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जंतर-मंतर: सिर्फ धरने-प्रदर्शन बंद नहीं हुए, मेरी बीट खत्‍म हो गई!

जंतर मंतर पर प्रदर्शन की फाइल फोटो

जंतर मंतर पर प्रदर्शन की फाइल फोटो

मुझे लगता था कि ये एक विशेष जगह है. इंकलाब का पौधा यहां उगता है. दबी-घुटी आवाजें यहां आंदोलन बन जाती हैं. यह आजादी मांगने की सबसे सही जगह है.

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल के आदेश के बाद जंतर-मंतर (एक सड़क) से सिर्फ धरने-प्रदर्शन ही बंद नहीं हुए, एक पूरा का पूरा शहर उजड़ रहा है. सवाल इतना सा है कि जंतर-मंतर क्‍या है? लेकिन इसका जवाब सामान्‍य ज्ञान की किताब में दर्ज ‘खगोलीय वेधशाला’ भर नहीं है.

किसी दूर राज्‍य में बैठा हर युवा एक बार जंतर-मंतर जरूर देखना चाहता है, शायद ऐसे ही जैसे मैं देखना चाहती थी. मुझे लगता था कि ये एक विशेष जगह है. इंकलाब का पौधा यहां उगता है. दबी-घुटी आवाजें यहां आंदोलन बन जाती हैं. यह आजादी मांगने की सबसे सही जगह है.

कई बरस मुझे लगता रहा कि यहां लगाए गए नारे सियासत के कानों के पर्दे फाड़ देते हैं. यहां की रैलियां, नारे लिखी तख्तियां न्‍याय दिलाने में सक्षम हैं. कैंडल मार्च एक शालीन और भव्‍य आंदोलन है, जिसमें हम जैसे युवा शामिल न हुए तो हमारा जीवन बेकार है.

और इस तरह जमीन में ठोकर मारकर पानी निकालने की बेताबी वाले युवा की आंखों से देखें तो जंतर-मंतर हमेशा इंकलाब और आंदोलन की जमीन लगता रहा. जिन्‍होंने इसे अब तक नहीं देखा, उनकी नजर में आज भी यही तस्‍वीर दर्ज है.

हजारों की संख्‍या में अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर जुटती रही है भीड़. (फाइल फोटो )


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फिर मैं पत्रकारिता में आई. दिल्‍ली के हिंदी-अंग्रजी अखबारों में आज भी चलन है नए रिपोर्टर को सबसे पहले जंतर-मंतर बीट दी जाती है. मुझे भी दी गई.

जंतर-मंतर के सामने खड़े होकर देखा तो समझ आया कि बीट वाला जंतर-मंतर असल में वह खगोलीय वेधशाला नहीं है, बल्कि टॉलस्‍टॉय मार्ग और अशोका रोड गोल चक्‍कर के बीच में बना जंतर-मंतर रोड है, इससे वाहन नहीं गुजरते. बैरीकेड लगे हैं.

सड़क के दोनों ओर तम्‍बू गड़े हैं. बड़े-बड़े पोस्‍टर लगे हैं. पैम्‍प्‍लेट बंट रहे हैं. लाउडस्‍पीकर हैं. जोश, जूनून, आवाजें, शोर, क्रांति, न्‍याय और बदलाव के नारे लग रहे हैं. दिल्‍ली पुलिस की टुकड़ियां मुस्‍तैद हैं. वाटर कैनन खड़ी हैं.

और इस तरह रिकॉर्ड रहा कि जंतर-मंतर पर 8-15 धरने-प्रदर्शन रोजाना होते रहे. अलग-अलग राज्‍यों से हजारों लोग अपनी मांगें और मांगपत्र लेकर जंतर-मंतर आते और प्रधानमंत्री व राष्‍ट्रपति के नाम पहुंचाए गए ज्ञापन से ही लाखों उम्‍मीदें लेकर लौटते रहे.

जंतर-मंतर पर आए दिन विरोध प्रदर्शन में पुतले जलाए जाते रहे हैं. (फाइल फोटो )


संसद सत्र में धरने-प्रदर्शनों की संख्‍या रोजाना 20-25 तक पहुंच जाती. इनमें मजदूर, सैनिक, श्रमिक, युवा, महिलाएं सभी शामिल होते. ज्ञापनों की सुनवाई न होते देख कुछ धरने जंतर-मंतर पर स्‍थाई होते गए और ये जगह उन लोगों का घर बनती गई.

कुछ ऐसे धरने भी थे कि उनकी आपबीती सुनो तो आंसू निकल आएं. ऐसे ही कई पीडि़तों को देखकर मैंने एक बार लिखा था....  जिंदगियों का तमाशा देखना हो तो जंतर-मंतर चले आइए...

 मैं सोचती हूं प्रेस क्‍लब के बाद अगर कहीं दर्जनों पत्रकार और फोटो-जर्नलिस्‍ट्स का झुंड नियमित दिखाई देता था तो वह जंतर-मंतर ही था. शायद ही ऐसा कोई दिन रहा कि मैंने जंतर-मंतर पर हाजिरी न लगाई हो.

मेरी तरह और भी पत्रकार वहां रोजाना आते, आधा दिन बिताते, चर्चा करते, किताबें पढ़ते, कुछ लिखते, झपकियां लेते, पेड़ से तोड़कर शहतूत खाते, दुख जताते, खबर लेते और दफ्तरों को रवाना हो लेते.

यहां आंदोलन ही नहीं चरखा कातने के लिए भी लोग आते रहे. जंतर-मंतर पर गाएं भी आई, चारा भी डाला गया, चूल्‍हे भी रखे गए, रोटियां भी सेकी गईं, दीए भी जलाए गए. इस तरह पुराने लोग बताते कि दिल्‍ली में मौसम बदलते रहे लेकिन ढाई दशक से जंतर-मंतर की फिजा नहीं बदली.

महिलाओं ने भी जंतर-मंतर पर अपनी मांगें बुलंद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. (फाइल फोटो )


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यह आवाजों की जगह थी, यहां शोर अच्‍छा लगता था और शांति यहां काटने को दौड़ती थी. एक बार रात के 9 बजे थे, मैं ऑफिस से निकली, स्‍कूटी से जंतर-मंतर पहुंची. सन्‍नाटा था. ठंडी हवा थी, कुछ पंडाल उखड़ चुके थे. कुछ बचे थे. प्‍लास्टिक के शामियानों के नीचे चादरों में लिपटे गहरी नींद में थे.

मैं वहां कुछ देर ठहरी, सोचने लगी ये सुबह वाला ही जंतर-मंतर है? महसूस हुआ जैसे शमशान में हूं..... और फिर एक दिन मैंने जिंदगी से तुलना कर जंतर-मंतर पर एक शेर कहा... दिन में रौनक-ए-हयात, रात में श्‍मशान होती है, जिंदगी मुंई जंतर-मंतर हो गई...

अंत में यही कि जंतर-मंतर एक सड़क नहीं एक रहस्‍यमयी संसार था. अनेक सकारात्‍मक और नकारात्‍मक चीजें यहां दिखीं, राजनीति, संघर्ष, पीड़ा, चालाकी और उपेक्षा भी दिखी पर जो सबसे ज्‍यादा दिखा वह हक के लिए लड़कर चेहरे पर छलक आया सुकून था.

और अब प्रदर्शनकारियों को भले ही रामलीला  मैदान दे दिया जाए और धरने-प्रदर्शनों का दौर एक बार फिर शुरू हो जाए,  लेकिन एक पत्रकार होने के नाते मुझे और हर पत्रकार को दी जाने वाली जंतर-मंतर बीट ही खत्‍म हो गई है.

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