OPINION: पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध : एक आत्मघाती कदम

पाकिस्तान में स्थापित सत्य है कि 'पाकिस्तान का बॉक्स ऑफ़िस बचा रहे इसके लिए भारतीय सिनेमा का होना जरूरी है.'

News18Hindi
Updated: July 6, 2019, 3:29 PM IST
OPINION: पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध : एक आत्मघाती कदम
पाकिस्तान में स्थापित सत्य है कि पाकिस्तान का बॉक्स ऑफ़िस बचा रहे इसके लिए भारतीय सिनेमा का होना जरूरी है.
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Updated: July 6, 2019, 3:29 PM IST
संतोष के. वर्मा

पाकिस्तान का सिनेमा जगत संकट में है और यह कोई नया और आश्चर्य चकित करने वाला तथ्य नहीं है. इसके आरंभिक दौर से ही यह तमाम मुश्किलों के दौर से गुजरता रहा है. राजनीतिक, आर्थिक, तकनीकी और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक कारणों ने यहां के सिनेमा की दशा और दिशा निर्धारित करने का काम किया है. भारतीय सिनेमा पाकिस्तान में अत्यंत लोकप्रिय रहा है और साल 2011 के बाद से पाकिस्तान में इस उद्योग के विकास में भारतीय फिल्मों का योगदान नकारा नहीं जा सकता.

14 फरवरी को पुलवामा पर हुए आतंकवादी हमले के बाद 26 फरवरी को भारतीय वायु सेना ने हवाई हमले शुरू किए और पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े शिविर को नष्ट कर दिया. इसके कुछ समय बाद इस घटना के जवाब के रूप में, पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने भारतीय फिल्मों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की घोषणा की. चौधरी ने ट्विटर पर बताया कि किसी भी भारतीय फिल्म को पाकिस्तान में रिलीज नहीं होने दिया जाएगा. पाकिस्तान के इस कदम का उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग के खिलाफ कार्यवाही था परन्तु इसके घातक प्रभाव पाकिस्तान के फिल्म उद्योग पर कहीं अधिक देखा जा रहा है.

पाकिस्तानी सिनेमा का विकास

अविभाजित भारत में जब सिने युग का प्रारंभ हुआ तभी वर्तमान पाकिस्तान के भाग में फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ. साल 1929 में अब्दुर रशीद करदार ने जो आगे चलकर पाकिस्तान के प्रख्यात निर्माता निर्देशक बने , यूनाइटेड प्लेयर्स कॉरपोरेशन नाम से एक स्टूडियो और प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की बाद में जिसका नाम प्लेआर्ट फोटोटोन कर दिया गया. यही लाहौर फिल्म उद्योग की आधारशिला थी जो बीसवीं सदी के आने वाले दशकों में पाकिस्तानी सिनेमा का मुख्या केंद्र बना रहा और दुनिया के प्रख्यात फिल्म उद्योगों की तर्ज पर एक लोकप्रिय नाम लॉलीवुड के नाम से मशहूर हुआ. (1947 और 2007 के बीच, पाकिस्तानी सिनेमा लाहौर में स्थित था.)

इस अवधि के दौरान पाकिस्तानी फिल्मों ने बड़ी मात्रा में दर्शकों को आकर्षित किया जो उसकी सांस्कृतिक मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व भी करता था. साल 1960 से 1977 के बीच का काल पाकिस्तान के फिल्म उद्योग का स्वर्ण युग माना जाता है. साल 1970 के दशक की शुरुआत में, पाकिस्तान, फीचर फिल्मों का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा निर्माता था. हालांकि, साल 1977 और साल 2007 के बीच, पाकिस्तान के फिल्म उद्योग में इस्लामीकरण, कठोर सेंसरशिप कानूनों और गुणवत्ता की कमी और अत्यधिक कराघात जैसे कारणों से भारी गिरावट आई.

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जनरल जिया उल हक जो 5 जुलाई 1977 को सत्ता में आये उसके बाद इस्लामिक कट्टरपंथ का प्रसार पाकिस्तान की नीति रीति में शामिल हो गया और इसका खामियाजा पाकिस्तान के फिल्म उद्योग को भी भुगतना पड़ा. उल्लेखनीय है पाकिस्तानी सिनेमा ने जनरल ज़िया के शासन के अंतर्गत पाकिस्तान ने अपने 700 सिंगल-स्क्रीन सिनेमा को खो दिया. साल 1977 से प्रारंभ हुआ अन्धकार का युग साल 2007 तक लगातार चलता रहा जब एक दुसरे सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ ने इन प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाये. परन्तु इसके बाद पाकिस्तान के फिल्म निर्माण के केंद्र लाहौर ने अपना पुराना गौरव खो दिया और यह कराची की ओर स्थानांतरित हो गया.

हालांकि पाकिस्तान में स्क्रीन की संख्या साल 2013 में 30 से बढ़कर 2017 में लगभग 100 के पार हो गई, लेकिन निर्माता और निवेशक इस क्षेत्र में लगातार चिंतित ही रहे हैं. उन 4 दशकों के दौरान, जब दर्शकों से सिनेमा को दूर कर दिया गया तो उसके स्थानापन्न के रूप में पाकिस्तान के टेलीविज़न सोप ओपेरा में उछाल आया और मध्यम वर्ग के मनोरंजन के लिए बड़ा साधन प्राप्त हो गया. अब सिनेमा के अधिकांश अभिनेताओं, निर्देशकों और पटकथा लेखकों ने अपना ध्यान इनके निर्माण पर केंद्रित किया. इन स्थितियों में फिल्म प्रेमियों के पास या तो दूसरे दर्जे के वैनिटी प्रोजेक्ट या हॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्मों के पायरेटेड संस्करण देखने का विकल्प तक सीमित था.

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पाकिस्तान का भारतीय सिनेमा के प्रति रुख

भारतीय सिनेमा और कलाकार विभाजन के बाद बने पाकिस्तान में भी अत्यधिक लोकप्रियता पाते रहे और स्थानीय फिल्म जगत पर भारतीय सिनेमा हावी रहा और इसने प्रशंसकों के साथ साथ प्रतिद्वंद्विता रखने वाला एक वर्ग भी तैयार किया जो लगातार भारत की तरफ से किये जाने वाले तथाकथित 'संस्कृति पर आक्रमण' और स्थानीय फिल्म उद्योग के विकास का सबसे बड़ा अवरोधक बताकर भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करता रहा और भारत की फिल्मों पर प्रतिबंध का पहला अवसर तब आया जब साल 1965 में दूसरे भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद सैन्य शासक जनरल मोहम्मद अयूब खान ने यह कदम उठाया और भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन रोक दिया गया .

आने वाले वर्ष राजनैतिक रूप से अत्यधिक उतार चढ़ाव भरे रहे. अयूब खान के बाद जनरल याहया खान का सत्ता में आना और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर क्रांति के प्रादुर्भाव ने साल 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध अनिवार्य बना दिया जिसका परिणाम बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र देश का निर्माण था.

AP/PTI


जनरल मोहम्मद ज़िया-उल-हक के राष्ट्रपति काल में जहाँ स्थानीय सिनेमा उद्योग के संकटों को और बढ़ा दिया था, वहीँ दूसरी ओर गैर इस्लामी तत्वों के निषेध और इस्लामी अतिनैतिकतावादी नीतियों के चलते भारतीय फिल्मो के प्रदर्शन पर लगा प्रतिबंध जारी रहा. साल 1988 में जिया उल हक की मृत्यु के बाद हालाँकि लोकतान्त्रिक सरकारे अस्तित्व में आईं पर देश में राजनैतिक स्थिरता का अभाव बना रहा और साल 1999 में एक बार फिर सत्ता सैन्य शासक के हाथों में चली गई. ये जनरल मुशर्रफ का शासनकाल ही था जब भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर चला आ रहा प्रतिबंध समाप्त किया गया.

तुर्की सहित अन्य भाषाई फिल्मों के डब संस्करणों को पेश करने के कई प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान में बॉलीवुड फिल्म दर्शकों की प्राथमिक पसंद रही है. भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन न होना पाकिस्तान के सिनेमा घरों के लिए अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर देता है क्योंकि पाकिस्तान अभी तक हर हफ्ते सिनेमाघरों को चलाने के लायक पर्याप्त फिल्मों का निर्माण और वितरण करने में सक्षम नहीं है .

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प्रतिबंध का प्रभाव

26 फरवरी को भारतीय वायु सेना के हवाई हमले के बाद भारतीय फिल्मों पर लगाए गए प्रतिबंध से पूर्व पाकिस्तान एक बार साल 2016 में भी ऐसा कदम उठा चुका है जब जम्मू-कश्मीर के उरी में एक सेना शिविर पर एक घातक आतंकवादी हमले के बाद भारत से संबंध तनावपूर्ण हो गए थे , और जिसे अंततः दिसंबर 2016 में रद्द कर दिया गया.

पाकिस्तान का फिल्मोद्योग अल्पविकसित अवस्था में है और यह घरेलू मांग पूरी करने में भी सक्षम नहीं है. साल 2018 में केवल 21 पाकिस्तानी फिल्में रिलीज हुईं. वहीं साल 2017 में, पूरे पाकिस्तान में केवल 129 स्क्रीन थीं. जो पाकिस्तान के सिनेमा उद्योग के अति सूक्ष्म आकार का प्रदर्शन करता है जो उसके जीवंन क्षमता के लिए संकट का कारण है. प्रति दस लाख पाकिस्तानी आबादी के लिए लगभग 0.62 स्क्रीन ही उपलब्ध हैं हैं. वहीँ प्रति दस लाख अमेरिकियों के लिए 126, ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए 87, चीनी के लिए 39 और भारतीयों के लिए 12 स्क्रीन उपलब्ध हैं . यह आंकड़े दिखाते हैं कि कैसे यह संख्या फिल्मों में किये जाने वाले निवेश और उनकी उत्पादन गुणवत्ता को प्रभावित करती है.

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वर्तमान संख्या के स्क्रीन को सफलता पूर्वक संचालित करने के लिए जितनी फिल्मों के निर्माण की आवश्यकता है वह पाकिस्तान निर्मित ही नहीं कर पा रहा है वहीँ भारतीय फिल्म उद्योग की सफलता इसके व्यापक निर्माण और वितरण के नेटवर्क में ही निहित है. डेलॉइट की रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 तक, भारत में 6,000 सिंगल स्क्रीन और 2,100 मल्टीप्लेक्स थे. फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार, साल 2018 में विभिन्न भाषाओं में 1813 फिल्में भारत के केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित होने में सफल रही. पाकिस्तान में सिनेमाघरों के कुल राजस्व का लगभग 70 प्रतिशत बॉलीवुड की फिल्मों के व्यवसाय से आता है इसलिए, पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रतिबंध से इस देश में मनोरंजन उद्योग को भारी नुकसान होने की आशंका है.

कई स्थानीय प्रोजेक्ट्स बंद कर दिए गए

यही नहीं, पाकिस्तान सरकार के फैसले के कारण कई स्थानीय प्रोजेक्ट्स बंद कर दिए गए हैं और मल्टीप्लेक्स विकास परियोजनाओं को लगभग खत्म ही कर दिया है . यह जिया के दिनों की वापसी, और उस दौर की याद दिलाता है जब सिनेमाघर बंद किये जा रहे थे और उन्हें शॉपिंग मॉल या अपार्टमेंट में परिवर्तित किया जा रहा था. वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय फिल्म उद्योग साल भर में 100 से अधिक फिल्मों का पाकिस्तान में निर्यात और प्रदर्शन कर 700-800 अरब रुपये सालाना तक की कमाई करता हैं, और प्रतिबंध के बाद इस मोटी कमाई से वंचित होना भारतीय फिल्म उद्योग के लिए भारी आर्थिक क्षति पहुंचा सकता है.



भारतीय फिल्म उद्योग के विश्लेषकों के अनुसार एक भारतीय ब्लॉकबस्टर फिल्म पाकिस्तान में भारतीय बॉक्स ऑफिस की तुलना में चार से छह प्रतिशत तक की कमाई ही कर पाती है और जबकि एक साधारण फिल्म के लिए यह और भी कम है. एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में औसतन बॉलीवुड फिल्में लगभग 4-7 करोड़ रुपये कमाती हैं. परन्तु यह क्षति आंशिक ही है और पाकिस्तान को होने वाले नुक्सान की तुलना में नगण्य ही है. पाकिस्तान वैसे भी भारतीय फिल्मों के विदेशी क्षेत्रों से होने वाली कमी के मामले में पसंदीदा गंतव्य कभी भी नहीं रहा है.

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सिनेमा उद्योग संकट के दौर से गुज़र रहा

इन प्रतिबंधों के बाद पाकिस्तान का सिनेमा उद्योग जिस संकट के दौर से गुज़र रहा है वह अतुलनीय है. पाकिस्तान असोसिएशन ऑफ़ फ़िल्म एक्ज़ीबिटर्स का कहना है कि अब स्थिति और भी खराब हो गई है क्योंकि सरकार तो भारतीय फ़िल्मों की रिलीज़ पर प्रतिबंध लगा रही थी पर पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने एक क़दम और आगे बढ़ते हुए आदेश दे डाला कि भारत से जुड़ी कोई भी सामग्री प्रसारित नहीं होगी यहां तक कि स्थानीय चैनल पर भी नहीं. यह प्रतिबंध भारतीय विज्ञापनों, धारावाहिकों और यहां तक की फ़िल्मों पर भी लागू होता है. अब ऐसी स्थिति में पाकिस्तान में दर्शकों को दिखाने के लिए सामग्री का टोटा हो चला है.

एक पाकिस्तानी फिल्म का पोस्टर


उल्लेखनीय है कि पिछले साल पाकिस्तान में 16 उर्दू फ़िल्में रिलीज़ हुईं. उर्दू फिल्मों का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि यही वे फ़िल्में हैं जो पूरे पाकिस्तान में राष्ट्रव्यापी रिलीज के लिए उपलब्ध हैं, क्योंकि पंजाबी और पश्तो फिल्मों का उनके क्षेत्रों से बाहर कोई कोई वजूद नहीं रहा है. इसी प्रकार का हाल टेलीविज़न के साथ भी होने जा रहा है. पाकिस्तान के मनोरंजन जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि भारतीय सिनेमा और धारावाहिकों को पसंद करने वाले पाकिस्तान में बहुत से लोग हैं लेकिन 'देशभक्ति' के चलते वो इस प्रतिबंध के समर्थन में हैं परन्तु वहीँ दूसरी ओर पाकिस्तान में स्थापित सत्य है कि 'पाकिस्तान का बॉक्स ऑफ़िस बचा रहे इसके लिए भारतीय सिनेमा का होना जरूरी है.'

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(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं )
First published: July 6, 2019, 3:26 PM IST
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