OPINION: कोरोना संकट से बढ़ेगी बाल मजदूरी और बच्चों की ट्रैफिकिंग

कोरोना संकट में बढ़ेगी बाल मजदूरी (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कोरोना संकट (Corona Crisis) में महानगरों में घरेलू नौकरानियों की बहुत मांग होती है. 10-12 साल की बच्चियों को दलाल लाकर लोगों को बेच देते हैं. यह सब अवैध प्लेसमेंट एंजसियों की आड़ में होता है.

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    'अनिल पांडेय'
    आज अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम विरोधी दिवस है. यह बाल श्रम विरोधी दिवस ऐसे समय पर मनाया जा रहा, जब पूरी दुनिया एक ऐसी महामारी से जूझ रही है, जिसकी वजह से जनजीवन से लेकर कारोबार तक ठप है. दुनिया आर्थिक संकट की चपेट में है. बड़े पैमाने पर गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने की आशंका जाहिर की जा रही है. इन सब परिस्थितियों का असर बच्चों पर पड़ना तय है. वंचित और समाज के हाशिए के बच्चे कोरोना संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं. वे बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग के शिकार होंगे. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक, इस समय दुनिया में करीब 15 करोड़ बाल मजदूर हैं और भारत में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है.

    भारत की जनगणना-2011 के मुताबिक, देश में एक करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर हैं. गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या तकरीबन पांच करोड़ है. जबकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर दिन करीब 16 बच्चे ट्रैफिकिंग का शिकार होते हैं. जिन्हें जबरिया बाल मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, भिखमंगी आदि के लिए खरीदा-बेचा जाता है. आने वाले दिनों में इन आंकड़ों में और इजाफा होगा. इसकी दो वजह है. एक तो कोरोना महामारी की वजह से आर्थिक संकट और दूसरा लॉकडाउन की वजह से अप्रवासी मजदूरों की गांव वापसी.

    कोरोना महामारी और उससे उपजी स्थितियों की वजह से कारोबार और उद्योग जगत की कमर टूट चुकी है. लिहाजा, छोटे कारोबारी अपने घाटे को कम करने के लिए सस्ते श्रम की मांग करेंगे. ऐसे में वे अपने यहां वयस्कों की बजाए बाल मजदूरों से काम कराएंगे. बाल मजदूरी की वजह यही है कि वे बहुत सस्ता श्रम होते हैं. अक्सर मालिक मां-बाप को एक मुश्त रकम देकर बच्चे को बंधुआ मजदूर बना लेता है. अंसगठित क्षेत्र में काम करने वाले करीब 39 करोड़ मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है. इनमें से बहुत से अपने गांव वापस आ गए हैं. जब ये बेरोजगार होकर भुखमरी के कगार पर पहुंचेंगे तो अपने बच्चों को स्कूल छुड़वाकर बाल मजदूरी करवाने के लिए मजबूर होंगे.

    गरीबी प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर बच्चों को खरीदने-बेचने वाले दलाल और ट्रैफिकर सक्रिय हो गए हैं. दलाल गांव लौटे और भुखमरी के कगार पर पहुंचे गरीब मजदूरों को चिन्हित कर उनके पास पहुंच रहे हैं. उन्हें अग्रिम राशि देकर उनके बच्चों खासकर बेटियों का सौदा कर रहे हैं. बाद में वे उन्हें शहरों में ले जाकर कारखाना मालिकों, घरेलू नौकरानी के लिए मालिकों और चकलाघर चलाने वालों को बेच देंगे. इससे बच्चों के ट्रैफिकिंग के अवैध कारोबार में और बढोत्तरी होगी.

    कोरोना संकट में घरेलू नौकरानियों की मांग बढ़ी

    महानगरों में घरेलू नौकरानियों की बहुत मांग होती है. 10-12 साल की बच्चियों को दलाल लाकर लोगों को बेच देते हैं. यह सब अवैध प्लेसमेंट एंजसियों की आड़ में होता है. कोरोना महामारी के बाद अचानक से घरेलू नौकरानियों की मांग बहुत बढ़ गई है. कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से लोगों ने पार्ट टाइम की जगह फुलटाइम घेरेलू नौकरानियों की तलाश शुरू कर दी है.

    ज्यादातर ट्रैफिकर खुद ही प्लेसमेंट एंजेसी चलाते हैं और गावों और दूरदराज इलाकों में दलालों का नेटवर्क बना लेते हैं. प्लेसमेंट एंजसियों की आड़ में इन लड़कियों से वेश्वावृत्ति भी कराई जाती है. क्योंकि इसमें ज्यादा कमाई होती है. प्लेसमेंट एंजेंसी के मालिक खुद भी इन लड़कियों का शोषण करते हैं. मालिक के घरों में तो इनके साथ यौन शोषण आम बात है. दुखद है कि सुरक्षा एजेंसियों को प्लेसमेंट एंजेसियों के पूरे गोरखधंधे की जानकारी होने के बावजूद इन पर शिकंजा कसने के लिए कोई कानून नहीं है. दिल्ली में चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय के सुझाव के लिए सुप्रीस कोर्ट के रिटायर जस्टिस एससी वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था. इस कमेटी ने भी अपनी जांच में पाया कि प्लेसमेंट एजेंसियों की आड़ में नाबालिक लड़कियों का शोषण किया जाता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा शोषण और बलात्कार की शिकार एक लड़की का ब्यौरा भी दिया. जस्टिस वर्मा कमेटी ने सरकार को प्लेसमेंट एजेंसियों की आड़ में चल रहे गोरखधंधे का खुलासा करते हुए इसके रेगुलेशन के लिए कानून बनाने का सुझाव भी दिया. नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) जैसे संगठन लंबे समय से प्लेसमेंट एजेंसी रेगुलेशन एक्ट की मांग कर रहे हैं.

    दिल्ली में करीब 5000 प्लेसमेंट एजेंसियां 

    देश में केवल छत्तीसगढ़ राज्य ने अपने यहां प्लेसमेंट एजेंसियों के रेगुलेशन के लिए कानून बनाया है. कुछ राज्यों ने थोड़ा-बहुत नियम कानून बनाया है. लेकिन उस पर भी सख्ती से अमल नहीं किया जाता. बीबीए की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट के निर्देश के करीब दशक भर बाद भी दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी के रेगुलेशन के लिए कोई कानून नहीं बना है. हां, एक शासनादेश से यह नियम जरूर बना दिया गया कि प्लेसमेंट एजेंसी संचालक को इसे शॉप एंड कॉमर्शियल इस्टेब्लिसमेंट एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होगा. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में करीब 5000 प्लेसमेंट एजेंसियां हैं. जबकि इसमें से एक तिहाई भी कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड नहीं हैं.

    बाल मजदूरी को रोकना है तो इसके जड़ पर प्रहार करना होगा. चाहे कारखानों में काम कराने के लिए बाल मजदूर लाए जाते हैं या फिर प्लेसमेंट एजेंसियों की आड़ में घरेलू नौकरानी के लिए मासूम लड़कियों को लाया जाता है, ये सब दलालों द्वारा ट्रैफिकिंग के जरिए ही लाए जाते हैं. इसलिए हमें एक मजबूत एंटी ट्रैफिकिंग कानून की जरूरत है. इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात जिस पर सरकार को उचित कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को घरेलू बाल मजूदूरी को भी खतरनाक कामकाज की श्रेणी में शामिल कर 18 साल से कम उम्र तक के बच्चों को इसके लिए प्रतिबंधित करना चाहिए. मौजूदा कानून के मुताबिक 14 से 18 साल तक के बच्चे खतरनाक उद्योगों को छोड़ कर बाकी जगह सशर्त काम कर सकते हैं. इस खतरनाक उद्योगों की सूची में फिलहाल घरेलू बाल मजदूरी शामिल नहीं है.

    कोरोना काल में बच्चों को शोषण से बचाने के लिए सरकार को जो महत्वपूर्ण कदम उठाना चाहिए, वह यह कि सभी गरीबों और बेरोजगार हुए मजदूरों को राहत पैकेज और कल्याणकारी योजनाओं का अधिकतम लाभ मिल सके. केंद्र सरकार को निजी ऋणदाताओं द्वारा गरीबों को दी जाने वाली ब्याज दर की ऊपरी सीमा को निर्धारित करने के साथ ही उन्हें राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा मामूली ब्याज दर पर आसानी से कर्ज उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी करनी चाहिए. गांव पहुंचे मजदूर जीवन यापन के लिए स्थानीय कारोबारियों और साहूकारों से भारी ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए विवश होंगे. कर्ज न चुकता करने पर ये और इनके बच्चे बंधुआ मजदूर बन जाएंगे. साथ ही ट्रैफिकिंग को रोकने के लिए सरकार को गांव में “माइग्रेशन रजिस्टर” की व्यवस्था करनी चाहिए. अगले 6 महीने तक किसी भी बच्चे को माता-पिता या फिर कानूनी अभिभावक के बगैर गांव छोड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

    श्रम विभाग को तालाबंदी खुलने के बाद विनिर्माण इकाइयों और घरेलू कामकाज पर अगले दो साल तक विशेष निरीक्षण अभियान चलाना चाहिए और बाल श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करना चाहिए. गरीब मासूम बच्चियों के शोषण का पर्याय बन चुकी प्लेसमेंट एंजेसियों पर नकेल कसने के लिए सरकार को फौरन एक रेगुलेशन एक्ट बनाना चाहिए. कोरना संकट से हमें पूरी एक पीढी को बचाना है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे बाल मजदूर और घरेलू नौकर बनने की बजाए स्कूल जाएं. उनके हाथों में औजार नहीं, बल्कि कलम और किताबे हों.

    (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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