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देश के लोगों को काफी देर बाद मिली थी महात्मा गांधी की हत्या की खबर

महात्मा गांधी की हत्या की खबर देश में लोगों को बहुत देर से पता चली थी (फाइल फोटो)
महात्मा गांधी की हत्या की खबर देश में लोगों को बहुत देर से पता चली थी (फाइल फोटो)

मौजूदा समय में जब तकनीक इतनी तेज है कि सेंकेडों में खबर दुनिया भर में प्रसारित हो जाती है तब यह कल्पना करना कठिन है कि भारतीय शहरों (Indian Cities) में पत्रकारों को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या का समाचार एक घंटे से भी ज्यादा देर से पता चला.

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मुंबई. मौजूदा समय में जब तकनीक इतनी तेज है कि सेंकेडों में खबर दुनिया भर में प्रसारित हो जाती है तब यह कल्पना करना कठिन है कि भारतीय शहरों (Indian Cities) में पत्रकारों को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या का समाचार एक घंटे से भी ज्यादा देर से पता चला.

पिछले महीने अपना 99वां जन्मदिन मनाने वाले वाल्टर अल्फ्रेड उस वक्त PTI के पत्रकार थे. वह 30 जनवरी 1948 की उस दुखद शाम नागपुर (Nagpur) के कार्यालय में थे, जब नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) ने दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधी जी के सीने में तीन गोलियां उतार दी थीं. उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन को याद करते हुए अल्फ्रेड बताते हैं कि उन दिनों कैसे धीमी गति से समाचार प्रसारित होते थे.

मुंबई ऑफिस से पता चली महात्मा गांधी की हत्या की ख़बर
फिलहाल मुंबई (Mumbai) के निकट मीरा रोड पर रह रहे अल्फ्रेड ने याद करते हुए कहा, “30 जनवरी, 1948 हम सभी के लिए एक रूखा दिन था. मैंने शाम तक कुछ स्टोरी फाइल की थीं. शाम करीब साढ़े छह-सात बजे के बीच दफ्तर के फोन की घंटी बजी और उस वक्त मुझे महात्मा गांधी की हत्या के बारे में पता चला.”
उनके एक सहयोगी ने मुंबई से उन्हें महात्मा गांधी पर बिड़ला हाउस (Birla House) में शाम 5.17 पर हुए जानलेवा हमले की जानकारी दी जब वह सांध्यकालीन प्रार्थना के लिए जा रहे थे. अल्फ्रेड उस साथी के नाम के तौर पर सिर्फ पोंकशे याद कर पाते हैं.



टेलीग्राफ लाइन के जरिए भेजे जाते थे समाचार
उन दिनों टेलेक्स और टेलीप्रिंटर मशीन (Teleprinter Machine) अत्याधुनिक तकनीक थी जिनसे टेलीग्राफ लाइन के जरिये लिखित समाचार भेजे जाते थे. 300 शब्दों के समाचार को स्वचालित रूप से टाइप करने और मशीन पर प्रदर्शित करने में कुछ मिनट लगते थे. नागपुर (Nagpur) में पीटीआई का दफ्तर उस वक्त बना ही था और टेलीप्रिंटर जैसे उपकरण लगाए जाने बाकी थे.

मुंबई जो उस समय बम्बई (Bombay) के नाम से जाना जाता था नयी दिल्ली के बाद पीटीआई का दूसरा बड़ा केंद्र था. उस वक्त मुख्यालय से पीटीआई के छोटे दफ्तरों को गैर जरूरी समाचार टेलीग्राम के जरिये भेजे जाते थे. इन टेलीग्राम को पीटीआई के स्थानीय पत्रकार हाथ से लिखकर समाचार तैयार करते और फिर इन्हें मैसेंजर के जरिये समाचार एजेंसी के स्थानीय ग्राहक समाचार पत्रों को भेजा जाता.

तकनीक थी उस समय की बड़ी चुनौती
जरूरी समाचार होने पर मुख्यालय से ट्रंक कॉल के जरिये एक साथी स्थानीय ब्यूरो को जानकारी देकर समाचार तैयार कराता और इसकी हस्तलिखित प्रतियां तैयार कर इनका वितरण कराया जताया.

पोंकशे जो संभवत: मुंबई में एक उपसंपादक थे, को उनके चीफ रिपोर्टर ने नागपुर (Nagpur) फोन कर गांधी की हत्या के जरूरी समाचार को अल्फ्रेड को देने का निर्देश दिया. अल्फ्रेड ने बताया कि उन्होंने अपना आत्मसंयम बनाए रखा. उन्होंने कहा, “मैंने पोंकशे की तरफ से दी गई संक्षिप्त जानकारी के आधार पर शुरुआती कॉपियां टाइप करनी शुरू कर दी. दफ्तर में उस वक्त दो संदेश वाहक मौजूद थे जो ये कॉपियां लेकर एक अंग्रेजी समाचारपत्र समेत छह स्थानीय ग्राहकों तक पहुंचे क्योंकि उस वक्त टेलीप्रिंटर (Teleprinter) नहीं था.”

ख़बर की कॉपी लिखना था एक चुनौती
अल्फ्रेड ने बताया, “यह शुद्ध एवं संक्षिप्त कॉपी लिखने के मेरे कौशल का परीक्षण था क्योंकि मुझे महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या के संबंध में आ रहे प्रत्येक फोन कॉल का जवाब देना था, नयी जानकारियों को लिखना था, छह ग्राहकों के लिए एक कॉपी बनानी थी और चपरासियों को इन कॉपियों को उन तक पहुंचाने के लिए भेजना था.’’ उन्होंने कहा कि उस दिन भावुक होने का समय नहीं था.

यह पूछने पर कि हत्या की खबरों ने क्या उन्हें गांधी से हुई उनकी पूर्व मुलाकातों की याद दिलाई, अल्फ्रेड ने कहा, “मेरे पास उन सारी यादों के लिए वक्त नहीं था. मेरा ध्यान सिर्फ टेलीफोन पर मिली रही जानकारियों को लिखने और उसकी कॉपी बनाने पर था. इनमें नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) की गिरफ्तारी और आरएसएस (RSS) से उसके कथित संबंध के ब्यौरे भी शामिल थे.”

नागपुर में गांधी की मौत पर कुछ लोग खुश भी थे
अगले दिन अल्फ्रेड नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुख्यालय गए. उन्होंने कहा, “मैं अगले दिन नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय गया. उन्होंने कहा कि वहां उन्होंने बाहर बहुत से लोगों को रोते हुए देखा.

अल्फ्रेड गांधी द्वारा संबोधित सभाओं को याद करते हैं. इनमें मुंबई के गोवालिया टैंक की सभा भी शामिल हैं, जहां गांधी ने अगस्त 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ों का नारा दिया.



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