क्या इन बच्चों का कोई देश नहीं? जो बन रहे हैं कोरोना के आसान शिकार

देश में कोरोना वायरस के 8.6% मरीज 20 से कम उम्र के हैं.

लॉकडाउन (Lockdown) के पहले दौर में बच्चों की मदद के लिए जारी हेल्पलाइन नंबर पर 4.6 लाख फोन आए. इनमें से 30% फोन में कोरोना वायरस (Coronavirus) से जुड़ी मदद मांगी जाती है. इनमें से भी अधिकतर फोन में खाने के लिए मदद मांगी गई.

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    नई दिल्ली. नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, ‘किसी समाज की आत्मा की परख करनी है तो यह देखना चाहिए कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है.’ यदि यह सच है तो फिर 12 साल की प्रवासी मजदूर जमालो मकदाम के बारे में क्या कहना चाहिए, जिसने लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान 150 किलोमीटर चलकर दम तोड़ दिया. क्या यही समाज की आत्मा है?

    आप उस समाज के बारे में क्या कहेंगे, जहां बच्चों की हेल्पलाइन के लिए जारी सरकारी नंबर पर लॉकडाउन के पहले दौर में 4.6 लाख फोन आते हैं. इनमें से 30 फीसदी फोन कोरोना वायरस (Coronavirus) से जुड़ी कोई मदद मांगते हैं. इनमें से भी अधिकतर फोन में खाने की मांग की जा रही होती है. हालांकि, इसी दौरान 9385 फोन शारीरिक या यौन हिंसा की प्रताड़ना की शिकायत वाले होते हैं.

    जब देश में कोरोना वायरस से संक्रमित होकर 2415 लोग जान गंवा चुके हैं और करीब 75 हजार लोग इस वायरस से संक्रमित हैं. उस समय देश में इसी दौरान चाइल्ड पोर्नोग्राफी 95% बढ़ जाती है. कोरोना वायरस से बच्चों की अपेक्षाकृत मौत कम हुई है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे बच्चे प्रभावित कम हुए हैं. करीब 8.6 फीसदी कोरोना पीड़ित 20 से कम उम्र के लोग ही हैं. लेकिन कोरोना संक्रमण के अलावा कई ऐसे कारण हैं, जिन्होंने बच्चों को बुरी तरह प्रभावित किया है. खासकर गरीब परिवार के या चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन में रहने वाले बच्चे.

    महाराष्ट्र में कोरोना वायरस का सबसे अधिक संक्रमण है. मेडिकल एजुकेशन एंड ड्रग्स डिपार्टमेंट ने 12 मई को बताया कि राज्य में 10 साल से कम उम्र के 770 बच्चे कोरोना पीड़ित हैं. वहीं 10 से 20 साल के उम्र के 1579 बच्चे कोरोना पॉजिटिव हैं. राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, तेलंगाना में भी कोरोना के कारण बच्चों की मौत हुई है.

    सेव द चिल्ड्रेन के आनिंदित रॉय चौधरी के शब्दों में, ‘हम लगातार कह रहे हैं कि कोरोना वायरस बच्चों के लिए कम खतरनाक है. इससे परेशानी बढ़ सकती है. कहीं ना कहीं हम ऐसा कहकर बच्चों के प्रति खतरे को बढ़ा रहे होते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘सच्चाई यह है कि कोविड-19 कमजोर इम्यून सिस्टम वालों को जल्दी संक्रमित करता है और जो बच्चे कुपोषित हैं या संवेदनशील हैं, वे भी इसकी चपेट में जल्दी आते हैं. दुर्भाग्य से वंचित तबके से आने वाले या अनाथ बच्चों में ये सारी ही चीजें पाई जाती हैं. इसलिए उनके कोरोना से संक्रमित होने के ज्यादा मौके हैं.’

    अपने ही घर में ‘अनाथ’...
    जुवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन एक्ट के मुताबिक राज्य की देखरेख में सिर्फ अनाथ बच्चे नहीं रहते, बल्कि वे भी रहते हैं, जिनके मां-बाप गरीबी के कारण उन्हें ठीक से पाल नहीं पाते. साल 2019 में जेना कमेटी की एक रिपोर्ट आई थी. इसके मुताबिक देश में चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन (सीसीआई) में करीब 1.80 लाख बच्चे रहते हैं. जब देश में कोरोना का कहर बढ़ा तो इनमें से कई बच्चों को उनके घर लौटने को कह दिया गया. सीसीआई के फाउंडर न्यूटन बताते हैं कि उनकी संस्था के 90 फीसदी बच्चे घर लौट गए हैं. उन्होंने बताया कि जब बच्चे घर लौट गए तो हमने उनसे संपर्क किया. ज्यादातर ने कहा कि उन्हें ठीक से खाना नहीं मिल रहा है. सीसीआई की मदद करने वाले एनजीओ मिरेकल फाउंडेशन की हेड (इंडिया) निवेदिता दासगुप्ता कहती हैं कि ऐसे बच्चों के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं. उनके सामने खुद के खाने का संकट है. यही कारण है कि वे अपने बच्चों को सीसीआई जैसी संस्थाओं में छोड़ जाते हैं.

    पढ़ाई में होंगे पीछे
    लॉकडाउन के चलते स्कूल भी बंद हैं. निजी स्कूल ऑनलाइन शिक्षा देना शुरू कर चुके हैं. लेकिन गरीब बच्चों के सामने चुनौती अलग है. भूमि के को-फाउंडर डॉ. प्रहलाथन कहते हैं कि ऐसे बच्चों के सामने सिर्फ खाने का संकट खड़ा नहीं हुआ है. घर लौटने से उनकी पढ़ाई पर भी असर पड़ने जा रहा है. ज्यादातर सीसीआई के पास ऑनलाइन टीचिंग की तकनीक नहीं है और ना ही बच्चों के पास मोबाइल है. इसलिए वे पढ़ाई में पिछड़ जाएंगे.

    और जो सड़कों पर हैं...
    सीसीआई में रहने वाले बच्चों को तो फिर भी खाना मिल जाता है. सोने के लिए छत मिल जाती है. लेकिन ऐसे हजारों-लाखों बच्चे हैं, जो सड़कों पर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं. ऐसे बच्चों को हिडेन चिल्ड्रेन कहा जाता है क्योंकि जनगणना में भी इनका उल्लेख नहीं रहता. बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाली संस्थाओं के मुताबिक देश में करीब 20 लाख ऐसे बच्चे हैं, जो हिडेन चिल्ड्रेन की परिभाषा में फिट बैठते हैं. इनके पास आधार कार्ड या अन्य पहचान पत्र भी मुश्किल से ही होता है. 2011 की जनगणना के मुताबकि देश में करीब एक करोड़ बाल मजदूर हैं. अगर महामारी के कारण गरीबी बढ़ी तो यह संख्या भी बढ़ जाएगी.

    अंधकार में भविष्य
    बच्चे किसी भी तरह की आपदा में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. क्योंकि समाज में उनकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं होता. इसलिए यह सरकार की जिम्मेदारी है कि ऐसे बच्चों को कोविड-19 से प्रभावितों की श्रेणी में रखकर उनकी मदद करे. राय चौधरी के मुताबिक इस वक्त भुखमरी भी बड़ी चिंता है. हर किसी का राशनकार्ड नहीं होता. हर किसी तक आसानी से सरकारी मदद नहीं पहुंच पाती. ऐसे में सरकार के साथ-साथ एनजीओ की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. सरकार को भी एनजीओ की मदद लेनी चाहिए, जिससे हर बच्चे तक मदद पहुंचाई जा सके. यह संभव है कि बच्चे कोरोना वायरस से बहुत संक्रमित ना हों, लेकिन यह तय है कि उन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने जा रहा है.

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