क्या हमें आज शिक्षक की ज़रूरत है?

5 सितंबर-देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन का जन्मदिन. शिक्षक दिवस की शुरुआत उन्हीं के सम्मान में 1962 में हुई थी.

News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 7:39 PM IST
क्या हमें आज शिक्षक की ज़रूरत है?
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Updated: September 5, 2018, 7:39 PM IST
(नवज्योत कौर)

5 सितंबर को देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन मनाया जाता है. शिक्षक दिवस की शुरुआत उन्हीं के सम्मान में 1962 में हुई थी.  उनके राष्ट्रपति रहने के दौरान एक बार लोगों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई तो उनका जवाब था कि सम्मान देना है तो शिक्षकों को दो जो देश का भविष्य संवारते हैं. तभी से शिक्षक दिवस की शुरुआत हुई.



आज़ादी के बाद से देश में डॉ राधाकृष्णन जैसे शिक्षकों की ज़रूरत हमेशा महसूस होती रही है. लेकिन आज ये दिन मनाते हुए एक सवाल ज़हन में आता है कि क्या हमें और आने वाली पीढ़ी को सही मायने में शिक्षक की ज़रूरत है?

मैं जब छठी क्लास में थी तो मेरी इंग्लिश की किताब में एक पाठ था जिसमें लेखक ने आज के दिन पर उठ रहे इस सवाल का जवाब दिया था. 'Education Without School And teacher'. मुझे आज भी याद है उस दिन मेरी इंग्लिश टीचर के वो पाठ पढ़ाने के बाद क्लास में बच्चों के चेहरे खुशी से खिले हुए थे. उसमें हमें पढ़ाया गया था कि एक दिन ऐसा आएगा जब बच्चों को भारी भरकम बस्ते, किताबें नहीं उठानी पड़ेंगी, स्कूल नहीं जाना पड़ेगा और बच्चे घर बैठे कंप्यूटर पर सारी पढ़ाई कर सकेंगे. उस समय मेरे लिए ये एक सुखद कल्पना थी और हंसी भी आ रही थी. मन ही मन सोच रही थी कि हम क्या पढ़ रहे है, वो जो कल्पना से परे है. उस वक्त देश में कंप्यूटर की शुरुआत हो ही रही थी. खैर आज किताब में पढ़ा वो विषय सच हो रहा है. तो क्या हमें सही मायने में शिक्षकों की ज़रूरत है?

डिजिटल होती शिक्षा

मेरा देश बदला है, देश में कंप्यूटर आने के बाद आज डीजिटल क्रांति भी आ चुकी है. शिक्षा के क्षेत्र में भी हम आज इस क्रांति का असर देख रहे हैं. प्ले/ किंडर स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा तक हर जगह डिजिटल प्रणाली ने अपने पैर पसारे हैं. आज हर हाथ में स्मार्ट फोन हैं और स्मार्ट फोन लोगों को स्मार्ट बनाने के साथ साथ जीने के स्मार्ट तरीके भी सिखा रहे हैं. देश में डिस्टेंट एजुकेशन से समाज में हर कोई शिक्षित हो रहा है. लेकिन अब तो शिक्षा का डिजिटाइजेशन भी हो चुका है. हर विषय से जुड़ी हर जानकारी मोबाइल/ कंप्यूटर की एक क्लिक से ली जा सकती है. घर बैठे पूरा कोर्स कर सकते हैं. यहां तक कि घर बैठे विदेश से डिग्री लेना भी आसान हो गया है. ना स्कूल-कॉलेज जाने की चिंता ना समय की कोई पाबंदी, जब चाहें पढ़ाई कर लें. किताब, फोन और कंप्यूटर के रूप मे हर वक्त आपके साथ है. यहां तक कि कौशल विकास मंत्रालय के तो कई कोर्स डिजिडल प्रणाली में ही हैं.

(image credit: PTI)

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यहां देश में शिक्षा की हालत पर भी गौर कीजिए. देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां शिक्षा का स्तर काफी नीचे है, कहीं स्कूल नहीं, कहीं शिक्षक नहीं. कहीं शिक्षक है तो वो बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूलों में आते ही नहीं. यहां तक कि कई राज्यो में तो शिक्षकों की शिक्षा को लेकर ही सवाल उठते रहते हैं. जिसका नतीजा ये है कि छात्र साक्षरता के मौलिक अधिकार से ही महरूम हैं. हर राज्य सरकार का अपना शिक्षा विभाग है जिसका अपना बजट है, लेकिन सवाल ये कि वो जाता कहां है? इस पर भी सोचने की ज़रूरत है.

शिक्षा को लेकर तमाम सियासी पार्टियों ने भी खूब सियासत की है. कई बार वोटरों को लुभाने के लिए चुनावी मुद्दों में छात्रों को स्मार्ट फोन और लैपटॉप तक बांटने की पेशकश की गई और दिए भी गए क्योंकि वो भी ये जानते हैं कि आज भले ही वो जनता को शिक्षक ना मुहैया करा पाएं, लेकिन डिजिटल एजुकेशन तो दिलवा ही सकते हैं.

सो सवाल ये कि स्मार्ट होती ज़िंदगी में क्या आज हमें शिक्षकों की ज़रूरत है? 21वीं सदी में पैदा हुए बच्चों के लिए शिक्षक दिवस के मायने कहीं शिक्षक से परे कंप्यूटर और फोन तक ही ना सिमट कर रह जाएं.
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