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'यतीम': कश्मीर में अमन और आतंक के बीच फंसी नई पीढ़ी

Image Source- news 18 india

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ये कहानी है कश्मीर के कुछ यतीमख़ानों की जहां ज़िन्दगी के दोराहे पर खड़ी एक पीढ़ी अब जवान हो रही है

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    ये कहानी है कश्मीर के कुछ यतीमख़ानों की जहां ज़िन्दगी के दोराहे पर खड़ी एक पीढ़ी अब जवान हो रही है. इस छत के नीचे रहने वाले हर किरदार की अपनी कहानी है लेकिन असली कश्मकश है उनमें, जिनके अब्बू कभी आतंकवाद के रास्ते पर चले थे और सेना की कार्रवाई में दुनिया छोड़ गए. .इन यतीमख़ानों में हमारी मुलाकात ऐसे तमाम बच्चों से हुई.

    साएमा की कहानी जो आर्मी में नौकरी नहीं करना चाहती

    साएमा एक साल की थी जब उसके अब्बू, भारतीय सेना का निशाना बने. आज वो बड़ी हो चुकी है. समझदार हो चुकी है. लेकिन ये मानने को तैयार नहीं है, कि उसके अब्बू ने जो किया था, गलत किया था.

    न्यूज 18 से बात करते हुए साएमा कहती है कि उनका ख्याल यही था कि कश्मीर को आज़ाद कराएं, उनका ये मकसद नहीं आतंक फैलाना नहीं था.

    साएमा के अब्बा की मौत के बाद मां बेसहारा थी, इसलिए एक नेकदिल संस्था ने उसे अपने पास रखा. आज वो 12वीं क्लास में पढ़ती है. डॉक्टर बनना चाहती है. श्रीनगर से दिल्ली तक, कहीं भी नौकरी मिले, वो जाने के लिए तैयार है. बस भारतीय सेना का साथ गंवारा नहीं है. साएमा आर्मी में नौकरी नहीं करना चाहती. साएमा कहती हैं कि मेरी मां ने बहुत सारी मुसीबतें झेली हैं. मैं नहीं चाहती अब मेरे परिवार में और मुसीबतें आए.

    मेरे अब्बू ने कश्मीर के लिए लड़ाई की मैं भी ऐसे ही लड़ूं.
    हूबहू साएमा जैसी कहानी इस नौजवान की भी है सेना की कार्रवाई में पिता के मारे जाने के बाद, ये बच्चा भी बरसों से अनाथालय में है. अच्छी तालीम ले रहा है. कबड्डी का बेहतरीन खिलाड़ी भी है लेकिन एक नफ़रत भी है जो उसका साथ नहीं छोड़ती.वो कहता है कि जैसे मेरे अब्बू ने कश्मीर के लिए लड़ाई की मैं भी ऐसे ही लड़ूं.

    इसी यतीम खाने में एक ऐसी बच्ची है जिसका ख्वाब है कि वो डॉक्टर बने. डॉक्टर बनकर समाज में बदलाव लाए.लेकिन इस बच्ची की नजर में इंडियन आर्मी एक विलेन हैं. वो कहती हैं मैं गन उठाउंगी. मेरी मां पर बहुत जुल्म हुआ. गन उठाकर इंडियन आर्मी से लड़ेंगे.

    अब्बा जान का रास्ता गलत था.

    हालांकि ये गुस्सा, ये नफरत, य़े बगावत बस सिक्के का एक पहलू है. इसी परिवेश और परवरिश में बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो अतीत को भुलाकर आने वाले कल से नज़र मिलाने को तैयार हैं.
    इसी यतीमखाने में परवरिश पाने वाले इस नौजवान की सोच जुदा है. इसका अब्बू भी कभी आतंकवाद के रास्ते पर चले थे. एक साल का था, जब पिता को उस रास्ते की कीमत चुकानी पड़ी. लेकिन अब इतना बड़ा हो चुका है, कि सही और गलत का फैसला कर सकता है.

    वो कहता है कि अगर मेरे अब्बू ने बंदूक नहीं उठाई होती तो आज वो जिंदा होते. अगर मेरे अब्बा जान कोई और काम करते, टीचर होते तो मुझे ज्यादा खुशी मिलती. .मुझे जितना लगता है अब्बा जान का जो रास्ता है वो गलत था. देखें रिपोर्ट.

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