से कर रहे हैं क्योंकि विवाद निराकरण का तरीका गलत है. कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इसमें शिकायत निपटाने की समयसीमा तय नहीं की गई है. किसान इतने स्मार्ट नहीं हैं कि खुद केस लड़ सकें जबकि कंपनी अपना वकील खड़ा करके किसानों को उलझा सकती है.

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