लाइव टीवी

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, RTI के दायरे में आएगा सीजेआई का दफ्तर

News18Hindi
Updated: November 13, 2019, 2:58 PM IST
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, RTI के दायरे में आएगा सीजेआई का दफ्तर
CJI रंजन गोगोई

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2010 में दिए गए फैसले को बरकरार रखा है. संवैधानिक बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शीर्ष अदालत (Supreme Court) और चीफ जस्टिस (CJI) का दफ्तर सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में कुछ शर्तों के साथ आएगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 13, 2019, 2:58 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. देश के प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice of India) का दफ्तर अब सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे आएगा. हालांकि, निजता और गोपनीयता का अधिकार बरकरार रहेगा. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संवैधानिक बेंच ने बुधवार को ये फैसला दिया. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस का दफ्तर आरटीआई के दायरे में कुछ शर्तों के साथ आएगा.

शीर्ष अदालत ने संविधान के आर्टिकल 124 के तहत ये फैसला दिया है. इस फैसले के बाद अब कोलेजियम के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डाला जाएगा. फैसला पढ़ते हुए जस्टिस रम्मना ने कहा कि RTI का इस्तेमाल जासूसी के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है.

दरअसल, मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) ने आदेश में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का दफ्तर आरटीआई के दायरे में होगा. इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था. हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने 2010 में चुनौती दी थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे कर दिया था. फिर इस मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया गया. इस बेंच के अन्य सदस्य जस्टिस एन वी रमण, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना हैं.

SUPREME COURT
सुप्रीम कोर्ट


पहले संवैधानिक बेंच ने क्या कहा था?
इसके पहले प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाली बेंच ने इस मामले पर सुनवाई पूरी करते हुए कहा था कि कोई भी अपारदर्शिता की व्यवस्था नहीं चाहता, लेकिन पारदर्शिता के नाम पर न्यायपालिका को नष्ट नहीं किया जा सकता. बेंच ने कहा था, 'कोई भी अंधेरे की स्थिति में नहीं रहना चाहता या किसी को अंधेरे की स्थिति में नहीं रखना चाहता. आप पारदर्शिता के नाम पर संस्था को नष्ट नहीं कर सकते.'

क्या था हाईकोर्ट का फैसला?बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 जनवरी 2010 को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई कानून के दायरे में आता है. कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक स्वतंत्रता न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उस पर एक जिम्मेदारी है.

 

 

88 पन्नों के फैसले को तब तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन के लिए निजी झटके के रूप में देखा गया था, जो आरटीआई कानून के तहत न्यायाधीशों से संबंधित सूचना का खुलासा किए जाने के विरोध में थे. हाईकोर्ट ने शीर्ष अदालत की इस दलील को खारिज कर दिया था कि सीजेआई कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाए जाने से न्यायिक स्वतंत्रता ‘बाधित’ होगी. (PTI इनपुट के साथ)

महाराष्ट्र में सत्ता के लिए संग्राम : क्यों लगता है राष्ट्रपति शासन, क्या है पूरी प्रक्रिया

महाराष्ट्र में सत्ता के लिए संग्राम: जानें कब-कब लगा है राष्ट्रपति शासन

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 13, 2019, 8:40 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर