किताब का दावा- कांग्रेस ने न की होती ये गलती तो आज भारत में होता पाकिस्तान का ये प्रांत

भाषा
Updated: September 2, 2019, 10:54 AM IST
किताब का दावा- कांग्रेस ने न की होती ये गलती तो आज भारत में होता पाकिस्तान का ये प्रांत
खैबर पख्तूनवा को पहले पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) के नाम से जाना जाता था.

पाकिस्तान (Pakistan) के मौजूदा खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) प्रांत के इतिहास पर एक नई पुस्तक में यह खुलासा किया गया है कि 1947 में कांग्रेस नेतृत्व ने महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और क्षेत्र के कुछ प्रभावशाली नेताओं के प्रतिरोध के बावजूद सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र पर किस तरह से भारत ने दावा छोड़ दिया था.

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पाकिस्तान (Pakistan) के मौजूदा खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) प्रांत के इतिहास पर एक नई पुस्तक में यह खुलासा किया गया है कि 1947 में कांग्रेस नेतृत्व ने महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और क्षेत्र के कुछ प्रभावशाली नेताओं के प्रतिरोध के बावजूद सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र पर किस तरह से भारत ने दावा छोड़ दिया था. इस प्रांत को पहले पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) के नाम से जाना जाता था.

‘इंडिया लॉस्ट फ्रंटियर--द स्टोरी ऑफ नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस ऑफ पाकिस्तान’ नाम की यह पुस्तक वरिष्ठ नौकरशाह राघवेंद्र सिंह ने लिखी है, जो राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक रह चुके हैं. उनके कार्यकाल के दौरान अभिलेखागार ने संरक्षण और डिजिटाइजेशन का महत्वपूर्ण कार्य किया.

आने वाले समय में भुगतने होंगे गंभीर परिणाम
सिंह ने एनडब्ल्यूएफपी (NWFP) और इससे लगे अफगानिस्तान के इलाकों के इस वृहद अध्ययन में यह पाया कि ऐसे में जब शक्तिशाली चीन भारत की सीमाओं पर दस्तक दे रहा है, यह स्वीकार करना जरूरी है कि भारत को 1947 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत को गंवाने के गंभीर परिणामों का आने वाले समय में सामना करना पड़ेगा.

रूपा प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक में महात्मा गांधी और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) तथा अन्य अहम राजनेताओं सहित भारत के स्वतंत्रता सेनानियों की 27 दुर्लभ तस्वीरें हैं. इसमें सीमांत की कई अनकही कहानी बयां की गई है. जैसे कि 1947 में किस तरह से (भारतीय राष्ट्रीय) कांग्रेस नेतृत्व ने पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत को गंवा दिया, जिसका (प्रांत का) गठन 1901 में किया गया था.

जिन्ना को खारिज कर कांग्रेस को किया गया था निर्वाचित
लेखक ने कहा है कि पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत हमेशा से ही सामरिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है. भारत के विभाजन और आजादी के बरसों में इस क्षेत्र ने ब्रिटिश तथा भारतीय राजनीतिक शख्सियतों का ध्यान अपनी ओर खींचा. इस मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांत ने मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) के ‘‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’’ को खारिज कर दिया और इस प्रांत ने 1946 में कांग्रेस सरकार को निर्वाचित किया. सिंह ने पुस्तक में कहा है, ‘‘बाद में (प्रांत में) एक जनमत संग्रह का आदेश दिया गया और निर्वाचित कांग्रेस सरकार भारत के विभाजन के एक हफ्ते के अंदर बर्खास्त कर दी गयी.’’
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गांधी समेत इन लोगों ने किया विरोध
लेखक ने दावा किया है कि सिर्फ महात्मा गांधी और खान बंधुओं, खान अब्दुल गफ्फार खान और उनके बड़े भाई डॉ खान साहिब ने इस सीमांत प्रांत पर भारत का दावा छोड़ने का प्रतिरोध किया था. ‘सीमांत गांधी’ के नाम से मशहूर खान अब्दुल्ल गफ्फार खान और एनडब्ल्यूएफपी के मुख्यमंत्री डॉ खान साहेब को खान बंधु के नाम से जाना जाता था.

कांग्रेस ने बिना चर्चा के ले लिया फैसला
सिंह ने लिखा है, ‘‘महात्मा गांधी के करीबी मित्र एवं प्रांत के एक अहम राजनीतिक शख्सियत गफ्फार खान ने एक बार कहा था-- ना तो विभाजन का मुद्दा और ना ही एनडब्ल्यूएफपी में जनमत संग्रह पर हमारे साथ चर्चा की गई...हम (भारतीय राष्ट्रीय) यह जानकर सकते में आ गए कि कांग्रेस आलाकमान पहले ही इन मसलों पर फैसला ले चुका है.’’

पुस्तक में सीमांत गांधी के हवाले से कहा गया है, ‘‘तीन जून 1947 को वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद मैंने गांधीजी से कहा था, ‘आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया’.’’ वर्ष 1929 में ‘‘खुदाई खिदमतगार’’ की स्थापना करने वाले एवं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस से जुड़े रहे गफ्फार खान ने खुद को कांग्रेस नेताओं द्वारा ठगा हुआ पाया, जिन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वे विभाजन को कभी स्वीकार नहीं करेंगे.

पुस्तक में गफ्फार खान के हवाले से कहा गया है, ‘‘खुदाई खिदमतगार को कोई पूर्व नोटिस नहीं दिया गया...इसके बजाय, हमसे कहा गया कि हम अपना बचाव खुद करें . उस वक्त मैं दिल्ली में था फिर भी किसी ने भी मुझे एक शब्द तक नहीं बताया.’’

नेहरू के दौरे के हुए विनाशकारी परिणाम
पुस्तक में यह दावा किया गया है कि किस तरह अक्टूबर 1946 में प्रांत के नेहरू के दौरे के किस तरह से विनाशकारी परिणाम हुए. पुस्तक के मुताबिक नेहरू को उनकी यात्रा के दौरान पेशावर हवाईअड्डे से भीड़ से सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया. उनके काफिले को रोका गया और उनकी कार पर पथराव तक किया गया. उन्हें सेना के सुरक्षा घेरे की लगातार जरूरत पड़ी. यहां तक कि नेहरू को कबायली लोगों से मिले बगैर वहां से जाना पड़ गया. पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के कबीले के एक व्यक्ति पर एक गोली चली, जो नेहरू की कार से काफी करीब से निकली.

प्रांत में जनमत संग्रह के हुए विपरीत परिणाम
पुस्तक में कहा गया है कि ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने एक मई 1947 को एनडब्ल्यूएफपी में जनमत संग्रह कराने का एक नया प्रस्ताव पेश किया. पुस्तक में दावा किया गया है, ‘‘माउंटबेटन के रुख में बदलाव का कारण नेहरू थे. दरअसल, वह नेहरू ही थे जो पहले प्रांत में चुनाव कराने को राजी हुए थे और फिर जनमत संग्रह को प्राथमिकता दी.’’

सिंह ने कहा है कि जनमत संग्रह का परिणाम पाकिस्तान के पक्ष में गया. जबकि जनमत संग्रह का खान बंधुओं और पठानों ने बहिष्कार किया था जो एक स्वतंत्र पठान प्रांत में यकीन रखते थे.

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First published: September 1, 2019, 5:29 PM IST
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