कालापानी, लिपुलेख भारत की सीमा पर स्थित गांवों के इलाके: अधिकारी

कालापानी, लिपुलेख भारत की सीमा पर स्थित गांवों के इलाके: अधिकारी
नेपाली संसद ने हाल ही में नये नेपाली नक्शे को मंजूरी दी थी (सांकेतिक फोटो)

एक स्थानीय अधिकारी (Local Officer) ने हाल ही में कहा कि स्थानीय जमीन के दस्तावेज (Local land records) भी बताते हैं कि कालापानी और लिपुलेख (Kalapani and Lipulekh) की जमीन भारत के सीमा के दो गांवों के निवासियों की है.

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पिथौरागढ़. उत्तराखंड (Uttarakhand) के कालापानी और लिपुलेख (Kalapani and Lipulekh) को अब नेपाल (Nepal) ने अपने एक नए मानचित्र के इलाकों के रूप में भले ही दिखा लिया हो लेकिन यहां के आधिकारिक रिकॉर्ड (Official Record) एक अलग कहानी बताते हैं. नेपाल के संसद के निचले सदन ने शनिवार को नए राजनीतिक मानचित्र (Political Map) को मंजूरी दे दी, जिस पर भारत की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई क्योंकि भारत इनका अपने इलाके के तौर पर प्रबंधन करता है.

एक स्थानीय अधिकारी (Local Officer) ने हाल ही में कहा कि स्थानीय जमीन के दस्तावेज (Local land records) भी बताते हैं कि कालापानी और लिपुलेख (Kalapani and Lipulekh) की जमीन भारत के सीमा के दो गांवों के निवासियों की है.

लिपुलेख दर्रे के जरिए ही हर साल होती है कैलास-मानसरोवर यात्रा
पिथौरागढ के धारचूला के उपजिलाधिकारी ए के शुक्ला ने जमीन के दस्तावेजों के हवाले से बताया कि भारत-नेपाल सीमा पर लिपुलेख, कालापानी और नाभीढांग की सारी जमीन पारंपरिक रूप से धारचूला के गर्बियांग और गुंजी गांवों के निवासियों की है .
शुक्ला ने बताया, ‘‘कालापानी और नाभीढांग में 190 एकड से ज्यादा जमीन गर्बियांग के ग्रामीणों के नाम दर्ज है जबकि लिपुलेख दर्रे पर स्थित भूमि रिकार्डों में गुंजी गांव के निवासियों की साझा जमीन के रूप में दर्ज है .’’ वार्षिक कैलाश-मानसरोवर यात्रा हर साल भारत-चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे के जरिए ही होती है.



गर्बियांग के ग्रामीणों ने कहा, 1962 के पहले भी उनके पूर्वज कालापानी में ही उगाते थे फसलें
गर्बियांग के ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 1962 में भारत चीन युद्ध से पहले उनके पूर्वज कालापानी में इसी जमीन पर फसलें उगाया करते थे. बाद में युद्ध के पश्चात लिपुलेख दर्रे के जरिए चीन के साथ सीमा व्यापार बंद हो गया और वहां फसलें उगाना भी छोड दिया गया.

गर्बियांग गांव के निवासी और धारचूला में रंग कल्याण संस्था के अध्यक्ष कृष्णा गर्बियाल ने बताया कि 1962 से पहले हम कालापानी और नाभीढांग में पाल्थी और फाफर जैसे स्थानीय अनाज उगाया करते थे.' उन्होंने बताया कि पहले कालापानी के पार नेपाल में माउंट आपी तक की जमीन गर्बियांग के ग्रामीणों की ही थी लेकिन नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के बीच 1816 में हुई सुगौली संधि के बाद उन्होंने इसे छोड़ दिया. इस संधि के बाद नेपाल और भारत के बीच स्थित काली नदी को सीमा रेखा मान लिया गया.

ग्रामीण कालापानी में काली नदी के स्रोत को मानते हैं पवित्र
गर्बियाल ने बताया कि गर्बियांग के ग्रामीण कालापानी में काली नदी के स्रोत को बहुत पवित्र मानते हैं और उसमें अपने मृतकों की अस्थियों को प्रवाहित करते हैं.

नेपाल (Nepal) की प्रतिनिधि सभा में सभी दलों ने शनिवार को उस नए मानचित्र के पक्ष में वोट दिया जिसमें भारत की सीमा के साथ लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर दावा किया गया है.

भारत ने नक्शे पर दी कड़ी प्रतिक्रिया, दावे को बताया तर्कहीन
इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने नेपाल के नए नक्शे  (Map) को खारिज कर दिया और इस दावे को तर्कहीन बताया.

विदेश मंत्रालय (Foreign Ministry) के एक प्रवक्ता ने कहा कि नक्शे पर कृत्रिम तरीके से किया गया ऐसा क्षेत्र विस्तार न तो ऐतिहासिक तथ्यों या साक्ष्यों पर आधारित है और न ही तार्किक है . उन्होंने कहा कि यह सीमा मसलों के समाधान के लिए बनी आपसी समझ के भी खिलाफ है.

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