OPINION: कांग्रेस के खिलाफ डर फैलाकर वोटरों को साधने में जुटी बीजेपी

पार्टी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा अब भी जारी है. खास कर नरेंद्र मोदी ने बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में 2019 के लिए 'अजेय भारत, अटल बीजेपी' का नारा दे कर लोगों में राष्ट्रीयता की भावना ला दी है.

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Updated: September 11, 2018, 10:58 AM IST
OPINION: कांग्रेस के खिलाफ डर फैलाकर वोटरों को साधने में जुटी बीजेपी
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो)
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Updated: September 11, 2018, 10:58 AM IST
(भवदीप कंग)

पिछले दिनों बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कहा गया कि 2019 चुनाव की लड़ाई मोदी बनाम माओवादी-आतंकवादी समर्थक कांग्रेस के बीच है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के शब्दों में कहा जाए तो चुनाव में टक्कर- भारत को बनाने वाले और भारत को तोड़ने वालों के बीच होगी.

अब तक के कामकाज में कमियों को नजरअंदाज करते हुए पार्टी नेतृत्व ने एक बार फिर से आत्मविश्वास दिखाते हुए 2014 के वादे को दोहराया. साथ ही पार्टी ने वोटरों को भी ये चेतावनी दी कि वो विपक्षी महागठबंधन के झांसे में न आए, जो अलग-अलग विचारधारा के होने के बावजूद सत्ता के लिए भूखे हैं.

बीजेपी मतदाताओं की साइकोलॉजी के सहारे फील गुड फैक्टर (अच्छा माहौल बनाने की कोशिश) में जुटी है. जबकि महागठबंधन के खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है. बीजेपी ने मैक्रो-इकोनॉमिक इंडिकेटर पेश किया जबकि पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतें और रुपये में लगातार गिरावट को नजरअंदाज किया गया. बताया गया कि साल 2022 तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए भारत का निर्माण करेंगे जो गरीबी, आतंकवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त होगा.

पार्टी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा अब भी जारी है. खास कर नरेंद्र मोदी ने बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में 2019 के लिए 'अजेय भारत, अटल बीजेपी' का नारा दे कर लोगों में राष्ट्रीयता की भावना ला दी है. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी का नाम ऐसे जगह पर लिया जो अनुसिचित जाति के सबसे बड़े नेता बीआर आंबेडकर को समर्पित है. ये बीजेपी की एक सोची समझी रणनीति थी. दरअसल इन दिनों एससी / एसटी ऐक्ट को लेकर बीजेपी को ऊंची जाति के लोग की नाराजगी झेलनी पड़ रही है, ऐसे में उन्हें शांत करने की ये एक कोशिश थी.

इसमें सबसे अहम चीज़ थी विपक्षी दल को लेकर लोगों में डर को खत्म करना. कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे बीजेपी की असुरक्षा और निराशा के तौर पर देख रहे हैं. लेकिन बीजेपी की ये एक चालाक चुनावी रणनीति है. इससे वोटरों की साइकोलॉजी पर असर पड़ता है. इसका लक्ष्य है अपने प्रतिद्वंद्वियों को घृणा और संदेह की भावना से देखना.

महागठबंधन के बारे में बीजेपी का कहना है कि ये 'नज़रों का धोखा' है जो वोटरों को मूर्ख बनाने काम करेगी. मोदी का कहना है कि ये महागठबंधन एक नकली गठबंधन है. उन्होंने कहा,  ''महागठबंधन में नेतृत्व का पता नहीं, नीति अस्पष्ट है और नियत भ्रष्ट है.''

दूसरे शब्दों में कहे तो ये ऐसे नेताओं का जमावड़ा है जिनका कोई विज़न नहीं है उन्हें सिर्फ सत्ता से प्यार है. ऐसे में वोटरों को इनसे दूर रहना चाहिए. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि महागठबंधन कुछ भी नहीं बल्कि सिर्फ 'मोदी रोको अभियान है'.

लोगों में डर पैदा करने के लिए बीजेपी नेतृत्व ने कहा कि कांग्रेस के तार लेफ्ट माओवादी-आतंकवादी गठबंधन के साथ जुड़े हैं. ये वो ताकते हैं जो सामाजिक सद्भाव को खत्म कर सकती है. बीजेपी राहुल गांधी को 'कैलाश मानसरोवर' के सामने नहीं बल्कि 'शहरी नक्सलियों' के साथ देखती है.

अमित शाह के निशाने पर दो तरह के लोग है. पहला वो जो अलग-अलग विचारधारा के हैं लेकिन मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए वो एक हो गए हैं. दूसरा ऐसे लोग जिन्हें माओवादियों से प्यार है.

बीजेपी ने '48 साल के मुकाबले 48 महीने का नारा दिया है'. बीजेपी लोगों को ये बताना चाहती है कि उसने 2014 के वादे को पूरा करने के लिए लगातार काम किया है, लेकिन पुरानी दिक्कतों को खत्म करने के लिए उन्हें एक और टर्म की जरूरत है.

बीजेपी नेतृत्व को ये अच्छी तरह पता है कि हिंदी बेल्ट में और ज़्यादा वोटों के लिए उन्हें कई मुद्दों पर जम कर मेहनत करनी होगी. इसमें नेतृत्व (करिश्मा), जाति, समुदाय, उम्मीदवार और आर्थिक कल्याण शामिल है.

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