दक्षिण एशिया में सबसे पिछड़े हैं PoK के ये इलाके, पाक ने कभी नहीं दिया ध्यान

भाषा
Updated: August 18, 2019, 8:24 PM IST
दक्षिण एशिया में सबसे पिछड़े हैं PoK के ये इलाके, पाक ने कभी नहीं दिया ध्यान
गिलगित-बल्तिस्तान (Gilgit-Baltistan) इलाके को दक्षिण एशिया में सर्वाधिक पिछड़ा माना जाता है (फाइल फोटो)

किताब में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार (Pakistan Government) ने गिलगित-बल्तिस्तान (Gilgit-Baltistan) के लोगों की आर्थिक हालत में सुधार करने के लिए कुछ खास नहीं किया है. इस इलाके को दक्षिण एशिया (South Asia) में सर्वाधिक पिछड़ा माना जाता है.

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बर्फ से ढंके पर्वतों की 32 चोटियां, विशाल ग्लेशियर, हरी-भरी घाटियां और मीठे पानी की झीलों के साथ गिलगित-बल्तिस्तान (Gilgit-Baltistan) विश्व की सबसे खूबसूरत जगहों में एक है. साथ ही, वहां सोना, चांदी और यूरेनियम के प्रचुर भंडार भी हैं.

हालांकि, पाकिस्तान (Pakistan) के करीब सात दशक के अवैध कब्जे के दौरान गिलगित-बल्तिस्तान (Gilgit-Baltistan) को पूरे दक्षिण एशिया (South Asia) में सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया गया और उसे एक पिछड़ा और आर्थिक रूप से सबसे कमजोर बना दिया. तीन पाकिस्तानी विशेषज्ञों द्वारा लिखी गई एक नयी पुस्तक, ‘पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर- पॉलिटिक्स, पार्टीज एंड पर्सनैलिटीज’ (Pakistan Occupied Kashmir — Politics, Parties and Personalities) में ये बातें कही गईं हैं.

दक्षिण एशिया में सबसे पिछड़ा माना जाता है गिलगित-बल्तिस्तान का इलाका
पुस्तक में कहा गया है, ‘‘पाकिस्तान सरकार (Pakistan Government) ने गिलगित-बल्तिस्तान के लोगों की आर्थिक हालत में सुधार करने के लिए कुछ खास नहीं किया है. इस इलाके को दक्षिण एशिया में सर्वाधिक पिछड़ा माना जाता है.’’

अन्य विशेषज्ञों ने भी कहा है कि पाकिस्तान ने क्षेत्र के लोगों का सुनियोजित तरीके से दमन किया है, जो ज्यादातर शिया हैं और पाकिस्तान के अन्य हिस्सों से सुन्नी आबादी के वहां उमड़ने का सामना कर रहे हैं.

'यहां लोगों के सुनियोजित दमन में लगा है पाकिस्तान'
रणनीतिक मामलों के एक विशेषज्ञ तिलक देवाशेर ने कहा कि पाकिस्तान ने खुद को जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक अधिकारों और ‘आत्म निर्णय’ (के अधिकार) का सबसे बड़े समर्थक के रूप में पेश किया है, लेकिन सच्चाई यह है कि गिलगित-बल्तिस्तान में वह, “लोगों के सुनियोजित दमन” में लगा हुआ है.
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उन्होंने कहा, “यहां तक कि उसने उनके (वहां के लोगों के) संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार भी नहीं दिये हैं लेकिन वह जम्मू-कश्मीर में आत्म निर्णय के अधिकार के बारे में पाखंडपूर्ण ढंग से बात करता है.”

'मानवाधिकार हनन से बचाने के लिए कोई कानूनी, संवैधानिक, न्यायिक तंत्र नहीं'
क्षेत्र की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी बलवारिस्तान नेशनल फ्रंट (BNF) के नेता अब्दुल हामिद खान ने वहां की स्थिति के बारे में 14 मार्च 2016 को संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन प्रमुख बान की मून (Ban ki-Moon) को एक पत्र लिख कर कहा था, ‘‘पाक के कब्जे वाले गिलगित-बल्तिस्तान में लोगों को मानवाधिकारों के हनन से बचाने के लिए कोई कानूनी, संवैधानिक, न्यायिक तंत्र नहीं है.’’

आज भी इस इलाके के 85% लोग जीविका के लिए खेती पर निर्भर
यह क्षेत्र 1947 में पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए जाने से पहले जम्मू कश्मीर का ही एक हिस्सा हुआ करता था. लेकिन अब बढ़ती आत्महत्याओं, कट्टरपंथी हिंसा, मानवाधिकारों के हनन और आतंकवाद का पर्याय बन कर रह गया है.

पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 में हुए एक समझौते के तहत पाक ने गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र का 5,180 वर्ग किमी हिस्सा चीन को सौंप दिया. प्रमुख थिंक टैंक ‘इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक के मुताबिक वहां के 85% लोग खेती से सिर्फ अपना भरन-पोषण ही कर पा रहे हैं.

'इस इलाके के मात्र 14% पुरुष और 3.5% महिलाएं हैं साक्षर'
वहीं पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्र में पुरुषों की साक्षरता दर महज 14% और महिलाओं की महज 3.5% है. हालांकि, पुस्तक में कहा गया है कि गिलगित-बल्तिस्तान की सरकार द्वारा 2013 में तैयार डेटा में दावा किया गया था कि 1998 में साक्षरता दर 37.85% और 2013 में यह 60% पर पहुंच गई थी.

आने वाले समय में इस इलाके में बढ़ सकता है चीन का नियंत्रण
पुस्तक में कहा गया है कि पाकिस्तान पर चीन (China) इसके लिए दबाव डाल रहा है कि वह गिलगित-बल्तिस्तान को स्पष्ट कानूनी दर्जा मुहैया करे क्योंकि भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा है कि यह गलियारा विवादित क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटता है.

पुस्तक के मुताबिक चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में और खासतौर पर गिलगित-बल्तिस्तान में काफी रूचि जाहिर की है क्योंकि उसने इलाके में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा की परियोजनाएं शुरू की हैं. सीपीईसी के पूरा होने पर इस क्षेत्र में चीन का नियंत्रण बढ़ जाएगा.

सुरिंदर कुमार शर्मा, याकूब अल हसन और अशोक बेहुरिया द्वारा लिखी गई यह पुस्तक इस पर्वतीय क्षेत्र में सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां, चीन की बढ़ती मौजूदगी और लगातार हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों समेत रणनीतिक आयामों को बयां करती है.

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First published: August 18, 2019, 7:34 PM IST
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