जानिए नए आईटी नियम के बारे में, जिसके दायरे में है सोशल मीडिया

सोशल मीडिया के लिए नए नियम लागू किए गए हैं. (File Pic)

सोशल मीडिया के लिए नए नियम लागू किए गए हैं. (File Pic)

Social Media: 26 मई से सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के लिए नए नियम लागू किए गए हैं जिन्हें मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटिल मीडिया आचरण संहिता नाम दिया गया है.

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नई दिल्‍ली. फिल्म 'वेलकम टू सज्जनपुर' का नायक एक गांव में लोगों के लिए चिट्ठी लिखने का काम करता है. लोग उसके पास अजीब-अजीब तरह की चिट्ठी लिखवाने आते हैं. मसलन फलाना संदेश अगर सौ लोगों तक नहीं पहुंचा तो सर्वनाश हो जाएगा और अगर पहुंच गया तो भला ही भला. कोई उससे कलेक्टर को गाली भरी चिट्ठी लिखवाता है, तो कोई उससे अपनी बेचारगी जाहिर करने को कहता है. किसी को अपने पति को उलाहना देनी है तो किसी को अपनी प्रियतमा को प्यार का इज़हार लिखवाना है. एक वक्त ऐसा आता है जब नायक के पास एक आदमी अपना फोन लेकर आता है और कहता है कि इस पर मोबाइल चिट्ठी लिख दो. हैरान नायक मोबाइल चिट्ठी यानी मैसेज को समझता है और जब लिखकर सेंट का बटन दबाता है तो मोबाइल धारक कहता है कि उसकी चिट्ठी पहुंच गई. नायक की हैरानी बढ़ जाती है कि इतनी जल्दी चिट्ठी पहुंच गई. ये फिल्म उस दौर की है जब भारत में सोशल मीडिया ने पैर नहीं पसारा था.

अब तो आलम ये है कि लोगों को अपने विचार बताने के लिए वेलकम टू सज्जनपुर के नायक की ज़रूरत ही नहीं है, सोशल मीडिया ने लोगों को इतना मुखर बना दिया है कि ताबड़तोड़ अपने विचार कायम कर रहे हैं. जितनी तेजी से विचार व्यक्त किए जा रहे हैं उतनी ही तेजी से वो फैल रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि विचारों के फैलने की प्रक्रिया को कोराना काल से पहले से वायरल होना कहा जा रहा है. इसको इस तरह से भी समझ सकते हैं कि जब मंगलवार की रात को सोशल मीडिया पर खबर फैली कि बुधवार से फेसबुक, ट्विटर जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बंद हो जाएंगे तो लोगों की बेचैनी इस कदर बढ़ गई जितनी वैक्सीन मिलने पर भी नहीं बढ़ रही है.

दरअसल 26 मई से सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के लिए नए नियम लागू किए गए हैं जिन्हें मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटिल मीडिया आचरण संहिता नाम दिया गया है.

फरवरी में सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने संस्थान में शिकायत निवारण और उनके अनुपालन का तंत्र बनाने के दिशानिर्देश जारी किए गए थे, जिसके तहत सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म और डिजिटल संस्थानों को एक रेज़िडेंट ग्रिवांस अधिकारी, मुख्य अनुपालन अधिकारी और एक नोडल अधिकारी रखना होगा. इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सभी प्लेटफॉर्म को एक मासिक रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दिए हैं, जिससे पता चल सके कि कितनी शिकायत दर्ज की गई और कितनों पर कार्रवाई की गई. इस दिशानिर्देश के तहत तुरंत संदेश पहुंचाने वाले ऐप को कहा गया है कि वो इस बात की व्यवस्था करें कि पहले संदेश भेजने वाला कौन था इसका पता चल सके.

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इनमें से किसी भी निर्देश को नहीं मानना सूचना प्रौद्योगिकी की सोशल मीडिया मध्यस्थता कानून की धारा 79 के तहत कानून का उल्लंघन माना जाएगा.

आईटी कानून की धारा 79 क्या कहती है?



धारा 79 के मुताबिक कोई भी मध्यस्थ अपने प्लेटफॉर्म पर किसी भी तीसरी पार्टी की सूचना, डाटा या कम्युनिकेशन लिंक, के लिए कानूनी या किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है. बशर्ते मध्यस्थ ने जारी संदेश में किसी तरह की कोई छेड़खानी नहीं की हो. इसका मतलब ये है कि अगर कोई भी प्लेटफॉर्म एक जगह से दूसरी जगह बगैर संदेश में छेड़छाड़ किए उसे महज़ पहुंचाने का काम कर रहा है. तो इस धारा के तहत उस पर किसी तरह की कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी. लेकिन इस धारा के तहत अगर सरकारी एजेंसी किसी संदेश को रोकने या हटाने का निर्देश जारी करती है, उसके बाद भी वो संदेश नहीं रोका जाता है, या संदेश में किसी तरह की कोई छेड़खानी करना सामने आता है तो प्लेटफॉर्म इस धारा के तहत सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा.

यहां एक बात और ध्यान देने वाली है कि मंत्रालय नियम लेकर आया है, ये कानून नहीं है. कानून तो दो दशक पहले (आईटी एक्ट 2000) ही बन चुका है, इस कानून के आधार पर ही नए नियम तैयार किए गए हैं. इस नियम के तहत प्लेटफॉर्म को किसी भी मैसेज या ट्वीट के उद्भावक यानि जिसने उसे सबसे पहली बार भेजा उसके बारे में बताना होगा. सरकार का इसे लेकर ये पक्ष है कि इसके जरिए अगर सोशल मीडिया की कंपनियों को लेकर उपभोक्ताओं को कोई शिकायत हुई तो उसका निवारण किया जा सकेगा.

नियम के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को एक अनुपालन अधिकारी रखना होगा जो नियमों का अनुपालन करवाएगा, इसके अलावा एक नोडल अधिकारी होगा जो कानून के अमल से जुड़ी एजेंसी से 24 घंटे संपर्क में रहेगा, साथ ही एक रेजिडेंट ग्रीवांस अधिकारी भी होगा जो शिकायत निवारण से जुड़ी ज़रूरी कार्यवाही करेगा. खास बात ये है कि ये तीनों अधिकारी भारत के निवासी होने चाहिए. अगर कोई ऐसी शिकायत आती है जो उपभोक्ता की गरिमा को हानि पहुंचाती है मसलन किसी महिला की अस्मिता को चोट पहुंचाने वाला कोई संदेश या गतिविधि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आती है, तो उक्त अधिकारी ये तय करेंगे कि ऐसा संदेश 24 घंटे में हटा लिया जाए. यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है कि संदेश को पहली बार भेजने वाले की जानकारी सोशल मीडिया को हर बार नहीं बल्कि विशेष आदेश पर देनी होगी. यहां गौर करने वाली बात ये है कि अगर संदेश देने वाला भारत के बाहर का होता है तो जिसने भारत में उस संदेश को पहली बार पोस्ट या ट्वीट किया उसे प्रथम प्रसारक माना जाएगा.

नए नियमों में ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे अमेज़न, नेटफ्लिक्स, डिजिटल न्यूज मीडिया पर प्रसारित कंटेट से जुड़ी शिकायत निवारण के लिए मैकेनिज्म तैयार करने को कहा है. इसके तहत जैसे फिल्मों के मामले में सेंसरबोर्ड करता है उसी तर्ज पर ओटीटी प्लेटफार्म को अपनी फिल्म या प्रसारित सामग्री को उपभोक्ता की उम्र के आधार पर वर्गीकृत करना होगा. यह वर्गीकरण 13 साल या उससे ज्यादा उम्र, 16 साल या उससे ज्यादा उम्र और 18 साल या उससे ज्यादा उम्र के हिसाब से होगा. जहां तक डिजिटल न्यूज मीडिया प्लेटफॉर्म की बात है उन पर नए नियमों के मुताबिक केबल टेलीविजन नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता संबंधी मान-मूल्य लागू किए जाएंगे.

क्या होगा अगर सोशल मीडिया फर्म सेक्शन 79 के तहत सुरक्षित नहीं रह पाती है?

फिलहाल तो रातों रात कुछ बदलने वाला नहीं है, सोशल मीडिया मध्यस्थ बगैर किसी दिक्कत के अपनी सेवाएं जारी रख सकते हैं. लोग भी अपनी पोस्ट या संदेश बगैर किसी बाधा के साझा कर सकते हैं. हालांकि फरवरी में नियमों की घोषणा हो जाने के बाद भी अभी तक ट्विटर, फेसबुक और इन्स्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर शिकायत निवारण के लिए किसी तरह का कोई अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया है. यही नहीं उपभोक्ताओं की शिकायत पर की गई कार्रवाई की कोई मासिक रिपोर्ट भी जमा नहीं की गई है. ऐसे में आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत वह सुरक्षा के दायरे में नहीं आ पाएगा.

आईटी नियम कहता है कि जरूरी सोशल मीडिया मंचों को मुख्य अनुपालन अधिकारी यानी सीसीओ नियुक्त करना होगा जो मंच के दिशा निर्देश के पालन न किए जाने के लिए जवाबदेह होगा.

लेकिन इस कदम से इत्तेफाक न रखने वालों का मानना है कि धारा 79 के तहत सुरक्षा न मिल पाने की वजह से प्लैटफॉर्म के स्टाफ को भी बिना उनकी गलती के जवाबदेह बनाने का खतरा है. सोशल मीडिया मंच को सुरक्षा मुहैया करवाने को लेकर अमेरिका के 1996 कम्यूनिकेशन्स डीसेंसी एक्ट की धारा 230 का हवाला दिया जाता है जो यह कहता है कि इंटरैक्टिव कम्प्यूटर सर्विस सेवा सिर्फ प्रकाशक या मंच के तौर पर देखा जाएगा जो किसी दूसरे की विषय वस्तु को सिर्फ पहुंचाने का काम करता है.

साधारण शब्दों में मध्यस्थ सिर्फ एक तरह का माइक है जिसके जरिए सूचना पहुंचाई जा रही है. कुछ गलत कहे जाने के लिए आप बोलने वाले को जिम्मेदार ठहराएंगे, न कि माइक को.

किस बात का विरोध?

नये नियम के मुताबिक शिकायत होने के पंद्रह दिनों के भीतर कार्रवाई की जाएगी और 24 घंटे के अंदर संदेश को हटा लेना होगा. यहां इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि हम जिस माध्यम की बात कर रहे हैं वहां घंटे नहीं नैनों सेकेंड में लोगों की गरिमा का काम तमाम हो जाता है और फेक न्यूज, असली खबर मान कर फैल जाती है. वहां 24 घंटे की अवधि या 15 दिन का समय क्या राहत पहुंचाएगा? सरकार भले ही साफ कर रही है कि उनका उद्देश्य किसी के संदेशों में ताकझांक करना नहीं बल्कि शुरुआत किसने की, उस तक पहुंचना है, जिससे मामले की मंशा साफ हो सके, और उसके मुताबिक संदेश पहुंचाने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सके.


यहां सरकार का कहना है कि प्रथम उद्भावक की जानकारी तभी मांगी जाएगी जब ऐसा लगेगा कि संदेश से देश की एकत-अखंडता या दूसरे देशों से संबंध और देश की सुरक्षा व्यवस्था को खतरा हो. दूसरा विरोध इसी बात को लेकर है कि सरकार अपने विचारों से असहमति को भी किसी दायरे के अंतर्गत ले सकती है. क्योंकि सोशल मीडिया पर सत्ता पक्ष के साथ सत्ता विरोधी भी मौजूद हैं. बीते दिनों सत्ता पक्ष ने आंदोलन और उसके समर्थकों को आंदोलनजीवी संबोधित कर उन्हें देश की रक्षा या अमन-चैन के लिए खतरा बताया था. दरअसल सोशल मीडिया पर धुर समर्थन और धुर विरोधी दोनों की समूह मौजूद हैं. ऐसे में विरोधियों को इस बात का डर है कि प्रथम उद्भावक का नाम बताना भले ही ज़रूरी नियम बताया जा रहा हो लेकिन ये असहमति को दबाने की नई तरकीब भी हो सकती है.

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