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घर से निकला कचरा आपके शरीर में घोल रहा है ज़हर

सावधान! घर से निकला कचरा आपके शरीर में घोल रहा है जहर...

सावधान! घर से निकला कचरा आपके शरीर में घोल रहा है जहर...

दिल्ली देश में सबसे ज्यादा कचरा पैदा करता है और इसकी तीन प्रमुख लैंडफिल साइट्स गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में कचरे के ढेर की ऊंचाई बढ़ते-बढ़ते अब क़ुतुब मीनार की आधी हो गई हैं.

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यूपी के नोएडा सेक्टर-123 में कूड़ा डालने की जगह यानी लैंडफिल को लेकर जारी विवाद अभी थमता नज़र नहीं आ रहा है. सीएम योगी आदित्यनाथ ने बीते सोमवार को भले ही इस लैंडफिल को आबादी से 2 किलोमीटर दूर करने का वादा किया हो, नोएडा अथॉरिटी ने साफ़ कर दिया है कि उन्हें इससे संबंधित कोई आदेश नहीं मिला है. सिर्फ नोएडा ही नहीं दिल्ली में भी घोंडा गुजरान और सोनिया विहार में प्रस्तावित लैंडफिल साइट को लेकर इलाके के लोग विरोध कर रहे हैं. दिल्ली देश में सबसे ज्यादा कचरा पैदा करता है और इसकी तीन प्रमुख लैंडफिल साइट्स गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में कचरे के ढेर की ऊंचाई बढ़ते-बढ़ते अब क़ुतुब मीनार की आधी हो गई हैं.

19 जून को सीएम के आदेश के बाद एक मीटिंग भी हुई जिसमें नोएडा प्राधिकरण के सीईओ आलोक टंडन, केंद्रीय मंत्री डॉ महेश शर्मा, नोएडा विधायक पंकज सिंह और विरोध कर रहे लोगों के नेता शामिल हुए थे. हालांकि नोएडा फेडरेशन ऑफ़ अपार्टमेंट ओनर एसोसिएशन (NOFAA) के अंकित श्रीवास्तव ने साफ़ कर दिया कि अभी किसी भी बात पर सहमति नहीं बन पाई है. बता दें कि 17 जून को हुई महापंचायत के बाद प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पर्थला गोलचक्कर को जाम कर दिया था और करीब चार किलोमीटर लंबा जाम लग गया. इसके बाद पुलिस ने 111 लोगों को हिरासत में ले लिया था जिनमें 35 औरतें भी शामिल थीं. पुलिस का आरोप है कि महापंचायत में लोग लाठी-डंडों और हॉकी जैसे हथियारों के साथ पहुंचे थे और एहतियात के तहत लोगों को हिरासत में लिया गया था, सभी को उसी शाम छोड़ दिया गया था.



क्यों हो रहा है विरोध
साल 2006 में बने नोएडा मास्टरप्लान-2031 के मुताबिक सेक्टर 123 में लैंडफिल नहीं बल्कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बनना है. इसी साल मई 29 को सेक्टर 22, 23, 53, 55 और 56 रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की एक पिटीशन पर सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सेक्टर 54 में जारी डंपिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया और सेक्टर-123 में डालने के लिए कहा. इसी के बाद से कूड़े को सेक्टर-123 में डाला जाने लगा. 12 एकड़ में फैली इस ज़मीन पर फिलहाल सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट या फिर प्रस्तावित वेस्ट टू एनर्जी प्लांट का काम शुरू ही नहीं हुआ है. यहां कूड़ा डंप होता देख इलाके के लोगों ने विरोध शुरू कर दिया.

नोएडा सेक्टर 117-122 के लोग इलाके में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट भी लगाए जाने के विरोध में है. इलाके के गांव जैसे बहलोलपुर, गढ़ी चौखंडी, सोरखा, सरफाबाद, पर्थला के आलावा सोसायटीज जैसे अजनारा होम्स और गौर सिटी के लोग भी इसे डंपिंग साइट बनाए जाने के विरोध में हैं. डंपिंग ग्राउंड संघर्ष समिति के मुखिया सुखवीर पहलवान आरोप लगाते हैं कि नोएडा अथॉरिटी ने NGT से झूठ बोला है कि उन्होंने सेक्टर-123 में डंपिंग ग्राउंड बनाया है, जबकि ये इलाक हिंडन नदी से एकदम सटा है. उहोने कहा कि यहां कूड़ा घर बनने से आसपास के 20 गांव, सेक्टर-122, 121 और 119 समेत कई सोसायटी और ग्रेनो वेस्ट के लिए नरक हो जाएगा. NOFAA से जुड़े अंकित श्रीवास्तव भी कहते हैं अगर यहां लैंडफिल बनाया गया तो करीब 6 किलोमीटर का इलाका प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होगा.



इसके आलावा आरोप है कि अथॉरिटी ने प्लांट बनाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी हासिल नहीं किया है. इसकि जानकारी NGT को भी नहीं दी गई है. उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नोएडा के क्षेत्रीय अधिकारी राकेश कुमार त्यागी ने भी इस बात को कंफर्म किया है कि विभाग की तरह से किसी तरह के वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के लिए एनओसी जारी नहीं की गई है. जानकारी के मुताबिक इस जगह पर रोजाना 650 टन कचरा फेंका जाना है और कचरे के लिए भूमिगत चैंबर बनाया जा रहा है. आमतौर पर रिहायशी इलाकों में प्रदूषण बोर्ड ऐसे किसी प्लांट को बनाने की इजाज़त नहीं देता है.

क्या कह रही है नोएडा अथॉरिटी
इस मामले में अथॉरिटी का रवैया कन्फ्यूजन वाला नज़र आता है. NGT के सामने उसने 123 को लैंडफिल साइट बताया है लेकिन विरोध कर रहे लोगों से कहा है कि यहां सिर्फ टेम्परेरी व्यवस्था के लिए कूड़ा डाला जा रहा है. इसे जल्द ही अस्तौली में प्रस्तावित डंपिंग ग्राउंड में शिफ्ट कर दिया जाएगा. विरोध बढ़ता देख 15 जून को अथॉरिटी ने एक पब्लिक नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण दिया कि सेक्टर-123 डंपिंग साइट नहीं है बल्कि सैनिटिरी लैंडफिल (SLF) है. नोएडा मास्टर प्लान-2031 का हवाला देते हुए कहा गया कि कूड़ा यहां सिर्फ कुछ वक़्त के लिए रहेगा फिर उसे वैज्ञानिक तरीकों से प्रोसेस कर दिया जाएगा. अजनार होम्स में रहने वाले एक व्यक्ति ने सितंबर 2016 में एक आरटीआई डालकर भी इस संबंध में जवाब मांगा था, तब भी यही कहा गया गया था कि सेक्टर-123 लैंडफिल नहीं है. मास्टर प्लान बनाते वक़्त भी इस संवेदनशील पर्यावरणीय कारणों से इसकी जगह अस्तौली को लैंडफिल साइट बनाया गया था.

उधर 6 जून को अथॉरिटी के अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को एक पीपीटी प्रेजेंटेशन देकर समझाने की कोशिश की थी. 19 जून को भी नोएडा में अख़बारों एक साथ एक पेंफलेट जारी किया गया है जिसमें सेक्टर-123 में बनने जा रहे वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़ी जानकारियां दीं गई हैं. इसके मुताबिक जिस तकनीक से इसे बनाया जा रहा है उससे प्रदूषण नहीं होगा और इलाके में हरियाली पहले से बढ़ जाएगी. इस इलाके के चारों तरफ हरित पट्टी बनाई जाएगी. इस लैंडफिल साइट को पांच स्तर में तैयार किया जाएगा. निर्माणाधीन भूमिगत चैंबर में कचरे को डाला जाएगा, जिसे सुखाकर पहले आरडीएफ (रिफ्यूज्ड ड्राइव फ्यूल) में तब्दील किया जाएगा. इसके बाद जो कचरा आरडीएफ में तब्दील नहीं हो पाएगा, उसे खाद में बदला जाएगा. बचे हुए कचरे का इस्तेमाल हरियाली के रूप में होगा. इसके लिए कचरे की एक परत बिछाकर 3 मीटर तक मिट्टी डाली जाएगी. हरियाली के रूप में तैयार होने वाली जगह को पिरामिड की शक्ल दी जाएगी. उसके बाद कचरे व मिट्टी की एक परत बिछाई जाएगी. बीच में जल निकासी के लिए पानी की लाइन बिछाई जाएगी.



कचरे और मिट्टी की कुल पांच परतें बिछाने पर इसे हरियाली के पहाड़ का रूप मिल जाएगा. इसके नीचे वेस्ट टु एनर्जी (कचरे से बिजली) संयंत्र भी लगाया जाएगा. ऊपर हरियाली और आधुनिक तकनीक पर आधारित संयंत्र की वजह से बदबू बाहर नहीं आएगी. इसके अलावा इलाके के चारों ओर हरित पट्टी तैयार कर नीम के पेड़ लगाए जाएंगे, जिससे हवा भी शुद्ध होगी. दावे के मुताबिक दिल्ली के करनाल बाईपास पर बने कचरा घर को हरियाली के रूप में तब्दील किया गया था और गाजीपुर में भी यह काम किया जा रहा है. कूड़े के नीचे बिछने वाली पाइपलाइन नाली के रूप में काम करेगी, जिससे पहाड़ पर पानी का रिसाव होने के बजाए पानी सीधे पाइप के जरिए भूतल में चला जाएगा.

दिल्ली सबसे ज्यादा कचरा पैदा कर रही है
मोदी सरकार में मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में एक सवाल के जवाब में साल 2016 में बताया था कि हर साल भारत सवा छह करोड़ टन ठोस कचरा पैदा करता है. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के मुताबिक इस कचरे में 7.9 मिलियन टन कचरा पर्यावरण के लिए 'खतरनाक' की श्रेणी में आता है. इसमें 5.6 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा और 1.5 मिलियन टन ईवेस्ट भी शामिल है. कचरा पैदा करने में दिल्ली सबसे ऊपर है और ये शहर करीब 3.3 मिलियन टन कचरा पैदा कर रहा है, इसके बाद मुंबई 2.7 मिलियन टन और चेन्नई 1.6 मिलियन टन के साथ तीसरे नंबर पर है. JNHRM के लिए काम कर चुके अनिल मेहता बताते हैं कि कचरा पैदा करने के मामले में गरीब और अमीर के बीच भी बड़ा फर्क है. उन्होंने एक सर्वे में पाया कि गरीम और मध्य वर्ग का हर व्यक्ति प्रतिदिन 250 ग्राम के आस-पास कचरा पैदा करता है जबकि अमीर परिवारों में प्रति व्यक्ति हर दिन 700 ग्राम तक कचरा पैदा होता है.



CPCB की रिपोर्ट के मुताबिक कचरा डंप करने के लिए देश भर के शहरों में 22 जगहों पर लैंडफिल हैं. दिल्ली में सबसे ज्यादा कचरा पैदा हो रहा है लेकिन यहां डंप करने के लिए सिर्फ चार लैंडफिल गाजीपुर, भलस्वा, बवाना-नरेला और ओखला मौजूद हैं. ये तीनों ही अपनी क्षमता से ज्यादा कचरे से भरी जा चुकीं हैं. ओखला वाली लैंडफिल सबसे कम 40 एकड़ में फैली है और कचरे के ढेर की ऊंचाई 49 मीटर के आस-पास पहुंच गई है. भलस्वा लैंडफिल 51 एकड़ में फैली है और यहां कचरे की ऊंचाई 40 मीटर के आस-पास है, गाजीपुर सबसे पुरानी और 71 एकड़ में फैली लैंडफिल है जहां कचरे की ऊंचाई 45 मीटर से भी ज्यादा है. इन तीनों ही जगह कचरे का ढेर क़ुतुब मीनार की आधी से ज्यादा ऊंचाई जितना पहुंच गया है और सुप्रीम कोर्ट इस पर कड़ी टिप्पणी भी कर चुका है.

2011 में नरेला-बवाना में दिल्ली की कचरे की समस्या से निपटने के लिए 100 एकड़ में लैंडफिल शुरू की गई है और सिर्फ 7 सालों में इसकी ऊंचाई 20 मीटर के आस-पास पहुंच गई है. बता दें कि नियम के मुताबिक लैंडफिल में कचरे के ढेर की ऊंचाई 20 मीटर ज्यादा नहीं होनी चाहिए लेकिन ओखला में ये 50 मीटर पार करने वाली है. लैंडफिल एरिया के मामले में चेन्नई सबसे ऊपर है यहां सिर्फ 2 लैंडफिल हैं लेकिन इनका एरिया 466 हेक्टेयर के आस-पास है. जयपुर भी कचरे की समस्या से जूझ रहा है यहां तीन लैंडफिल हैं जिनका एरिया करीब 32 हेक्टेयर के करीब है, ग्रेटर मुंबई में भी 3 लैंडफिल हैं जिनका एरिया 140 हेक्टेयर के आस-पास है.

कचरा है बड़ा चैलेंज
गौरतलब है कि देश के सभी बड़े शहरों के लिए कचरे का प्रबंधन फिलहाल एक बड़ी समस्या बनी हुई है. फिलहाल तो स्थिति ये है कि देश भर की नगर पालिकाएं और नगर निगम मिलकर सिर्फ चार करोड़ टन कूड़ा ही जमा कर पाती हैं. इसका नतीजा ये है कि 2 करोड़ टन से भी ज्यादा कूड़ा ऐसे ही बचा रह जाता है. इसका बड़ा हिस्सा बारिश के जरिए या फिर ऐसे ही नालियों में चला जाता है और फिर नालों के जरिए नदियों को प्रदूषित करता है. CPCB के मुताबिक देश भर में पैदा हो रहे कचरे के सिर्फ 20% हिस्से का ही वैज्ञानिक तरीकों से ट्रीटमेंट कर निस्तारण किया जाता है.

दिल्ली का ही उदाहरण ले तो साल 1975 में ही शहर में 20 सैनिटरी लैंडफिल साइट्स विकसित की गईं थीं. इनमें से 15 बंद हो चुकीं हैं और 2 में काम नहीं हो रहा है. गाजीपुर, भलस्वा और ओखला की हालत ये है कि ये अपनी क्षमता से दोगुना कचरा इकठ्ठा कर चुकी हैं. फिलहाल सरकारी स्तर पर देश भर में कचरे को इसी तरह लैंडफिल साइट्स पर गलने-सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसमें आए दिन आग लग जाती है जिससे मीथेन और कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी जहरीली गैस पैदा होती हैं. इसमें मौजूद प्लास्टिक कचरा ज़मीन और ग्राउंड वाटर को भी प्रदूषित करता है. दिल्ली में हर दिन 9,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है और इससे निपटने के लिए 70 हज़ार से ज्यादा सफाईकर्मी हैं. इसके बावजूद इस अकेले शहर में 1 लाख से ज्यादा कूड़ा बीनने वाले हैं जो अनुमान के मुताबिक रोजाना 50 किलो तक कूड़ा उठाते हैं और लैंडफिल साइट्स तक पहुंचाते हैं.



इस कचरे का पूरी तरह से ट्रीटमेंट करना काफी खर्चीला काम भी है. एक अनुमान के मुताबिक देश के 712 जिलों के करीब 8 हजार नगर-कस्बों में अगर दो-दो कस्बों की एक साथ भी कचरे के प्रबंधन की व्यवस्था कर दी जाए तब भी करीब 5000 ठोस कचरा ट्रीटमेंट प्लांट या लैंडफिल्स की ज़रूरत पड़ेगी. CPCB के मुताबिक ये बेंगलुरु शहर जितनी बड़ी ज़मीन चाहिए. ट्रीटमेंट प्लांट, लैंडफिल और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की लागत को अगर 50 करोड़ के आस-पास भी माना जाए तो इस पर ही दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्चा आएगा. ये अनुमान भी ज़मीन की कीमतों के बिना लगाया गया है 712 जिलों में अगर लैंडफिल के लिए ज़मीन अधिग्रहण करना पड़ा तो 15 से 20 हेक्टेयर की पांच हजार जमीनों का मुआवजा देना बड़ी समस्या होगी. इसका सीधा सा मतलब है कि फिलहाल कचरा निस्तारण के लिए जिस तरीके को इस्तेमाल किया जा रहा है उससे आने वाले दिनों में भी सारे कचरे के प्रबंधन की व्यवस्था नामुमकिन ही है. हालांकि कचरे से बिजली बनाने और मीथेन से LPG बनाने के संयंत्र लगाने की बात की जा रही है, इसके आलावा लैंडफिल को हरियाली से ढक देने की योजनाएं भी हैं लेकिन ऐसा सिर्फ एक-दो जगह ही संभव हो पाया है.

2030 तक चाहिए बेंगलुरु जितना बड़ा शहर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में पैदा हो रहे कचरे में से 62 मिलियन टन कचरे में से सिर्फ 43 मिलियन टन ठोस कचरा ही इकठ्ठा किया जाता है. इसमें से भी सिर्फ 28% यानी 11.9 मिलियन टन ही ट्रीटमेंट प्लांट में प्रोसेस हो पाता है जबकि 72% यानी 31 मिलियन टन कचरा लैंडफिल साइट्स में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. हर साल इस कचरे के लिए करीब 1,240 हेक्टेयर नई ज़मीन की ज़रुरत है. साल 2030 तक भारत हर साल 165 मिलियन टन कचरा पैदा करने लगेगा, इसके लिए हर साल 66,000 हेक्टेयर एरिया वाली लैंडफिल की ज़रुरत पड़ेगी जो कि बेंगलुरु शहर जितना एरिया है. CPCB के मुताबिक साल 2014 तक देश में 13 वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स, 56 बायो-मीथेनेशन प्लांट, 22 फ्यूल प्लांट और 553 कंपोस्ट-वर्मीकंपोस्ट प्लांट्स कम कर रहे थे.



बीमारियों की जड़ बनते लैंडफिल
मुंबई की देवनार और दिल्ली की भलस्वा लैंडफिल में आए दिन आग लगने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. लैंडफिल में आग लगने की घटनाएं आम हैं और कई बार स्थानीय लोग या कचरा बीनने वाले भी आग लगाने का काम करते हैं. कचरा जलाने से हवा में PM10 की मात्रा अचानक बढ़ती है जिससे सांस से जुड़ी दिक्कतें और बीमारियां सामने आती हैं. इसके आलावा कचरे के आस-पास रहने से बैक्टीरियल इन्फेक्शन, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां और कई तरह के एलर्जिक इन्फेक्शन पैदा होते हैं. डेंगू और कोलेरा जैसी बीमारियां भी इन इलाकों में बाकी के मुकाबले ज्यादा देखी जाती हैं. कचरे से निकलने वाली मीथेन गैस ओजोन लेयर के लिए नुकसानदेह है साथ ही ऑर्गेनिक कचरा ज़मीन और ग्राउंड वाटर को प्रदूषित करता है.

प्लानिंग कमीशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कचरे से बिजली बनाने पर जोर दिया जा रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा 32,890 टन कचरा रोजाना बिना इस्तेमाल के रह जाता है जिससे 439 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती थी. इस कचरे से प्रतिदिन बायो फ्यूल, 1.3 मिलियन क्यूबिक मीटर बायोगैस और 5.4 मीट्रिक टन कृषि योग्य कंपोस्ट खाद बनाई जा सकती है. सबसे बड़ी परेशानी कचरा इकठ्ठा करने और उसे सही तरीके से प्रोसेस करने के लिए मौजूद स्ट्रक्चर न होने की वजह से है. फिलहाल ऑर्गेनिक, टॉक्सिक और रीसाइकिल हो सकने वाले कचरे को साथ ही फेंक दिया जाता है. कचरा इकठ्ठा करने के स्तर पर ही अगर इन्हें अलग कर लिया जाए और सही ट्रीटमेंट प्लांट तक वक़्त से पहुंचाया जा सके तो काफी हद तक इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है.

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