बंगाल-ओडिशा में अब झगड़े की जड़ बन गया है रसगुल्ला

ऐसा मान लिया गया है कि रसगोला, रसोगोल्ला और रसगुल्ला जैसे अलग-अलग नामों से दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर प्रसिद्ध इस मिठाई की पैदाइश ओडिशा में हुई थी.

News18Hindi
Updated: July 30, 2019, 2:43 PM IST
बंगाल-ओडिशा में अब झगड़े की जड़ बन गया है रसगुल्ला
रसगुल्ले की लड़ाई
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Updated: July 30, 2019, 2:43 PM IST
आनंद एसटी दास

रसगुल्ला अब अपने स्वाद और लोकप्रियता के लिए नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्वाभिमान की लड़ाई का केंद्र बन गया है. इस लोकप्रिय मिठाई के इतिहास और इसकी पैदाइश ने दो पड़ोसी राज्यों ओडिशा और पश्चिम बंगाल को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है और दोनों ही राज्यों में इसको लेकर तनातनी शुरू हो गई है.

ऐसा मान लिया गया है कि रसगोला, रसोगोल्ला और रसगुल्ला जैसे अलग-अलग नामों से दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर प्रसिद्ध इस मिठाई की पैदाइश ओडिशा में हुई थी. ओडिशा को इसका भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिल गया है. चेन्नई स्थित केंद्र सरकार के जीओग्राफ़िकल इंडिकेशन रजिस्ट्री (जीआईआर) ने ‘ओडिशा रसगोला’ को यह सम्मान दिया है.

ओडिशा में इस ख़बर ने ख़ुशी की लहर पैदा कर दी. इससे दो सप्ताह पहले ही राज्य के लोगों ने भगवान जगन्नाथ की रथ यात्र की समाप्ति पर ‘रसगोला दिवस’ मनाया था. इससे आठ महीना पहले ‘बांग्लार रसोगोल्ला’ को जीआईआर दिया था.

रसोगोल्ला या रसगोला
तो इसका मतलब ये हुआ कि अब जब आप ये मिठाई ख़रीदेंगे तो इस मिठाई का नाम इसके डिब्बे पर किस तरह से लिखा गया है, यह पहले से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है। अगर यह ‘रसगोला’ है जैसे कि ओडिशा के लोग इसे बोलते हैं, तो इसका मतलब हुआ कि ये ओडिशा में बना है. अगर इस पर ‘रसोगोल्ला’ लिखा हुआ है तो इसका मतलब हुआ कि ये पश्चिम बंगाल का बना है क्योंकि बंगाली लोग इसे इसी तरह पुकारते हैं. उच्चारण के अलावा, दोनों ही राज्यों की इस मिठाई के रंग, टेक्स्चर, और खाने के दौरान पैदा होने वाली आवाज़ से पहचान होगी.


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क्या है अलग?
“पश्चिम बंगाल की इस मिठाई ‘बांग्लार रसोगोल्ला’, जिसको कि नवंबर 2017 में जीआई टैग मिला, उजला और स्पंजदार होता है. ओडिशा में बनी ये मिठाई जिसे अब जीआई टैग मिला है, या तो हल्का भूरा या फिर उजला और मुलायम होता है. यह बहुत मुलायम होता है,” ये कहना है एक पत्रकार-लेखक असित मोहंती का जिनके शोध ने यह साबित किया कि यह मिठाई ओडिशा में ज़्यादा समय से प्रचलित है.

जीआई टैग प्राप्त करने वाले इस मिठाई का टेक्स्चर ही इनके बीच वास्तविक रूप से अंतर को ज़्यादा स्पष्ट करता है. मोहंती ने कहा, “जिन लोगों ने बंगाल के रसोगोल्ला का स्वाद लिया है वे यह जानते हैं कि इसे चबाना पड़ता है और चबाने के दौरान आवाज़ निकलती है जिसके बारे में एक बार प्रसिद्ध उड़िया नाटककार गोपाल चोतराय ने ‘खर-खर’ आवाज़ कहा था। लेकिन ओडिशा का रसगोला इतना मुलायम होता है कि थोड़े दबाव से ही यह मुँह के अंदर घुल जाता है और इसे चबाने की ज़रूरत नहीं पड़ती,”

रसगोला की पैदाइश ओडिशा में!
उद्यमी अनिता सबत ओडिशा रसगोला को जीआई टैग मिलने से काफ़ी ख़ुश हैं. उन्होंने पश्चिम बंगाल के साथ विवाद होने पर ये बताने के लिए कि रसगोला की पैदाइश ओडिशा में हुई, सोशल मीडिया में 2015 में एक अभियान चलाया था. सबत ने कहा, “यह ओडिशा के लिए एक गौरव का दिन है. मैं इस बात को लेकर गौरवान्वित महसूस कर रही हूं कि मैं उन कुछ लोगों में शामिल हूं जिन्होंने इस पहचान के लिए काम किया.'' सबत ने उस साल सोशल मीडिया पर ‘नीलाद्री बिजे’ दिवस को रसगोला दिवस के रूप में मनाने के अभियान की अगुवाई की.

“अब ये ज़रूरी है कि ओडिशा के मिठाई बनानेवाले रसगोला की ख़ासियत को बनाए रखकर पूरे देश और दुनिया में इसको बेचना शुरू करें. ओडिशा के रसगोला की ब्रांडिंग से इसकी लोकप्रियता शीघ्र बढ़ जाएगी और उसे बंगाली रसोगोल्ला से ज़्यादा सफलता मिलेगी,”ये कहना था अक्षय कुमार लेंका का जो कि पहला स्वीट्स ट्रेडर्ज़ असोसीएशन के प्रेज़िडेंट हैं.

पश्चिम बंगाल  का दावा
रसोगोल्ला को बंगाली समझा जाता रहा है और पश्चिम बंगाल सरकार ने 2015 में दावा किया था कि राज्य में इसकी पैदाइश 19वीं सदी में हुई।. पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य के विद्वानों के अनुसार, राज्य के प्रसिद्ध मिठाई निर्माता नबीन चंद्र दास ने इसे 1868 में बनाया. ‘बांग्लार रसोगोल्ला’ को नवंबर 2017 में जीआई टैग मिला जिसका ओडिशा में काफ़ी विरोध हुआ.

ओडिशा का दावा
लेकिन ओडिया संस्कृति के जानेमाने जानकार मोहंती जो कि ओडिशा सरकार द्वारा इस मामले को लेकर गठित तीन समितियों के सदस्य भी हैं, ने रसगोला की खोज में प्राचीन ओडिया और संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया. उन्होंने पता किया कि इसी तरह की मिठाई छेना से 12वीं सदी में बनाया जाता था और इसे भगवान जगन्नाथ को चढ़ाया जाता था. इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर के अधिकारों के रिकॉर्ड के अनुसार प्राचीन ‘नीलाद्री बिजे’ रस्म के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी लक्ष्मी को रसगोला देते थे.

इसके अलावा, जैसा कि मोहंती को पता चला, रसगोला शब्द का उल्लेख 15वीं सदी के ओडिया ग्रंथ “दंडी रामायण” में मिलता है जिसे बलराम दास ने लिखा है. इस ग्रंथ में रामायण की कहानी का वर्णन है जिसे तुलसीदास की 16वीं सदी की कृति रामचरित मानस ने पूरे भारत में लोकप्रिय बना दिया.

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First published: July 30, 2019, 2:43 PM IST
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