Opinion: असम में NRC, एक सूची या दीवार से सुलझने वाला नहीं वैश्विक प्रवासी संकट

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Updated: September 4, 2019, 2:39 PM IST
Opinion: असम में NRC, एक सूची या दीवार से सुलझने वाला नहीं वैश्विक प्रवासी संकट
असम में रह रहे लोगों के सामने इस समय खुद को भारत का वैध नागरिक साबित करने की बड़ी चुनौती है. हर दिन तनाव और निराशा की कहानियां सामने आ रही हैं.

असम (Assam) में अवैध प्रवासियों (Illegal Immigration) को छांटने और वास्‍तविक भारतीय नागरिकों की पहचान करने के लिए शुरू की गई एनआरसी (National Register of Citizens) की पहल के नतीजे कई साल तक दिखाई देंगे. इसकी जरूरत और प्रभाव को लेकर लोगों की राय अलग है. लेकिन, यह साफ है कि पूरी दुनिया में प्रवासियों की बढ़ती संख्‍या का जटिल मसला किसी एक सूची या दीवार से सुलझने वाला नहीं है्. 

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पथकृत सेन गुप्‍ता

असम (Assam) में रह रहे लोगों के सामने इस समय खुद को भारत का वैध नागरिक  साबित करने की बड़ी चुनौती है. हर दिन तनाव और निराशा की कहानियां सामने आ रही हैं. किसी देश में अवैध प्रवासी (Illegal Immigration) घोषित किए जाने की यह समस्‍या सबसे ज्‍यादा दो देशों की सीमाओं पर रहने वाले लोगों के सामने पेश आती है. उस पर भी अगर दोनों देशों के बीच सीमाएं अनिश्चित हों और बार-बार बदली गई हों तो समस्‍या ज्‍यादा बड़ी हो जाती है. साथ ही अवैध प्रवासियों की यह समस्‍या संबंधित देशों की संप्रभुता से भी जुड़ा मसला है.

असम में तनाव और निराशा की कहानियां हर दिन बढ़ेंगी
असम में 31 अगस्‍त को जारी एनआरसी (National Register of Citizens) की अंतिम सूची के बाद 19 लाख से ज्‍यादा लोगों को अपने पैरों के नीचे की जमीन खिसकती हुई महसूस हो रही है. बता दें कि सरकार ने एनआरसी की कवायद पड़ोसी देश बांग्‍लादेश से आकर असम में बस गए अवैध प्रवासियों और वास्तविक भारतीयों की पहचान करने के लिए शुरू की थी. असम में तनाव और निराशा की कहानियां हर दिन बढ़ती जाएंगी क्‍योंकि निकट भविष्‍य में इस समस्‍या का कोई ठोस समाधान निकलने की उम्‍मीद नहीं है. हालांकि, एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर किए गए लोगों के पास अपील करने का अधिकार है.

एनआरसी की अंतिम सूची से बीजेपी भी खुश नहीं
एनआरसी की पूरी कवायद शुरू करने वाली सत्‍तारूढ़ पार्टी बीजेपी समेत अंतिम सूची से कोई खुश नजर नहीं आ रहा है. दरअसल, बीजेपी को जितने घुसपैठियों की उम्‍मीद थी, उससे काफी कम संख्‍या में अवैध प्रवासी सामने आए हैं. उनमें भी बड़ी संख्‍या में हिंदू हैं. ऐसे लोगों को बांग्‍लादेश प्रत्‍यर्पित करना विकल्‍प नहीं है. वहीं, हजारों लोगों को अवैध नगारिक घोषित कर वर्षों तक डिटेंशन सेंटर्स में रखना प्रशासन की नींद उड़ाने के लिए काफी होगा. यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि एनआरसी की वकालत करने वाले लोग इसे पूरे देश में लागू कराना चाहते हैं.

बीजेपी को जितने घुसपैठियों की उम्‍मीद थी, उससे काफी कम संख्‍या में अवैध प्रवासी सामने आए हैं. उनमें भी बड़ी संख्‍या में हिंदू हैं.

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पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा प्रवासी संकट
कुछ लोगों का कहना है कि एनआरसी की सबसे ज्‍यादा जरूरत कश्‍मीर में है. सोशल मीडिया पर कुछ लोग पश्चिम बंगाल और केरल में भी इसकी जरूरत पर जोर दे रहे हैं. असम में एनआरसी की पहेली ऐसे समय सामने आई है, जब पूरी दुनिया में प्रवासी संकट लगातार बढ़ता हुआ महसूस किया जा रहा है. अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाकर घुसपैठ रोकने का प्रस्‍ताव रखा, जिसकी काफी आलोचना हुई. यहां तक की अवैध प्रवासियों को रखने वाले नजरबंदी शिविरों से भयावह कहानियां सामने आने लगीं.

यूरोप में शरण मांगने वालों की संख्‍या में उछाल
हालिया वर्षों में यूरोप में शरण मांगने वालों की संख्‍या में जबरदस्‍त उछाल आया है. इसका पूरे भूमध्‍यसागरीय क्षेत्र में प्रतिकूल प्रभाव महसूस किया गया. यूरोपीय संघ ने मार्च, 2019 में इसे प्रवासी संकट घोषित कर दिया. सीरिया में गृहयुद्ध का संकट बढ़ने के कारण यूरोप में शरण मांगने वालों की संख्‍या 2015 में चरम पर पहुंच गई. इस दौरान लाखों लोगों ने सीरिया से भागकर दूसरे देशों में शरण मांगी. फिलहाल यूरोप में प्रवासी संकट चुनावी मुद्दा बना हुआ है.

यूरोप की राजनीति के केंद्र में रहेगा प्रवासी संकट
अमेरिकी नजरिये से लिखे गए एक लेख के मुताबिक, प्रवासी संकट यूरोप की राजनीति के केंद्र में रहेगा. इस समय करीब 9,00,000 शरण मांगने वालों के मामले यूरोप में लंबित हैं. 'द गार्जियन' ने यूरोपीय सांख्यिकी कार्यालय से ऐसे लोगों के वास्‍तविक आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की थी. पिछले तीन साल के दौरान यूरोप में शरण मांगने वालों के आवेदन खारिज करने की संख्‍या करीब दोगुनी हो गई है. यूरोप ने 2016 में शरण मांगने के लिए किए गए 37 फीसदी आवेदन खारिज किए थे, जबकि 2019 में यह संख्‍या 64 फीसदी पहुंच गई. इटली ने 2019 में 80 फीसदी लोगों के ऐसे आवेदन खारिज किए, जबकि 2018 में 60 फीसदी आवेदन खारिज किए गए थे.

स्‍थानीय कामगारों के मुताबिक प्रवासी उनके मौके घटा रहे हैं
पर्यवेक्षकों के मुताबिक, समस्‍या आर्थिक प्रवासी और राजनीतिक शरणार्थियों के बीच उलझन की है. यह ऐसा मसला है जिसमें कोई देश उलझना नहीं चाहता. अमेरिका में मुक्‍त बाजार ने प्रवासियों का उत्‍साह के साथ स्‍वागत किया, जबकि ट्रेड यूनियन इसके खिलाफ थीं. कुछ लोग इस बात से असहमत हैं कि इससे वास्‍तव में कोई फायदा होगा. सिलिकॉन वैली में बड़ी संख्‍या में विदेशी हैं. इससे साफ है कि प्रवासी इनोवेशन में काफी योगदान देते हैं. वहीं, स्‍थानीय कामगारों का कहना है कि प्रवासी उनके लिए नौकरियों के मौके कम कर रहे हैं.

अमेरिका के लोग भी प्रवासियों को लेकर हैं खासे चिंतित
एक पोल के नतीजों के मुताबिक, अमेरिका के लोग प्रवासियों को लेकर खासे चिंतित हैं. पोल में शामिल हुए 23 फीसदी लोगों का कहना था कि प्रवासी संकट देश के सामने सबसे बड़ी समस्‍या है. वहीं, 37 फीसदी लोगों का कहना था कि इसे मौजूदा स्‍तर पर ही रोक देना चाहिए. वहीं, 35 फीसदी लोगों ने कहा कि अमेरिका से प्रवासियों की संख्‍या कम की जानी चाहिए. हालांकि, 27 फीसदी ऐसे लोग भी थे, जिनका कहना था कि प्रवासियों की संख्‍या बढ़नी चाहिए.

भारत की आबादी लगातार बढ़ रही है, जबकि संसाधन लगातार घट रहे हैं. ऐसे में अवैध प्रवासी देश पर बोझ की तरह हैं.


विदेश में बसे भारतीय बड़ी संख्‍या में वापस लौट रहे हैं
भारत में इस समय बांग्‍लादेशी प्रवासियों को लेकर ज्‍यादा चिंता है. लोगों का मानना है कि देश की आबादी लगातार बढ़ रही है, जबकि संसाधन लगातार घट रहे हैं. ऐसे में अवैध प्रवासी देश पर बोझ की तरह हैं. हालांकि, यह भी सच है कि यह बहुआयामी मसला है, जिसमें कुछ तथ्‍यों पर विचार करना जरूरी है. उदाहरण के लिए अमेरिका, ऑस्‍ट्रेलिया और खाड़ी देशों में बसे भारतीय बड़ी संख्‍या में लौट रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बांग्‍लादेशियों की संख्‍या अब घट रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक समय अवैध प्रवासियों को दीमक कहा था. एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने के बाद समीक्षक इससेे बाहर हुए हिंदू प्रवासियों को नागरिकता देने की बीजेपी की योजना पर चिंता जता रहे हैं.

राष्‍ट्रीय शरणार्थी कानून लागू करना हो सकता है समाधान
ऐसे में समस्‍या का हमेशा के लिए प्रभावी समाधान क्‍या हो सकता है? एक राष्‍ट्रीय शरणार्थी कानून लागू किया जा सकता है ताकि शरणार्थियों को स्‍पष्‍ट तौर पर चिह्नित किया जा सके. कानून बनाकर शरणार्थियों को अवैध प्रवासियों से अलग रखा जा सकता है. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी ने एक लेख में सुझाव दिया था कि भारत बांग्‍लादेश के साथ द्विपक्षीय समझौता कर अवैध बांग्‍लादेशी प्रवासियों को वापस भेजा सकता है. वहीं, शरणार्थियों को आर्थिक मदद देने की रूपरेखा बनाना भी जरूरी है.

प्रवासियों की संख्‍या घटाने का फैसला ध्‍यान से करना चाहिए
बांग्‍लादेशी प्रवासियों को सत्‍यापन अवधि के दौरान शरणार्थी का दर्जा देकर वर्क परमिट दिया जा सकता है. उन्‍हें सत्‍यापन अवधि के दौरान भारत में ही रुकने की अनुमति दी जा सकती है. साथ ही भारत सरकार बांग्‍लादेशी नागरिकों का बायोमीट्रिक रिकॉर्ड तैयार करने पर विचार कर सकती है. इस बीच यह ध्‍यान रखना चाहिए कि लोग सिर्फ संकट में ही एक से दूसरे देश नहीं जाते. अकसर लोग अपनी महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दूसरे देशों में जाकर बस जाते हैं. ऐसे में प्रवासियों की संख्‍या घटाने का फैसला और उनका चुनाव ध्‍यान से किया जाना चाहिए. सभी देशों को ध्‍यान रखना चाहिए कि पूरी दुनिया में प्रवासियों की बढ़ती संख्‍या का जटिल मसला किसी एक सूची या दीवार से सुलझने वाला नहीं है्.

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First published: September 4, 2019, 1:32 PM IST
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