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निर्भया मामले के 9 साल: बलात्कार के कानून में बदलाव लाया गया, सख्ती के बावजूद नहीं मिले बेहतर परिणाम

16 दिसंबर 2012 को बुरी तरह से घायल लड़की को अस्पताल में भर्ती किया गया, जिंदगी की लड़ाई से जूझते हुए उसने 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया. प्रतीकात्मक फोटो

16 दिसंबर 2012 को बुरी तरह से घायल लड़की को अस्पताल में भर्ती किया गया, जिंदगी की लड़ाई से जूझते हुए उसने 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया. प्रतीकात्मक फोटो

Nirbhaya Rape Case: 23 साल की एक मेडिकल छात्रा के साथ छह लोगों ने देश की राजधानी में क्रूरतम तरीके से सामूहिक बलात्कार ...अधिक पढ़ें

    नई दिल्ली. सर्दी की रात में आज से 9 साल पहले एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. पूरा देश निर्भया (Nirbhaya Rape Case) के लिए रो रहा था, जो एक चलती बस में छह लोगों की क्रूरतम बलात्कार का शिकार हुई थी. तमाम कोशिशों के बावजूद निर्भया को बचाया नहीं जा सका, लेकिन इस भयानक घटना ने इस तरह के कृत्यों को रोकने और सजा के प्रावधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस को जन्म दिया. इस वीभत्स घटना के बाद कानून में बदलाव आए औऱ महिलाओं की सुरक्षा के लिए योजना तैयार की गई और इसके लिए कोष बनाया गया. हालांकि बलात्कार के मामलों में कोई खास कमी नहीं आई. अगर डाटा पर नजर डालें तो मालूम चलता है कि अभी भी दोष सिद्ध होने के मामलों की दर कम ही है…

    निर्भया और सर्दी की वह भयानक रात
    23 साल की एक मेडिकल छात्रा के साथ छह लोगों ने देश की राजधानी में क्रूरतम तरीके से सामूहिक बलात्कार किया और लड़की को बस से बाहर किसी सुनसान इलाके में फेंक दिया. 16 दिसंबर 2012 को बुरी तरह से घायल लड़की को अस्पताल में भर्ती किया गया, जिंदगी की लड़ाई से जूझते हुए उसने 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया. इस भयानक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खबरों में भारत में महिलाओं की सुरक्षा और उनके खिलाफ यौन हिंसा की परतों को उधेड़ कर रख दिया. इसके बाद देश भर में बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा देने के कानून बनाए जाने की बात उठने लगी.

    कौन थे दोषी
    सभी आरोपियों को गिरफ्तार करके उन पर यौन उत्पीड़न और हत्या का आरोप लगाया गया. 11 मार्च, 2013 को आरोपियों में से एक राम सिंह ने पुलिस हिरासत में आत्महत्या कर ली. कुछ प्रकाशित रिपोर्ट बताती हैं कि रामसिंह ने खुद को फांसी लगा ली थी, लेकिन बचाव पक्ष के वकील और परिवार का कहना था कि उसकी हत्या की गई थी. बाकी बचे हुए आरोपियों पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाया गया. किशोर न्याय अधिनियम के तहत किशोर को बलात्कार और हत्या का दोषी मानते हुए सुधार केंद्र में तीन साल की सजा सुनाई गई. बाकी बचे चार वयस्क- पवन गुप्ता, विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर और मुकेश सिंह ( राम सिंह का भाई) को बलात्कार और हत्या के मामले में दोषी मानते हुए 10 सितंबर, 2013 को फांसी की सजा सुनाई गई. 13 मार्च, 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने मौत के संदर्भ में मौत की सजा को बरकरार रखा. 18 दिसंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने दोषियों की अंतिम अपील को खारिज कर दिया. 20 मार्च, 2020 को सभी आरोपियों को फांसी दे दी गई.

    बलात्कार कानून में बदलाव लेकिन वह काफी नहीं… क्यों
    21 मार्च, 2013 को बलात्कार के कानून में बदलाव लाया गया. बलात्कार के खिलाफ कानून और सख्त किया गया. आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 में बलात्कार को फिर से परिभाषित करते हुए बलात्कार के दोषियों के लिए सजा में बढ़ोतरी के साथ साथ बार बार बलात्कार के मामले में आरोपी के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया गया. इस कानून के तहत बलात्कार के एसिड हमलों, पीछा करने और लड़कियों को घूरने वालों को कड़ी सजा का प्रावधान है. हालांकि आपराधिक कानून में बदलाव के कोई बेहतर परिणाम नहीं मिले. कानून विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक कानूनों को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाता है, तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता है.

    वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने पीटीआई को बताया कि बलात्कार विरोधी कानून अपर्याप्त नहीं है. 2013 के संशोधन से पहले भी भारतीय दंड संहिता में यौन अपराध से जुड़े प्रत्येक कार्य को शामिल किया गया था और यह कानून सख्ती बरतता था. जेएस वर्मा समिति की सिफारिश के बाद बदलाव करते हुए बलात्कार और बलात्कार के बाद मौत की सजा को बढ़ाकर 20 साल कर दिया गया, साथ ही सामूहिक बलात्कार मामले में उम्रकैद की सजा दी गई. लेकिन समीति ने भी ऐसे मामलों में मौत की सजा देने से परहेज किया था.

    वरिष्ठ अधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी पीटीआई को बताती हैं कि कानून में हुए बदलाव का स्वागत है लेकिन दिक्कत उसके कार्यान्वयन को लेकर है. साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिस बल के पास अधिकारों की कमी है और वह लोगों में भरोसा कायम रख पाने में भी नाकाम रही है. वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता पीटीआई को कहती हैं कि यौन उत्पीड़न के मामले में महज कड़ी सजा ही अकेला इलाज नहीं है. कुछ और प्रभावकारी तरीकों की अपनाने की जरूरत है. उनका कहना है कि बलात्कार मामले में जल्दी से जल्दी सुनवाई किए जाने और वक्त पर फैसला लिए जाने की ज़रूरत है.

    निर्भया कोष
    सरकार ने इस भयानक घटना के बाद निर्भया कोष स्थापित किया था. इस कोष को विशेष तौर पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली योजनाओं के लिए बनाया गया था. इसके साथ ही उनकी शिकायतों के लिए हेल्प लाइन नंबर का प्रावधान भी किया गया. हालांकि रिपोर्ट बताती है कि कोष का पैसा कई राज्यों में बगैर इस्तेमाल के यूहीं पड़ा रहा. टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक सरकारी संस्थानों के बीच आपसी समन्वय नहीं होने की वजह से तमिलनाडु को मिले 461 करोड़ रुपये में से अप्रैल 2021 तक 10 फीसद ही इस्तेमाल किया गया था. इसी तरह ओडिशा को निर्भया कोष में 2,532.49 लाख रुपये प्राप्त हुए थे औऱ 2016 जनवरी से अप्रैल 2021 तक 1,872.42 लाख रुपये बचे हुए थे.

    हताश करते हैं हालिया बलात्कार के आंकड़े
    राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के मामले में केवल 39 फीसद मामलों में आरोप सिद्ध हुए है. दोषसिद्धि के मामले में एनसीआरबी के आंकड़े पुलिस और अदालतों की एक धूमिल छवि प्रस्तुत करते हैं. जो साफ करता है कि या तो पुलिस ने जांच सही नहीं की या किसी आरोपी पर गलत तरीके से आईपीसी की धारा लगाई गई. 2020 में 43 हजार से ज्यादा बलात्कार के मामलों में जांच हुई, लेकिन केवल 3,814 मामलों में दोषसिद्धि पाई गई.

    एनसीआरबी के डाटा का हवाला देते हुए सरकार ने संसद में कहा कि देश में पिछले साल महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 371,503 मामले दर्ज हुए. डाटा के मुताबिक 2020 में 398,620 लोगों को महिलाओं से जुड़े अपराधों में गिरफ्तार किया गया. 488,43 पर आरोप लगे और 31,402 को सजा हुई.

    Tags: Delhi Rape Case, Nirbhaya

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