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महात्‍मा गांधी: प्रज्ञा अकेली नहीं हैं, हमारी ‘प्रज्ञा’ को लकवा मार गया है

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 29, 2019, 2:43 PM IST
महात्‍मा गांधी: प्रज्ञा अकेली नहीं हैं, हमारी ‘प्रज्ञा’ को लकवा मार गया है
फ़ाइल फोटो

गांधी जी (Mahatma Gandhi) को अच्‍छी तरह पता था कि एक तो भारत के पास उतनी बंदूकें नहीं हैं, जितनी ब्रिटिश साम्राज्‍य के पास हैं. दूसरी बात यह कि बंदूकों से चंद अंग्रेजों को मार देने से ब्रिटिश साम्राज्‍य की मशीन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उन्‍हें पता था कि ब्रिटिश साम्राज्‍य की खुराक भारत माता का भयानक शोषण है.

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  • Last Updated: November 29, 2019, 2:43 PM IST
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राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी को लेक‍र जो निहायत छिछले और ओछे बयान भोपाल से भारतीय जनता पार्टी सांसद प्रज्ञा ठाकुर देती रहती हैं, वह सिर्फ उनका निजी अपराध नहीं हैं. वे हमारे समाज में मौजूद उस मुखर वर्ग की नुमाइंदगी करती हैं, जो महात्‍मा गांधी पर लगाए गए झूठे लांछनों से बनी मसालेदार कहानियों का शिकार है. जब हम प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर इस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, जैसे उन्‍होंने कोई अनोखी बात कर दी हो या कोई ऐसी बात कर दी हो, जिसकी हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते तो असल में हम सामूहिक रूप से शरीफ होने का नाटक कर रहे होते हैं. वर्ना हममें से बहुत से लोग जिन्‍हें गांव-कस्‍बे की जिंदगी का तजुर्बा है, महात्‍मा गांधी को लेकर फैलाए गए झूठे किस्‍सों से वाकिफ हैं.

व्‍हाट्सअप और सोशल मीडिया के आने के बाद इन किस्‍सों को पहली बार लिपि का सहारा मिला और ये लिखे शब्‍द के तौर पर बड़े पैमाने पर एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल में या कहें एक दिमाग से दूसरे दिमाग में जाने लगे हैं. और यह संख्‍या घट नहीं रही है. इसलिए प्रज्ञा ठाकुर के माफी मांगने या न मांगने से यह प्रक्रिया रुक नहीं जाएगी. गुरुवार को हम देख ही चुके हैं कि जब आधिकारिक मंच पर सब नेता और पूरा मीडिया प्रज्ञा की आलोचना कर रहा था, तब भी ट्विटर पर ‘वेलडन प्रज्ञा’ ट्रेंड कर रहा था. इस ट्रेंड की एक खासियत थी कि इसे ट्रेंड कराने में प्रज्ञा समर्थकों से बड़ा हाथ प्रज्ञा के निंदकों का हो गया. वे प्रज्ञा की निंदा कर रहे थे लेकिन साथ ही वेलडन प्रज्ञा टैग कर रहे थे. इस तरह वे अनजाने ही बुराई के उस जाल में न सिर्फ फंसे हुए थे, बल्कि उसे मजबूत कर रहे थे.

ऐसे ही मामलों की जटिलता को समझाने के लिए रामायण में बालि का पात्र रखा गया है. बालि ऐसा व्‍यक्ति था जो खुद से लड़ने आने वाले व्‍यक्ति की आधी ताकत खींच लेता था. इसलिए राम को छुपकर उसका वध करना पड़ा था. इसलिए जो लोग गांधी के हत्‍यारे के विरोधी हैं, उन्‍हें उसके जिक्र से परहेज ही करना चाहिए.



असल बात यह है कि अगर गांधी का हत्‍यारा हमारे समाज का कोढ़ है और आजाद भारत का पहला आतंकवादी है, तो उसकी विचारधारा से कैसे एक वर्ग को सहानुभूति हो जाती है. तो इसका सारा बीज हिंदू राष्‍ट्र की कपोल कल्‍पना में निहित है.


बापू के बारे में कच्‍चे दिमागों में जो ठोस भ्रम पैदा किया गया है उसमें दो तीन चीजें शामिल हैं. पहली यह कि महात्‍मा गांधी भारत के बंटवारे के लिए जिम्‍मेदार हैं. बंटवारे के बाद वे ज्‍यादा मुस्लिम परस्‍त हो गए थे. उन्‍होंने जिद करके पाकिस्‍तान को 55 करोड़ रुपया दिला दिया, जिसे देने के लिए पंडित नेहरू की कैबिनेट तैयार नहीं थी. अगर वह और जीवित रहते तो उनकी यह प्रवृत्ति बढ़ती जाती और देश का यानी कि हिंदुओं का और ज्‍यादा नुकसान होता.

मुस्कुराते गांधी की तस्वीर युवाओं को कमजोर लगती है
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मुख्‍यरूप से महात्‍मा गांधी के खिलाफ सारा प्रोपगेंडा यहीं से शुरू होता है. इसको और मजबूत करने के लिए उनके अहिंसा के सिद्धांत का कुपाठ किया जाता है और उन्‍हें दीन हीन करुण आदमी की तरह पेश किया जाता है. इसे और दीन बनाने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन को संदर्भ से काटकर उनके सामने खड़ा कर दिया जाता है. जाहिर है हाथ में तमंचा लिये अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे नायक के सामने अंग्रेजों के सामने मुस्‍कुराते हुए खड़े अधनंगे फकीर की तस्‍वीर युवाओं को कमजोर लगती है. जब इन दो चीजों से काम नहीं बनता तो उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बारे में बहुत ही तोड़ मरोड़कर नीचतापूर्ण किस्‍से गढ़ दिये जाते हैं. गांधी विरोध की गाड़ी का असली प्‍लेटफॉर्म ऊपर गिनाई गई बातें ही हैं.

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आजादी के असल मायने समझना है जरूरी
इन सब बातों का वैसे तो एक-एक कर जवाब दिया जा सकता है. लेकिन उससे बात खत्‍म नहीं होगी. इसलिए हमें बुनियादी बात यह जाननी चाहिए कि आजादी को लेकर हमारा कंसेप्‍ट क्‍या है. महात्‍मा गांधी और दूसरे महान विचारकों का कंसेप्‍ट क्‍या है. जब हम आजादी के असल मायने समझें तभी समझ पाएंगे कि गांधी की आजादी में हिंदू मुसलमान के झगड़े की गुंजाइश नहीं है. उस आजादी का मतलब सिर्फ यह भी नहीं है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ दिया जाए, भारत के नागरिकों को सत्‍ता की चाबी दी जाए. यह उनके व्‍यापक उद्देश्‍य का एक छोटा सा हिस्‍सा भर था. जबकि क्रांतिकारी आंदोलन और दूसरे उग्र आंदोलनों का मुख्‍य मुद्दा यही था.

गांधी जी के लिए ऐसी आजादी का भी कोई मतलब नहीं था, जिसमें जात पांत के आधार पर छुआ छूत बनी रहे. असल में महात्‍मा गांधी के लिए गुलामी का मतलब था आदमी का कायर, कमजोर और पददलित होना. उनका साफ मानना था कि भारत की आजादी का रोड़ा सिर्फ अंग्रेज नहीं हैं, भारतीयों में पनप रही गुलाम मानसिकता है. अंग्रेजों को कंपनी बहादुर के तमगे तो हम भारतीयों ने ही दिए. उसकी नौकरियां पाने को तो हमारा ही मध्‍यम वर्ग लालायित है. अंग्रेजों के राज की ताकत भारत में कुछ लाख अंग्रेजों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उन कुछ लाख अंग्रेजों को करोड़ों भारतीयों से मिलने वाला समर्थन था. वह इसी सब को खत्‍म करने के लिए खड़े हुए.


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बंदूकों से चंद अंग्रेजों को मार देने से ब्रिटिश साम्राज्य को फर्क नहीं पड़ता
गांधी जिस समय भारत की भूमि पर मसीहा की तरह आए उसके पहले आम भारतीय खासकर किसान और गांवों पर जो जुल्‍म हो रहा था, उसका वर्णन करना संभव नहीं है. अंग्रेजों की चाटुकारिता में भारतीयों के साथ दूसरे भारतीय ही जिस तरह का बर्बरतापूर्ण व्‍यवहार करते थे, उस इतिहास को किसी भी अच्‍छी किताब से उठाकर पढ़ा जा सकता है.

गांधी जी को अच्‍छी तरह पता था कि एक तो भारत के पास उतनी बंदूकें नहीं हैं, जितनी ब्रिटिश साम्राज्‍य के पास हैं. दूसरी बात यह कि बंदूकों से चंद अंग्रेजों को मार देने से ब्रिटिश साम्राज्‍य की मशीन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उन्‍हें पता था कि ब्रिटिश साम्राज्‍य की खुराक भारत माता का भयानक शोषण है. भारत के लोग रात दिन गुलामों की तरह मेहनत करके जो पूंजी पैदा करते हैं, उसे अपनी कर प्रणाली और बाजार व्‍यवस्‍था के जरिये अंग्रेज यहां से छीन ले जाते हैं. अगर करोड़ों लोगों की यह सामूहिक लूट खत्‍म कर दी जाए तो ब्रिटिश साम्राज्‍य के पांव उखड़ जाएंगे.

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30 साल तक एक ही प्रक्रिया में काम करते रहे गांधी
इस बड़ी बगावत की पहली सीढ़ी यह थी कि जनता का एक वर्ग नहीं, बल्कि पूरी जनता में यह भावना भरी जाय कि वे अंग्रेजों को अपना राजा नहीं मानते. वे उनके कानूनों को नहीं मानते. वे उनको टैक्‍स नहीं चुकाते. अब अंग्रेज इसके लिए उन्‍हें मारना चाहें तो मार लें, जेल में डालना चाहें तो डाल दें, लेकिन ये निहत्‍थे लोग अंग्रेजों की न तो बात मानेंगे और न ही उन अंग्रेजों पर हाथ उठाएंगे. इस प्रक्रिया में अंग्रेज जितना जुल्‍म गांधी के कांग्रेसियों पर करते थे, उतनी ही ज्‍यादा सहानुभूति इन आंदोलनकारियों को भारतीय वर्ग की मिलती थी.

30 साल तक गांधी के नेतृत्‍व में यही प्रक्रिया भारत में चलती रही. इस प्रक्रिया में पहले अमीर वकीलों ने अपनी वकालत छोड़कर खादी पहनी. इन वकीलों में मोतीलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल सहित अनगिनत नाम है. नेहरू का नाम अलग से इसलिए नहीं लिखा, क्‍योंकि वह तो वकालत जमाने से पहले ही आजादी के आंदोलन के हो गए थे.


इसी प्रक्रिया में घनश्‍याम दास बिरला और जमनालाल बजाज जैसे पूंजीपति थे, जो सरकार की नाक के नीचे आजादी के आंदोलन के लिए अपने खजाने खोले रहे. इन आधुनिक भामाशाहों को गांधी की नीतियों ने ही पैदा किया. इसी सिलसिले में शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे सेनानी भी थे, जो अपने जोश में अहिंसा की हदें पार करके हिंसा के रास्‍ते पर तो गए, लेकिन वहां भी जयकारा महात्‍मा गांधी का ही लगाते रहे.

चंद्रशेखर आजाद को जब इलाहाबाद की नैनी जेल में बेंतों से पीटा जा रहा था तो वह हर बेंत की चोट के साथ महात्‍मा गांधी की जय का नारा बोलते थे. और यह नारा आजाद के कंठ से तब तक निकलता रहा जब तक कि वे बेहोश नहीं हो गए. यह नारा वकीलों और नौजवानों से होता हुआ सरकारी कर्मचारी और अफसरों तक पहुंचा. और दुनिया गवाह है कि गांधी की यह क्रांति ब्रिटिश फौज तक पहुंची. फौज ने कई जगहों पर सरकार का हुक्‍म मानने से इनकार कर दिया.

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अमेरिकी पत्रकार और महात्‍मा गांधी की जीवनी लेखक लुई फिशर ने गांधी की जीवनी में लिखा है कि महात्‍मा गांधी के आंदोलनों का यह असर था कि भारत छोड़ो आंदोलन के बाद शीर्ष ब्रिटिश अफसर यह कहने लगे थे कि वे अब भारत छोड़कर जाने वाले हैं. यह अलग बात है कि तब कांग्रेस के नेताओं तक को लगता था कि यह अंग्रेजों की कोई नई चाल है.


आगे बढ़ने से पहले एक बार फिर ठहरिये और सोचिए कि अपने 30 साल के युद्ध में गांधी ने उस कौम को जगाया जो निहायत गरीब हो चुकी थी, जिसमें हर साल लाखों लोग महामारियों से मरते थे, लाखों लोग अकाल से मरते थे और कई ह‍जार लोग दंगों में मर जाते थे. इतना ही क्‍या कम था, जो यह कौम हजार और खांचों में बंटी थी. पहले वह हिंदू मुसलमान और सिख में बंटी थी. फिर वे हिंदू सवर्ण और अछूत के भेद में पड़े थे. परतदार बैठी जाति व्‍यवस्‍था में सब एक दूसरे से अलग थे. इसके बाद उत्‍तर और दक्षिण का भेद था. जातीय और धार्मिक अस्मिताओं के साथ ही एक फौज भाषाई अस्मिताओं की थी.

इनके अलावा अंग्रेजी राज में भी 500 से अधिक राजा देश में मौजूद थे, जिनका राजकाज अंग्रेजों से भी गया गुजरा और निरंकुश था. बहुत बुरा हाल था. इतना बुरा कि उसका वर्णन करने के लिए फिर पौराणिक उपमा देनी होगी.

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महात्‍मा गांधी ने अपने पूरे जीवन वराह की तरह काम किया
यह हाल कुछ कुछ वराह अवतार से पहले की धरती जैसा था. तब धरती को हिरण्‍याक्ष नाम का राक्षस हर ले गया था, और उसने इसे पाताल में छुपा दिया था. कोई देवता या भगवान का अवतार धरती की रक्षा करने न आ सके इसलिए उसने इसे मल से ढक दिया था. तब भगवान विष्‍णु का महावराह अवतार हुआ. उन्‍होंने गंदगी से ढकी धरती को पाताल से निकाला और धो पोंछकर अपने सींग पर रखकर बाहर ले आए.

आज विज्ञान की किसी कसौटी पर इस अवतार कथा को कसना नामुमकिन है. क्‍योंकि न तो कोई पाताल होता है और न धरती ही अपनी कक्षा छोड़ती है. लेकिन नैतिक मानदंडों पर यह कथा आज भी उतनी ही गहरी है. पाताल और कुछ नहीं मनुष्‍य का अध:पतन है. मल से ढकी पृथ्‍वी और कुछ नहीं मनुष्‍य का स्‍वार्थ और ओछेपन में डूब जाना है. वराह अवतार का अर्थ ऐसे पुरुष का आगमन है जो इस सारे तम को हर ले और रोशनी दिखाए. महात्‍मा गांधी ने अपने पूरे जीवन उसी वराह की तरह तो काम किया जो धरती का उद्धार करने को आता है.


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जो गांधी को पढ़ते हैं वह उनके मोह में पड़ जाते हैं
आज इस कहानी से ऐसा लग सकता है कि बापू की महिमा का बढ़ा चढ़ाकर बखान किया जा रहा है. लेकिन उन्‍हीं बापू को संविधान सभा की बहसों में पंडित मदन मोहन मालवीय के पुत्र गोविंद मालवीय ने कल्कि अवतार कहा था. यह वह अवतार है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कलयुग में विष्‍णु इस अवतार में आएंगे. गोविंद मालवीय ने कहा था कि गांधी जी के रूप में वह काम हो चुका है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में बनारस से चुनाव लड़ा तो इन्‍हीं गोविंद मालवीय के पुत्र जस्टिस गिरधर मालवीय उनके प्रस्‍तावक बने. जो गांधी को पढ़ते समझते हैं, वे उस महान व्‍यक्तिव के मोह में पड़ जाते हैं. उनसे नफरत वही कर पाते हैं, जो उनसे दूर हैं. बर्नाट शॉ तो उनकी अच्‍छाई के बारे में पहले ही आगाह कर गए थे. उन्‍होंने गांधी जी के बारे में कहा था, 'इतना अच्‍छा होना, अच्‍छा नहीं है.' लेकिन असल मर्म तो अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन समझा गए थे. '' आन वाली पीढि़यां यकीन नहीं करेंगी कि गांधी जैसा हाड़ मांस का बना आदमी भी कभी इस धरती पर विचरता था.'' जिनकी प्रज्ञा को लकवा मार गया है, उन्‍हें वाकई गांधीयत पर यकीन नहीं हो सकता. उन्‍हें नफरत की नहीं गांधीपने के स्‍पर्ष की जरूरत है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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First published: November 29, 2019, 1:45 PM IST
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