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अयोध्या, भीमा-कोरेगांव जैसे केस में CJI गोगोई के सामने होगी ये चुनौती

News18Hindi
Updated: October 3, 2018, 6:00 PM IST
अयोध्या, भीमा-कोरेगांव जैसे केस में CJI गोगोई के सामने होगी ये चुनौती
(PTI Photo)

न्यायमूर्ति मिश्रा के रिटायरमेंट के बाद अन्य दो न्यायाधीश अलग-अलग बेंच में बैठे हैं. नए सीजेआई को अब फैसला करना होगा कि इस मामले की सुनवाई किसी अन्य तीन न्यायाधीशीय खंडपीठ द्वारा होगी या फिर दो न्यायाधीशीय खंडपीठ ही इसकी सुनवाई करेगी.

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  • Last Updated: October 3, 2018, 6:00 PM IST
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार को जस्टिस रंजन गोगोई को सीजेआई पद की शपथ दिलवाई और वे देश के 46वें प्रधान न्यायाधीश बन गए. बतौर सीजेआई जस्टिस गोगोई का कार्यकाल 13 महीनों का होगा जो नवंबर 2019 तक चलेगा. अपने कार्यकाल के दौरान उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी.

बतौर सीजेआई जस्टिस गोगोई को जिन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, उनमें से सबसे पहला मामला अयोध्या विवाद है. राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद से लेकर भीमा-कोरेगांव मामले में सुनवाई कैसे आगे बढ़ेगी इस पर पूरे देश की निगाहें होंगी.

जब मामलों के आवंटन और बेंच का गठन की बात हो, तो इसकी प्रक्रिया को लेकर जस्टिस दीपक मिश्रा को भी कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था और इसमें जस्टिस गोगोई भी शामिल थे. लेकिन अब जस्टिस गोगोई खुद सीजेआई की भूमिका में हैं. कोर्ट नंबर 1 में बतौर सीजेआई गोगोई के पहले दिन ही महाराष्ट्र सरकार ने पांच गिरफ्तार कार्यकर्ताओं में से एक गौतम नवलखा को रिहा करने के आदेश के खिलाफ अपील दायर की गई.

पूर्व सीजेआई मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ समेत तीन जजों की बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही थी और 2:1 के बहुमत से फैसला लिया था. भीमा कोरेगांव मामले में गौतम नवलखा उन पांच एक्टिविस्‍ट में से हैं, जिन्‍हें नजरबंद किया गया था. पांच हफ्ते पहले ही गौतम नवलखा और अन्‍य चार को भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

जस्टिस मिश्रा के रिटायरमेंट के बाद अन्य दो न्यायाधीश अलग-अलग बेंच में बैठे हैं. नए सीजेआई को अब फैसला करना होगा कि इस मामले की सुनवाई किसी अन्य तीन न्यायाधीशीय खंडपीठ द्वारा होगी या फिर दो न्यायाधीशीय खंडपीठ ही इसकी सुनवाई करेगी.

जस्टिस खानविलकर और जस्टिस चंद्रचूड़ के बीच पहले से ही मुख्य फैसले को लेकर मतभेद हैं ऐसे में अगर फिर से तीन न्यायाधीशीय खंडपीठ बनेगी तो जस्टिस गोगोई को यह फैसला करना होगा की इस खंडपीठ की अध्यक्षता वो खुद करेंगे या फिर इसके कोई नया सीनियर जज नियुक्त करेंगे. इस मामले को लेकर खंडपीठ के पर उन एक्टिविस्ट और वकीलों के समूह नजर बनाए हुए है, जिन्होंने इस गिरफ्तारी पर असंतोष जताया था.

इसी तरह, बाबरी भूमि विवाद पर खंडपीठ का फैसला 2:1 बहुमत के चलते तय नहीं हुआ था. इस खंडपीठ का नेतृत्व पूर्व सीजेआई मिश्रा ने किया था. यह मामला अब 28 अक्टूबर से शुरू होने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध किया गया है और इसके लिए भी एक नई खंडपीठ स्थापित होगी. इस मामले में भी, दो न्यायाधीश जस्टिस खानविलर और जस्टिस चंद्रचूड़ मौजूद है कि लेकिन दोनों के विचारों में असमानता के चलते एक वरिष्ठ न्यायाधीश को बेंच का नेतृत्व करना होगा.इस मामले पर गोगोई को यह फैसला भी होगा कि क्या वह इस खंडपीठ का नेतृत्व करेंगे, क्योंकि तथ्यों मुताबिक पूर्व सीजेआई इसे विशेष खंडपीठ मामले के रूप में इसकी सुनवाई कर रहे थे. अगर जस्टिस गोगोई इस केस से दूर रहने का फैसला करते हैं, तो इसके लिए किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को चुनना होगा.

शीर्ष पद पर पहले दिन ही जस्टिस गोगोई ने यह साफ कर दिया कि सुनवाई की तारीखों के लिए उनकी अदालत में वकीलों की लंबी कतार नहीं होगी.

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First published: October 3, 2018, 5:27 PM IST
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