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OPINION: पेगासस या किसान नहीं, केंद्र सरकार को घेरने के लिए 'ईंधन और LPG की कीमतों का इस्तेमाल' करे विपक्ष

2019 में भी कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला करने के लिए राफेल खरीदी का मुद्दा उठाकर ऐसे ही गलत घोड़े पर दांव लगाया था. (फाइल फोटो: PTI)

2019 में भी कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला करने के लिए राफेल खरीदी का मुद्दा उठाकर ऐसे ही गलत घोड़े पर दांव लगाया था. (फाइल फोटो: PTI)

Opposition Protest on Pegasus: 6 महीने बाद यूपी विधानसभा चुनाव में जब एक ग्रामीण मतदाता वोट डालेगा, तो क्या वो पेगासस को लेकर परेशान होगा? आम आदमी के लिए दाल-रोटी का मुद्दा ज्यादा मायने रखता है.

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नई दिल्ली. पेगासस मुद्दे ने भले ही मानसून सत्र (Monsoon Session) में जमकर उथल-पुथल मचाई हो और कांग्रेस (Congress) के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इसे नाराजगी का शीर्ष बिंदु भी बना दिया हो, लेकिन इस मुद्दे के दिल्ली के बाहर देश की जनता तक पहुंचने की उम्मीद नहीं है. कई विपक्षी दलों में भी इस बात को लेकर नाराजगी है और कांग्रेस के भी कुछ नेताओं को यह लगता है कि पेगासस मुद्दे की राजनीतिक उपयोगिता काफी सीमित है, क्योंकि देश के ज्यादातर लोगों को अभी यह भी नहीं पता कि यह मुद्दा क्या है और यह उन पर असर डालेगा या नहीं.

उदाहरण के लिए 2024 के आम चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में 6 महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में जब एक ग्रामीण मतदाता वोट डालेगा, तो क्या वो पेगासस को लेकर परेशान होगा? यह बताता है कि यूपी में क्यों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पेगासस मुद्दे पर बयान से आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं. कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि राजनीतिक मुद्दे के तौर पर पेगासस का असर पता करने के लिए सर्वे कराया जाना चाहिए.

दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन एक और बड़ा मुद्दा था, जो संसद सत्र पर हावी रहा, लेकिन ज्यूरी इस बात को तय नहीं कर पाई कि क्या इस मुद्दे की गूंज पंजाब, हरियाणा और शायद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे जाएगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम दामों पर गन्ना खरीदी वास्तव में दिल्ली-यूपी सीमा पर राकेश टिकैत के नेतृत्व वाले किसान आंदोलन से ज्यादा बड़ा चुनावी मुद्दा है.

किसान मुद्दा पंजाब चुनाव में हावी रहेगा, लेकिन बीजेपी शायद ही वहां चुनावी दौड़ में हो. इसके अलावा पंजाब में विपक्षी एकता के भी उभरने की संभावना नहीं है, क्योंकि कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी एक दूसरे को रौंदने में लगे हुए हैं, जो मुद्दे आम आदमी को ज्यादा प्रभावित कर सकते हैं और चर्चा का विषय बन सकते हैं, वे ईंधन और एलपीजी की बढ़ी कीमतें हैं. इन मुद्दों ने लगभग हर घर के बजट को प्रभावित किया है.

राहुल गांधी ने किसानों के समर्थन में संसद तक ट्रैक्टर चलाने के बाद एलपीजी और ईंधन की ऊंची कीमतों के मुद्दे पर साइकिल रैली निकाली थी. कांग्रेस भी इसे कई प्लेटफॉर्म पर उठाती रही है. पेगासस या किसान मुद्दे से ज्यादा यह मुद्दा एक मतदाता के दिमाग में घर कर सकता है और विपक्ष बीजेपी का सामना करने के लिए इसे और अहम बनाकर बेहतर काम कर सकता है.

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल अभियान में ईंधन और एलपीजी की ऊंची कीमतों का अच्छा प्रभाव होने की बात कही थी. बीजेपी ने यह कहते हुए इस तर्क का सामना करने की कोशिश की थी कि तेल कंपनियां कीमतें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है. लेकिन इससे लोगों को शायद ही कोई फर्क पड़ा हो, जिन्होंने देखा है कि चुनाव के दौरान ईंधन की कीमतें स्थिर रहती है. साथ ही अब लोग ईंधन के लिए ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं. जैसे- एक लीटर के लिए 100 रुपये से ज्यादा और एलपीजी सिलेंडर के लिए 850 रुपये या इससे ज्यादा.

बीजेपी ने ऊंचे केंद्रीय उत्पाद शुल्क का बचाव करते हुए कहा है कि इसका इस्तेमाल कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त कोविड-19 ड्राइव में किया जा रहा है और ईंधन पर वैट कम करने की जिम्मेदारी राज्यों की है. लेकिन, कोविड महामारी और इस धारणा के बीच कि ईंधन और एलपीजी कीमतों के लिए केंद्र जिम्मेदार है, यह मुद्दा आम आदमी के लिए काफी बड़ा है.

2019 में भी कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला करने के लिए राफेल का मुद्दा उठाकर ऐसे ही गलत घोड़े पर दांव लगाया था. आम आदमी के लिए दाल-रोटी का मुद्दा ज्यादा मायने रखता है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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