सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करती नई शिक्षा नीति

सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करती नई शिक्षा नीति
सरकार ने हाल ही में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ऐलान किया था.

देश में नई शिक्षा नीति लागू होने जा रही है. इसमें पंचायत से लेकर बड़े शिक्षा संस्थानों व सामाजिक संगठनों के सुझाव शामिल हैं. इस नीति में बरसों पुरानी उस मांग को भी पूरा किया है जिसमें शिक्षा पर जीडीपी का 6% ख़र्च करने की बात हो रही थी. मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2020, 6:18 PM IST
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  • डॉ. प्रवेश कुमार


वर्षों के परिश्रम के बाद आख़िरकार शिक्षा क्षेत्र में बदलाव और सामाजिक न्याय एवं समरस समाज निर्माण का दस्तावेज़ नई शिक्षा नीति के रूप में हमारे सामने है. इस नीति के निर्माण की समिति में ही समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी और उनकी अपेक्षा एवं भावों को इसमें सम्मिलित किया गया है. वैसे तो भारत के संविधान में अनुच्छेद 21(A), में सभी 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है, लेकिन अब भी इस मूलाधिकर से बहुत बड़ी संख्या में बच्चे वंचित है. नई शिक्षा नीति ऐसी कई समस्याओं को दूर करने और भारत के करोड़ों बच्चों के सपने को पूरा करने और गुणवत्‍तापूर्वक शिक्षा देने का एक सराहनीय प्रयास का नाम है. इतना ही नहीं, शिक्षा के साथ बच्चों का स्वास्थ्य भी बढ़िया रहे. इसके लिए मध्यावधि भोजन में फल, दूध एवं अन्य भोज्य पदार्थों का सम्मिलन वो भी प्रांत एवं मौसम अनुसार हो, इसे भी सुनिश्चित किया गया है. शरीर-बुद्धि के मध्य संयोग बना सशक्त भारत निर्माण करना ही नई शिक्षा नीति का अभीष्ट है.
नई शिक्षा नीति को कुछ शिक्षाविदों की एक समिति ने ही नहीं बनाया है, बल्कि इसे बनाने में सम्पूर्ण राष्ट्र ने अपनी सहभागिता को दर्ज किया है. एक पंचायत से लेकर बड़े शिक्षा संस्थान एवं तमाम सामाजिक संगठनों आदि ने भी इसमें अपने सुझाव दिए थे. ये शिक्षा नीति उन्हीं सबको आधार मान बनी है. इसीलिए इसका विरोध भी हमें ज़्यादा नहीं दिखता है. इस शिक्षा नीति ने देश के शिक्षविदों की वर्षों की उस मांग को भी पूर्ण किया है जिसमें वे सकल घरेलू आय का 6 प्रतिशत शिक्षा पर ख़र्च हो, की बात कर रहे थे. इसके अलावा मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय रखा जाएगा. ये नामांतरण केवल नाम में बदलाव मात्र नहीं, बल्कि पूरी दृष्टि का बदलाव है, जिसमें हम मानव को शिक्षा देने का उदेश्य केवल ओर केवल रोज़गार देना नहीं, अपितु शिक्षा का उदेश्य व्यक्ति के स्वत्व, चित्त का जागरण करना और उसे सभ्य समाज के निर्माण की लिए प्रेरित करना भी है. ये ही तो भारत की पुरातन शिक्षा पद्धति का भी ध्येय था, इसलिए नामांतरण करना भी एक सकारात्मक प्रयास है.

नई शिक्षा नीति के तहत अब छठी क्लास के बाद ही व्यावसायिक एजुकेशन की भी शुरुआत होगी और 12वीं क्लास तक हर बच्चा व्यावसायिक शिक्षा भी प्राप्त कर सकेगा. ये व्यावसायिक शिक्षा जहां भारत में रोज़गार सृजन का केंद्र बनेगा, वही शिक्षा में अन्वेक्षण को भी बढ़ावा देगा. अगर हम स्कूली शिक्षा के बारे में बात करें तो फिर अब पुराने ढांचा 12+2  को हटाकर एक नया स्ट्रक्चर डिजाइन किया गया है इसमें 5+3+3+4 का रहेगा. वहीं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने 12वी कक्षा के बाद से ‘मल्टीपल एंट्री एग्जिट’ की व्यवस्था की है. इसका अर्थ है कि 12वीं के बाद कोई 1 साल तक पढ़ता है तो उसे ‘सर्टिफिकेट’ दिया जाएगा. इसी तरह 2 साल तक ‘डिप्लोमा’ व तीसरे वर्ष ‘डिग्री’ और चार साल में उसे ‘ऑनर्स’ माना जाएगा. विद्यार्थियों के लिए परास्नातक (एम. ए.) केवल 1 वर्ष की ही होगी. इसका उदेश्य किसी भी छात्र का वर्ष ख़राब ना हो जितना उसने छोड़ दिया है. किसी कारण से उसे वहीं से फिर शुरू कर सके ऐसी व्यवस्था सरकार ने बनाई है जिसका लाभ ज़्यादातर दलित, पिछड़े समाज, ग़रीब एवं महिलाओं को ही होगा. इसके अलावा स्नातक में कोई भी स्टूडेंट कोई भी सब्जेक्ट ले सकता है उदाहरण के तौर पर राजनीति विज्ञान पढ़ने वाला व्यक्ति भी संगीत सीख सकता है.



इसके अलावा उच्च शिक्षा के लिए सिंगल रेगुलेटरी अथॉरिटी (हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया) बनाने की बात की गई है. साथ ही उच्च शिक्षा  में 2035 तक 50% एनरोलमेंट अनुपात बढ़ाना है, जो अभी 26.3% है. वहीं 3.30 करोड़ सीट बढ़ाने का लक्ष्य भी लिया गया है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने और सामाजिक न्याय को पाने का अच्छा कार्य है. उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को उनकी पढ़ाई के दौरान छात्रवृति हेतु ‘राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल’ को अधिक सक्रिय करने की बात की गई है. सामाजिक, आर्थिक, दिव्यांग, महिलाओं आदि को लेकर नई शिक्षा नीति में बहुत कुछ अच्छे बिंदु है जो उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होंगे.

शिक्षा नीति में इस वर्ग को एसईडीजी यानि की “सामाजिक आर्थिक उपेक्षित वर्ग”के रूप में चिन्हित किया गया है. अनुसूचित जाति जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग, ट्रान्सजेंडर एवं सभी छात्राएं इन सभी के बीच किस प्रकार से शिक्षा पहुंचे, इस पर बारीकी से अध्ययन किया गया है. शिक्षा नीति का दस्तावेज़ मानता है कि सामाजिक जड़ता, प्रथाएं एवं ग़रीबी, इस वर्ग के छात्रों को शिक्षा से दूर ले जाता है, विद्यालयों का दूर होना भी छात्राओं के लिए अपनी आगे की शिक्षा को जारी रखने में बड़ी बाधा बनती है. इसलिए इस शिक्षा नीति में “लैंगिक समावेशन फ़ंड”बनाने की बात की गई है. इस पैसे को खासकर छात्राओं, जिसमें ट्रान्सजेंडर को भी सम्मिलित किया गया है, इन सभी को अपने विद्यालय तक पहुंचने के लिए साइकिल देना, इनके लिए अलग से साफ़, स्वच्छ शौचालय निर्माण, एवं पढ़ाई हेतु अन्य सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने पर ख़र्च किया जाएगा. वहीं ग्रामीण भारत में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों का ज़्यादा निर्माण करना साथ ही जवाहर नवोदय विद्यालयों की लंबी चेन देशभर में खड़ी करना, जिससे अच्छी शिक्षा के साथ छात्रों के समग्र विकास हेतु अच्छा भोजन और परिस्थिति दी जा सके. वहीं, सामाजिक समरसता के भारत भाव को आगे बढ़ाया जा सके. इसके अलावा हर जिले में एक उच्च शिक्षा संस्थान का निर्माण करना जो भारत में सामाजिक न्याय एवं सब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचे इस ध्येय को पूर्ण करेगा.

शिक्षा में भारत की परंपरागत शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया गया है, शिक्षा नीति की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्राचीन भारत की भाषाओं के विकास और संवर्धन के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं. उदाहरण के तौर पर इसमें अब पाली, पर्शियन और प्राकृत भाषा के लिए राष्ट्रीय संस्थान खोले जाएंगे और भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक, साहित्यिक विकास के लिए भी संस्थान खोले जाएंगे और परंपरागत साहित्य विज्ञान को भी बढ़ावा दिया जाएगा. साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं में करिकुलम सिलेबस तैयार किया जाएगा, इससे प्राचीन भारत की गौरवशाली परम्परा और ज्ञान को संवारने का कार्य होगा. वहीं, दलित समाज के छात्र उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाई होने के चलते बीच में ही पढ़ाई छोड़ (ड्रॉपआऊट) देते थे, ये उनके लिए भी सहायक सिद्ध होगा. वहीं, शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता की बात की गई, ये भी समाज में अनुसूचित जाति, जनजाति अन्य पिछड़ा वर्गों आदि की शिक्षा संस्थानों में स्थान को सुनिश्चित करेगी, इसलिए आज जो भी कुछ विरोध सामाजिक न्याय के नाम पर हो रहा है वो मात्र दिखावा है इस शिक्षा नीति में सभी का विकास, समग्र विकास से सामाजिक समता निर्माण ऐसी दिशा देने का कार्य किया है. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)



(लेखक स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली, में सहायक प्रोफेसर हैं.)
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