OPINION। कांग्रेस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं छोड़ेगा नेहरू-गांधी परिवार

राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सक्रिय रहेंगे, जिसे कांग्रेस के नए अध्यक्ष को ध्यान रखना चाहिए. इन सबसे ऊपर यह परिवार के हिसाब से ठीक नहीं होगा कि गांधी परिवार के वफादार के अलावा कोई और राहुल गांधी की जगह ले.

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Updated: July 7, 2019, 11:46 AM IST
OPINION। कांग्रेस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं छोड़ेगा नेहरू-गांधी परिवार
राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि, नई दिल्ली में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा (पीटीआई)
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Updated: July 7, 2019, 11:46 AM IST
(कल्याणी शंकर)

क्या गांधी परिवार 134 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी पर अपनी पकड़ छोड़ देगा? ऐसा नहीं लगता क्योंकि परिवार के लिए यह बड़ा दांव है, जो कई दशकों से इसका संचालन कर रहा है. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार अध्यक्ष पद से इस्तीफे को लेकर राहुल गांधी के अड़ियल रुख से सोनिया गांधी खुश नहीं हैं. उन्होंने 1998 से यह पद अपने बेटे के लिए ही संभाले रखा और दिसंबर 2017 में जब उन्हें कांग्रेस की गद्दी सौंपी गई तो वह भी खुश थी. हालांकि अब राहुल के इस्तीफे ने पार्टी को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है.

राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर काफी कुछ कहा जा चुका है, अब चीजों को वैसे देखने की जरूरत है, जैसी कि वे वर्तमान में हैं. एक पखवाड़ा पहले सोनिया गांधी को दोनों सदनों के नेताओं ने कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना था. यह 2019 के चुनाव परिणामों के बाद हुआ. प्रियंका गांधी वाड्रा, जिन्हें जनवरी कांग्रेस महासचिव चुना गया था, वह अब भी अपने पद पर हैं जबकि वह अमेठी में परिणाम देने में विफल रहीं और राहुल गांधी अपने परिवार के गढ़ में स्मृति ईरानी के हाथों पराजित हो गए.

राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी में सक्रिय रहेंगे, जिसे कांग्रेस के नए अध्यक्ष को ध्यान रखना चाहिए. इन सबसे ऊपर यह परिवार के हिसाब से ठीक नहीं होगा कि गांधी परिवार के वफादार के अलावा कोई और राहुल गांधी की जगह ले.



वर्ष 2004 और 2009 में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सोनिया ने अपने प्रयोग से महसूस किया कि सत्ता का आनंद लेने का सबसे अच्छा तरीका बाहर रहकर डमी के जरिए शासन करना है. किसी भी स्थिति में गांधी परिवार के दो सदस्य- सोनिया और प्रियंका- पद पर बने रहते हैं. इसलिए पार्टी अब भी परिवार के हाथों में है.

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पार्टी पर पकड़ क्यों रखेंगे गांधी?

गांधी परिवार, पार्टी पर पकड़ क्यों बनाकर रखेगा? पहली बात- वह पार्टी पर दशकों से राज कर रहे हैं और दूसरी बात परिवार पार्टी में एकता बनाए रखता है. कई कांग्रेस नेता प्रतिद्वंदिता के कारण अपने बीच से एक के बजाय गांधी परिवार को स्वीकार करेंगे. यहां तक कि 1991-98 के बीच सात सालों के दौरान भी जब सोनिया राजनीति में नहीं थीं, तब कई कांग्रेस नेता उनके संपर्क में रहते थे.

नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी दोनों ने इस बात को अनुभव किया कि किसी गैर-गांधी के लिए कांग्रेस का नेतृत्व करना कितना मुश्किल था. चाहे सत्ता में हो या सत्ता से बाहर गांधी परिवार पार्टी पर पकड़ रखता है. राव जब 1991-96 तक पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पाया कि सोनिया गांधी के वफादार हमेशा 10 जनपथ की ओर भागते थे, जिसे एक विरोधी सत्ता केंद्र के तौर पर देखा जाता था.

कांग्रेस में गांधी परिवार की मंजूरी जरूरी

अंदरूनी लोग बताते हैं कि अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी ने सोनिया गांधी के आशीर्वाद से ही कांग्रेस टी की स्थापना की थी. राव के बाद पार्टी अध्यक्ष बने सीताराम केसरी, जिन्हे कि सोनिया गांधी के 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद उनके वफादारों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया, ने भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना किया. ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जिसके बारे में उन्होंने 10 जनपथ को बताया था. 1999 में सोनिया गांधी ने जब शरद पवार द्वारा उनके विदेशी मूल पर सवाल खड़े करने को लेकर इस्तीफा दिया तो केवल पवार और उनके समर्थकों को बाहर निकाला गाय, जिसके बाद सोनिया ने अपना इस्तीफा वापस लिया. इस दौरान पार्टी मजबूती से सोनिया गांधी के साथ खड़ी रही.

दूसरा बटुए की डोर परिवार के साथ बनी रही सकती है. नए पार्टी अध्यक्ष को एक-एक दिन पार्टी चलाने के लिए गांधी परिवार पर निर्भर रहना पड़ सकता है. कांग्रेस इस वक्त केवल आधा दर्जन राज्यों में सत्ता में है, पार्टी को पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा है. हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के चुनावों के चलते नए अध्यक्ष का काम अवांछनीय है.



राहुल के खिलाफ नहीं उठी एक भी आवाज 

तीसरा, पार्टी में वरिष्ठ नेताओं को अहसास है कि परिवार पार्टी पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ेगा. जबकि दूसरे नेताओं सहित इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी को चुनौती मिली थी, लेकिन एक भी नेता ने, जूनियर या सीनियर, पार्टी की लगातार हार के बावजूद राहुल गांधी के खिलाफ आवाज नहीं उठाई.

पुराने नेताओं को राहुल गांधी की कार्यशैली और जमीन पर उनकी पकड़ न होने से मोहभंग हो सकता है, लेकिन उनमें से किसी ने भी खुले तौर पर उन्हें चुनौती नहीं दी. राहुल गांधी को पिछले साल कांग्रेस वर्किंग कमेटी का अध्यक्ष चुना गया था, यहीं निकाय पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव करेगा. यहीं कारण है कि नए अध्यक्ष के लिए सुशील कुमार शिंदे और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे गांधी परिवार के वफादार नेताओं का नाम सामने आ रहा है.

गांधी के लौटने तक रहेगा नया अध्यक्ष

पार्टी के अंदरूनी नेताओं का दावा है कि नया अध्यक्ष उसी वक्त तक सीट पर रहेगा जब तक कि गांधी फिर से अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं हो जाते. जिस वक्त नया अध्यक्ष स्वतंत्र होने की कोशिश करेगा उसे उसी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा जैसे 1998 में केसरी को दिखाया गया था.

केसरी तब हक्का-बक्का रह गए थे जब उन्होंन देखा कि उनको हटाने के कुछ ही देर बाद एआईसीसी में उनकी नेमप्लेट की जगह सोनिया गांधी की चमचमाती नेम प्लेट लगा दी गई थी.

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी वंशवाद के आलोचक हैं, लेकिन जहां तक कांग्रेस की बात है तो इसे वंशवाद से दूर नहीं किया जा सकता है. कहानी का सार ये है कि कांग्रेस परिवार के बिना नहीं चल सकती है और परिवार पार्टी को नहीं छोड़ सकता है.

(लेखक राजनीतिक विशेषज्ञ है. लेख में प्रकाशित विचार उनके निजी हैं)

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First published: July 7, 2019, 10:41 AM IST
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