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OPINION: अजित पवार को सीखना होगा सत्ता और उत्तराधिकार की लड़ाई आधे-अधूरे मन से नहीं लड़ी जाती

Sumit Pande | News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 1:42 PM IST
OPINION: अजित पवार को सीखना होगा सत्ता और उत्तराधिकार की लड़ाई आधे-अधूरे मन से नहीं लड़ी जाती
प्रफुल्ल पटेल ने बताया कि अजित पवार हमारी बातें समझ रहे हैं.

कहा जा रहा है कि अजित पवार (Ajit Pawar) ने साफ-साफ कह दिया है कि वो वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं. पवार को ये पता था कि एक बार अगर उन्होंने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी तो फिर पार्टी में लौटने के बाद भी लोग उन्हें संदेह की नजरों से देखेंगे.

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  • Last Updated: November 26, 2019, 1:42 PM IST
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जाति के आधार पर बनी क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक राजवंशों को बढ़ावा देती हैं. ऐसे दल के नेता अपने करीबियों को विश्वास में रखते हैं. ऐसे में राजनीतिक संरक्षण एक विश्वसनीय समूह पर निहित होता है जिसमें नेता का निकट या विस्तारित परिवार शामिल होता है.

भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं. मसलन तमिलनाडु में करुणानिधि के परिवार (Karunanidhi Family) से लेकर आंध्र प्रदेश में टीडीपी, पंजाब (Punjab) में बादल और फिर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी. यहां उलझन उस वक्त बढ़ती है जब सत्ता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है. यहां सत्ता हड़पने के लिए नेता कुछ भी करने को तैयार होते हैं.

आज से करीब 24 साल पहले एन चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर और टीडीपी नेता एनटी रामाराव के साथ ऐसा ही किया था. 1995 में नायडू ने अपने ससुर को सीएम पद से हटा दिया और खुद सीएम बन गए. नायडू ने तब आरोप लगाया था कि एनटीआर की जगह उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती शासन चला रही हैं. उन्होंने पार्टी के अंदर सास-ससुर के खिलाफ एक अलग गुट बना लिया और उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री पद से एनटीआर को इस्तीफा देना पड़ा. नायडू 1 सितंबर 1995 को पहली बार राज्य के सीएम बने.

पिछले एक दशक में सत्ता के लिए सबसे खतरनाक लड़ाई उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के परिवार में हुई है. सत्ता के लिए यहां मुलायम के भाई शिवपाल और अखिलेश के बीच लड़ाई हुई थी. इस वक्त सत्ता के लिए जो लड़ाई महाराष्ट्र में हो रही है वो समाजवादी पार्टी के झगड़े से थोड़ा अलग भी है और इन दोनों के बीच थोड़ी समानताएं भी हैं. ऐसा लग रहा है कि अजित पवार ने जो अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया है इसकी थोड़ी प्रेरणा उन्हें समाजवादी पार्टी से मिली.

मुलायम ने सत्ता के झगड़े को उस वक्त सुलझाया जब अखिलेश सीएम की कुर्सी पर बैठे थे. शिवपाल को इसी का नुकसान उठाना पड़ा. महाराष्ट्र में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार को पीछे धकेल कर सत्ता हथियाने की कोशिश की है. उन्होंने यहां जोखिम भी उठाया है. अगर वो अपनी सरकार बचाने में कामय़ाब होते हैं तो फिर एनसीपी पर उनका कब्जा हो जाएगा. अगर वो हार जाते हैं तो फिर उन्होंने खुद को केंद्र और राज्य में बचाने के लिए बीजेपी का साथ चुन लिया है.

उत्तर प्रदेश में मुलायम की सबसे बड़ी ताकत ये थी कि वो लोगों को ये दिखा रहे थे कि वो अपने भाई शिवपाल के समर्थन में हैं. अपने बेटे को चुनौती देने वालों को ही उन्होंने अपने करीब रखा. मुलायम ने शिवपाल को हमेशा अपने नियंत्रण में रखा. इस दौरान अखिलेश ने पार्टी में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली.

ऐसी खबरें भी आईं कि एनसीपी की तरफ से अजित पवार को मनाने की भी कोशिश की गई. जिस दिन अजित पवार ने शपथ ली उसी दिन एनसीपी के नेता सुनील ततकारे ने एक ऑफर के साथ उनसे मुलाकात की थी. उन्हें वापस लौटने की डेडलाइन दी गई. अजित पवार को पार्टी के नेता पद से हटा दिया गया. लेकिन एनसीपी के सदस्य के तौर पर उन्हें नहीं हटाया गया.कहा जा रहा है कि उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि वो वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं. पवार को ये पता था कि एक बार अगर उन्होंने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी फिर पार्टी में लौटने के बाद भी लोग उन्हें संदेह की नजरों से देखेंगे.

लखनऊ और मुंबई में सत्ता संघर्ष में समानता को देखें तो तत्काल परिवार के लिए किसी भी राजनीतिक चुनौती को समाप्त कर दिया गया है. शिवपाल समाजवादी पार्टी से बाहर हो गए हैं. वहीं एनसीपी से अजित पवार भी. समाजवादी पार्टी में शिवपाल अपने बेटे के लिए बड़ी भूमिका चाह रहे थे. जबकि यहां अजित पवार भी अपने बेटे के लिए रोल मांग रहे थे. यहां अजीत पवार की जीत नहीं हुई. उनकी स्थिति कमजोर हो गई है. इसलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वो एनसीपी हैं. सत्ता संघर्ष और उत्तराधिकार की लड़ाई  आधे-अधूरे मन से नहीं पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी जाती है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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First published: November 26, 2019, 12:01 PM IST
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