ये हैं पिछली सरकार में डोभाल के 6 सबसे सीक्रेट ऑपरेशन, जिनके चलते उनपर टिका है मोदी का विश्वास

प्रधानमंत्री के खासमखास और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल नई सरकार में और भी ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं. उन्हें फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तो बनाया ही गया है साथ ही उन्हें कैबिनेट रैंक का दर्जा भी दिया गया है. अनाधिकारिक तौर पर उन्हें भारत का जेम्स बॉन्ड भी कहा जाता है.

News18Hindi
Updated: June 3, 2019, 7:22 PM IST
ये हैं पिछली सरकार में डोभाल के 6 सबसे सीक्रेट ऑपरेशन, जिनके चलते उनपर टिका है मोदी का विश्वास
एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक के अलावा डोकलाम में भी डोभाल ने अहम भूमिका निभाई थी
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Updated: June 3, 2019, 7:22 PM IST
प्रधानमंत्री के खासमखास और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल नई सरकार में और भी ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं. उन्हें फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तो बनाया ही गया है साथ ही उन्हें कैबिनेट रैंक का दर्जा भी दिया गया है. अनाधिकारिक तौर पर उन्हें भारत का जेम्स बॉन्ड भी कहा जाता है. लेकिन अब उनका कद बढ़ाए जाने के पीछे उनकी प्रधानमंत्री से करीबी न होकर पिछले पांच सालों में कई सारे ऑपरेशनों को जबरदस्त सफलता के साथ अंजाम देना है.

डोभाल की एक खासियत यह भी है कि वे इतने खूफिया ढंग से इन ऑपरेशन्स को प्लान करते हैं कि शत्रुओं के पास चारों खाने चित्त रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता. ये हैं डोभाल के वे छह सीक्रेट ऑपरेशन जिन्होंने नई सरकार में बढ़ा दिया है, उनका कद-



इराक गए और 46 नर्सों को निकाल लाए
इराक के दो बड़े शहरों तिकरित और मोसुल में युद्ध चल रहा था. इसी बीच ख़बर आई की तिकरित शहर के एक अस्पताल में 46 भारतीय नर्सें फंसी हुई हैं. यूं तो यह काम विदेश मंत्रालय का था लेकिन इस बात की जानकारी मिलते ही पीएम मोदी ने डोभाल को बुलाया और वहां फंसी 46 नर्सों को निकालने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी.

जिन दो शहरों में युद्ध छिड़ा था, वहां हजारों की संख्या में भारतीय भी रहते थे. इन्हें भी बचाने की जिम्मेदारी डोभाल की ही थी. इसके बाद डोभाल ने पारंपरिक तरीकों के अनुसार इंडियन एंबेसी और इराक सरकार से बात करने के बजाए अपना स्टाइल अपनाया और सीधे इराक जा पहुंचे. वहां जाकर डोभाल ने जमीनी स्थिति का मुआयना किया और इराक सरकार पर भारतीय नर्सों को बचाने के लिए दबाव बनाया.

डोभाल का प्लान रंग लाया और उन 46 भारतीय नर्सों को एयरलिफ्ट कर भारत ले आया गया. इतना ही नहीं डोभाल के दबाव के चलते इराक के इन दोनों शहरों में रहने वाले हज़ारों भारतीयों की सुरक्षा के भी इंतजाम किए गए.

डोभाल को प्रधानमंत्री का करीबी भी माना जाता है, वे देश की कई संस्थाओं और कमेटियों का नेतृत्व कर चुके हैं (फोटो क्रेडिट- पीटीआई)

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भारत के दुश्मन कहीं भी जाएं डोभाल से नहीं बच सकते
भारतीय सेना ने 9-10 जून की दरमियानी रात म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए म्यांमार में शरण लिए 38 नागा उग्रवादियों को मार गिराया था. इस ऑपरेशन में 7 नागा उग्रवादी घायल भी हुए थे. इसे अंजाम देने के लिए 70 भारतीय सैनिकों की टुकड़ी भेजी गई थी. अजीत डोभाल इस ऑपरेशन की प्लानिंग और देखरेख में तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग के साथ शामिल थे.

यह ऑपरेशन भारतीय सैनिकों की हत्या का बदला था. दरअसल 4 जून, 2015 को नागा उग्रवादियों ने भारतीय सैनिकों की एक बस पर हमला करते हुए 18 सैनिकों को मार दिया था. इसके कुछ ही घंटों के अंदर भारतीय सेना के अधिकारियों ने डोभाल के साथ मिलकर इस ऑपरेशन का प्लान बनाया था.

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उरी और पठानकोट के बदले के लिए आतंकियों को घर में घुसकर मारा
पाकिस्तान के संबंध में भारत की सुरक्षा नीतियों को सैद्धांतिक तौर पर 'डिफेंसिव' मोड से 'आक्रामक' मोड में शिफ्ट करने का श्रेय डोभाल को दिया जाता है. 2014 में NSA बनाए जाने से पहले वे आईबी में भी तीन साल गुजार चुके थे. 2005 में वे आईबी के डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए थे. इसके अलावा उन्होंने एक एजेंट के तौर में पाकिस्तान में भी काम किया था.

ऐसे में खूफिया ऑपरेशनों की प्लानिंग में डोभाल माहिर हैं और फिर पाकिस्तान की बात हो तो कहने ही क्या! कहा जाता है कि सितंबर 2016 में पाकिस्तान के भीतर की गई भारत की सर्जिकल स्ट्राइक पूरी तरह से डोभाल के ही दिमाग की उपज थी. उनकी निगरानी में 29 सिंतबर, 2016 में पाक अधिकृत कश्मीर यानि पीओके में भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी. यह भारतीय सेना का उरी और पठानकोट में हुए आतंकी हमलों का बदला था.

अजीत डोभाल को म्यांमार में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग का श्रेय भी दिया जाता है (फोटो क्रेडिट- पीटीआई)


डोभाल ने चीन की आंखों में डाली आंखें और ड्रैगन को झुकना पड़ा
16 जून, 2017 से चीन के साथ डोकलाम में भारतीय सेना के गतिरोध पर भारत के हित में परिस्थितियों को लाने वाले भी डोभाल ही थे. महीनों बाद डोभाल ने इस मामले में चीन की आंखों में आंखें डाल बात की थी और आखिरकाकर चीन को नरम होना पड़ा था.

चीनी सेना और भारतीय सेना भूटान में पड़ने वाली डोकलाम नाम की जगह पर आमने-सामने आ गई थी. परिस्थितियां इतनी जटिल हो गईं थी कि लोगों को युद्ध के आसार बनते नज़र आ रहे थे लेकिन डोकलाम के इस गतिरोध पर अजीत डोभाल अपनी प्लानिंग के साथ चीनी अधिकारियों से मिले और उन्हें अपनी सेना को वापस बुलाने पर राजी कर लिया. डोभाल ने यह कारनामा कुछ ही दिनों बाद होने वाली ब्रिक्स समिट से पहले कर दिखाया था.

लंबे वक्त से भारत में आरोपी क्रिश्चियन मिशेल को लेकर आए
अगस्ता वेस्टलैंड मामले में क्रिश्चियन मिशेल को जब भारत ले आया गया तो CBI ने अपने बयान में खुलासा किया कि पूरे ऑपरेशन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में अंजाम दिया गया है. सीबीआई ने बताया कि तत्कालीन कार्यकारी सीबीआई निदेशक एम नागेश्वर राव अजीत डोभाल के निर्देशों पर काम कर रहे थे. क्रिश्चियन मिशेल अगस्ता-वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीद मामले में बिचौलिया था और 2013 में उस पर इसपर भारतीय अधिकारियों को कम गुणवत्ता वाले हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए प्रभावित करने का आरोप लगा था.

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डोभाल ने साबित किया, नया भारत सहता नहीं घर में घुसकर मारता है
इस साल 26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में की गई एयरस्ट्राइक में भी डोभाल का प्रमुख योगदान था. जो भारत के लिए एक बड़ी कामयाबी का कदम माना गया. यह कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के एक ट्रक पर हुए अटैक का बदला था.

सीआरपीएफ के ट्रक पर हुए इस हमले में अर्धसैनिक बल के 40 जवान शहीद हो गए थे. भारतीय सेना ने इसके बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित बालाकोट नाम के एक आतंकी कैंप पर हमला किया. इसमें 250 से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की रिपोर्ट मीडिया में आईं. इस तरह डोभाल को बॉर्डर पार दो सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय मिला हुआ है.

अजीत डोभाल को अनधिकारिक तौर पर भारत का जेम्स बॉन्ड भी कहा जाता है (फोटो क्रेडिट- पीटीआई)


बड़ी से बड़ी संस्थाओं में रहा है दबदबा
डोभाल का कद पिछली सरकार में भी कम नहीं था. पिछली सरकार में 2018 में उन्हें स्ट्रेटजिक पॉलिसी ग्रुप का चेयरमैन बनाया गया था. दरअसल मोदी सरकार ने 2018 में पहले डिफेंस प्लानिंग कमेटी बनाई थी, जिसका काम देश के सुरक्षा बलों और सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं बनाना था, इसके चीफ डोभाल बने. इसके बाद सरकार ने काफी दिनों से सुप्तावस्था में पड़े स्ट्रेटजिक पॉलिसी ग्रुप को जिंदा करने की कोशिश की और उसका भी चेयरमैन डोभाल को ही बनाया.

हालांकि यह बात कुछ लोगों को पची नहीं क्योंकि पहले इसका प्रमुख कैबिनेट सेक्रेटरी को बनाया जाता था जो सरकार का सबसे प्रमुख ब्यूरोक्रेट माना जाता है. कई सारी मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि स्ट्रेटजिक पॉलिसी ग्रुप यानि एसपीजी का चेयरमैन बनाए जाने के बाद डोभाल सरकार में सबसे ताकतवर अधिकारी हो जाएंगे. हालांकि पावर के मोह में डोभाल कभी नहीं पड़ते और वे इसके बाद भी देश की सुरक्षा की योजनाओं तक ही सीमित रहे. लेकिन डोभाल को यह पद दिए जाे से जाहिर हो गया कि उनकी क्षमताओं के बारे में सभी को बखूबी अंदाजा है.

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