Coronavirus: एम्स की स्टडी के बाद उठी स्कूल खोजने की मांग, पेरेंट्स बोले- 'सरकार करें विचार'

अध्ययन में कहा गया है कि ये सोचना कि स्कूल-कॉलेज खोल देने से बच्चे ज्यादा संक्रमित होंगे ये कहना ठीक नहीं है.

एम्स और डब्ल्यूएचओ की स्टडी में पाया गया कि बड़ी उम्र वालों की तरह ही बच्चे भी कोरोना से संक्रमित हुए हैं. ज्यादातर बच्चों में संक्रमण होने पर किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे. स्टडी में ये भी पाया गया है कि कोरोना की संभावित तीसरी लहर में बच्चों पर ज्यादा खतरा नहीं है.

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नई दिल्ली. एम्स और डब्ल्यूएचओ की स्टडी में पाया गया है कि कोरोना की संभावित तीसरी लहर में बच्चों को ज्यादा खतरा नहीं है. इस स्टडी के आधार पर अब मांग उठने लगी है कि सरकार स्कूल खोलने पर विचार करें. इस स्टडी में शामिल सदस्य से लेकर स्कूलों की तरफ से भी कहा जा रहा है कि जब बच्चे भी बड़ी संख्या में संक्रमित हो चुके हैं तो सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि स्कूल कब शुरू किए जा सकते हैं.

इस स्टडी में शामिल डॉ. संजय राय के मुताबिक देश में एक बड़ी स्टडी हो रही है और ये सीरो सर्वे उसका एक हिस्सा है. ये दर्शाता है कि जो ग्लोबल एविडेंस है जिसमें ये बताता है कि बच्चों में माइल्ड इफेक्शन है लेकिन बच्चे भी उतना ही संक्रमित हो रहे हैं जितना कि बड़े. हर जगह ये देश के पांच जगहों पर सर्वे हुआ है चाहे नार्थ ईस्ट हो, यूपी हो, दिल्ली हो लगभग एक जैसे फाइडिंग हैं. ये कहना कि थर्ड वेब में बच्चों को कोरोना ज्यादा संक्रमित करेगा ऐसा नहीं लगता.

थर्ड वेब में सभी समान रूप से संक्रमित होंगे. अध्ययन में कहा गया है कि ये सोचना कि स्कूल-कॉलेज खोल देने से बच्चे ज्यादा संक्रमित होंगे ये कहना ठीक नहीं है. जितने भी सीरो सर्वे हुए वो बताते हैं कि जितना बड़ों को कोरोना हुआ उतना बच्चों में भी हुआ. बच्चों में पता नहीं चलता क्योंकि वो माइल्ड होते हैं. ज्यादातर बच्चों में लक्षण नहीं होते हैं. ये धारणा कि स्कूल कालेज खोल देने से बच्चे संक्रमित होंगे ये ठीक नहीं है.

एम्स में पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट में प्रोफेसर और स्टडी में शामिल डॉ. संजय राय ने बताया कि विश्व स्तर पर प्रमाण इकट्ठा किए गए हैं, जिसमें इस बात के प्रमाण नहीं मिल रहे हैं कि अगर तीसरी लहर आती है तो सबसे ज्यादा बच्चों के लिए खतरा होगा. डॉ. संजय राय ने कहा कि सरकार और प्रशासन को परखना चाहिए कि स्कूल बंद होने से बच्चों के मानसिक विकास पर कितना असर पड़ेगा. ये तमाम चीजें देखने के बाद एक निर्णय लेना चाहिए. जो अभी तक एविडेंस हैं वो संकेत करते हैं कि स्कूल खोलने का समय आ गया है.

स्टडी में क्या सामने आया?
एम्स और डब्ल्यूएचओ की स्टडी में पाया गया कि बड़ी उम्र वालों की तरह ही बच्चे भी कोरोना से संक्रमित हुए हैं. ज्यादातर बच्चों में संक्रमण होने पर किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे. स्टडी में ये भी पाया गया है कि कोरोना की संभावित तीसरी लहर में बच्चों पर ज्यादा खतरा नहीं है.

स्कूलों की क्या है राय?
स्टडी की रिपोर्ट सामने आने के बाद स्कूलों की तरफ से दलील दी जा रही है कि पिछले डेढ़ साल से बच्चे घरों में रहे हैं इसके बावजूद वो संक्रमित होने से नहीं बच पाए तो फिर स्कूल खोलने पर विचार होना चाहिए. कालका पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल ओनिका मेहरोत्रा ने न्यूज 18 इंडिया को बताया कि बच्चे भी उसी माहौल में रहे है और उसी घर में रहे हैं जिन घरों में बड़ों को कोरोना हुआ. एम्स की स्टडी को देखते हुए मुझे लगता है कि सरकार को विचार कर लेना चाहिए. 15 महीने से बच्चे घर पर हैं. ऑनलाइन क्लास जरूर चल रही है लेकिन जो स्कूल का माहौल होता है जिसमें बच्चे सीखते हैं, खेलते हैं, अपने आप को ग्रो करते हैं. बच्चों का विकास होता है तो मुझे लगता कि सरकार को विचार कर लेना चाहिए कि स्कूल खोले और बच्चों को स्कूल जाने का मौका मिले.

केंद्र सरकार की क्या है राय?
स्कूल खोलने के मुद्दे पर शुक्रवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कॉफ्रेंस में नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी के पॉल से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि स्कूल खोलने को लेकर कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है, ये अलग टॉपिक है. सरकार के सिस्टम में यह विचार आता रहता है. स्कूल में टीचर और हेल्पर होते हैं. सोशल डिस्टेंसिंग कम हो जाती है तो उन सब मुद्दों पर विचार कर ही बात आगे आनी चाहिए. उनमें और भी बहुत सारे इशू हैं. जैसे-जैसे साइंटिफिक जानकारियां मिलती हैं वैक्सीन उपलब्ध होती है, टीचर्स का वैक्सीनेशन हो जाता है और हम आदत बदल लेते हैं तो ऐसा वक्त जरूर आना चाहिए जब स्कूल खुल जाएं.

लेकिन याद रहे कि बाहर के देशों में स्कूल खुले फिर आउटब्रेक होने के बाद बंद हुए. अपने बच्चों को और टीचर्स को उस परिस्थिति में नहीं डाल सकते जब तक कि थोड़ा ज्यादा कॉन्फिडेंस न हो और उस स्वरूप में आकर पैंडेमिक हमे नुकसान न करें लेकिन ये जानकारी भी काफी महत्वपूर्ण है.

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