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किसानों को नियमों की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए हैं नए कानून, फिर क्यों जारी है आंदोलन?

(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)
(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)

Farmers Protest: यह सोचना बहुत जरूरी है कि जब बेचने वालों की संख्या उतनी ही रहेगी और खरीदने वाले बढ़ जाएंगे, तो फायदा बेचने वालों को ही होगा. यह फायदा छोटे ही नहीं, बड़े किसानों को भी होगा. जो इस समय आंदोलन कर रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 16, 2020, 11:49 AM IST
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(करन भसीन)


नई दिल्ली. दिल्ली की सरहदों पर प्रदर्शन जारी है. हालांकि, इससे आगे सच और कुछ भी नहीं हो सकता कि यह किसानों का आंदोलन नहीं है. बल्कि, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के कुछ अमीर जमींदारों एक वर्ग प्रदर्शन कर रहा है. हाल ही में कई किसान संगठनों ने नए कृषि कानूनों (New Farm Laws) पर अपना समर्थन जताया है. उन्होंने कृषि मंत्री से कहा है कि अगर ये कानून वापस लिए गए, तो वे आंदोलन कर देंगे. अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों किसानों का एक वर्ग इन कानूनों का विरोध कर रहा है. जबकि, देश के कई संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं. इससे भी जरूरी बात यह है कि क्या हम इसे किसानों का आंदोलन कह सकते हैं, जब किसानों के बीच ही नए कानूनों को लेकर अलग-अलग मत हों?

तीन नए कानूनों और उनके काम को ऐसे समझिए
ये तीन नए प्रस्तावित कानून कृषि क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों को संभालने के लिए तैयार किए गए हैं. पहला कानून एक निजी बाजार बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां किसानों को अपना अनाज सरकारी मंडियों के अलावा कहीं और भी बेचने की आजादी होगी. साल 1991 में ज्यादातर सेक्टर्स से रेग्युलेशन्स हटने के बाद भी कृषि क्षेत्र में सरकार का काफी दखल था. इन नए कानूनों के जरिए सरकार ने किसानों को यह आर्थिक हक दिया है कि वे खुद ही तय करेंगे कि उन्हें अपना अनाज कहां बेचना है.



आलोचक एमसपी को लेकर भी बात करते हैं. नए कानूनों के तहत किसान एमसपी पर ही APMC (Agricultural Produce Market Committee) या निजी बाजारों में अपना प्रोडक्ट बेच सकते हैं. इस तरह से किसान निजी बाजारों के बारे में तब सोचेंगे, जब उन्हें वहां APMC से ज्यादा अच्छा भाव मिलेगा. खास बात है कि मुट्ठीभर अनाज के लिए केवल 6 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का फायदा मिलता है. जबकि, सबसे ज्यादा बड़ा हिस्सा गेंहू और चावल का होता है.

अब दूसरा कानून किसानों की कानूनी तौर पर मदद करता है. इसकी मदद से किसान कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग (Contract Farming) का लाभ ले सकते हैं. यह काफी जरूरी है, क्योंकि कई लोग इसे कॉर्पोरेट का समर्थक बता रहे हैं. जबकि, नए कानून किसानों को आसानी से कॉन्ट्रैक्टस से किसी भी समय बाहर होने की अनुमति देते हैं. वहीं, अगर समय से पहले कॉन्ट्रैक्ट टूटता है, तो कंपनियों को पेनाल्टी देनी होगी. कानूनों को ध्यान से देखा जाए, तो पता लगता है कि इन्हें किसानों के कानूनी हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.

तीसरा कानून जरूरी वस्तु अधिनियम के बारे में बात करता है. यह सूची में से ऐसी कई चीजों को हटाता है, जो निजी क्षेत्रों को सुनिश्चित कराते हैं कि सरकार दखल नहीं देगी और बाजारों को काम करने की अनुमति देगी. यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि निजी क्षेत्र लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज के जरिए मुनाफा कमा सके. अब कई लोग कहते हैं कि अगर कॉर्पोरेट को फायदा होगा, तो वह किसानों को कम पैसा और उपभोक्ताओं को ज्यादा पैसा देकर होगा. जबकि, कॉर्पोरेट सेक्टर बेहतर कीमत प्राप्ति के जरिए किसानों की कमाई के बाद भी मुनाफा कमा सकता है और उपभोक्ताओं को चीजें भी कम दर पर मिलेंगी. यह मुमकिन है क्योंकि पूरे देश में अच्छी वितरण व्यवस्था तैयार कर ली गई है. जिससे वजन कम होना रुकेगा और आवाजाही में होने वाला खर्च कम हो सकेगा.

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हमें यह जानना होगा कि सरकार ने E-NAM के तौर पर एक ऑनलाइन मार्केट तैयार किया है, जो किसानों को दूसरे बाजारों के भाव की भी जानकारी देगा. यह बेहद जरूरी जानकारी है और नए कानून किसानों को देश के दूसरे हिस्से में प्रोडक्ट बेचने में मदद करेंगे. अब कई लोग यह कहते हैं कि रेग्युलेटेड मंडियों के बाहर सामान बेचने पर सरकारी नियम लागू नहीं होंगे. यह पूरी तरह गलत है, देश में किसी भी तरह की खरीद-बिक्री पर कॉन्ट्रेक्ट की शर्तें लागू होंगी.

यह सोचना बहुत जरूरी है कि जब बेचने वालों की संख्या उतनी ही रहेगी और खरीदने वाले बढ़ जाएंगे, तो फायदा बेचने वालों को ही होगा. यह फायदा छोटे ही नहीं, बड़े किसानों को भी होगा. जो इस समय आंदोलन कर रहे हैं.

यह याद रखने वाली बात है कि विरोध कर रहे कई दल और राजनीतिक पार्टियां इस साल के शुरू होने तक इन्हीं कानूनों की मांग कर रहे थे. जैसे कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इन्हीं कानूनों का जिक्र किया था. ऐसे में इन आंदोलनों का मतलब किसानों के हितों और अर्थव्यवस्था से ज्यादा राजनीतिक बन गया है.
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