Opinion- सहयोगियों के बीच DMK की विश्वसनीयता से तय होगा स्टालिन का कद!

Opinion- सहयोगियों के बीच DMK की विश्वसनीयता से तय होगा स्टालिन का कद!
डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन

इस विचार धारा की लड़ाई में, विरोधी दल द्रमुक को अनिवार्य रूप से चुनौती देंगे और स्टालिन को अपने विपक्षियों को हराने के लिए सहयोगियों की जरूरत होगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2018, 3:45 PM IST
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वीरराघव टी एम

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे कुछ हफ्ते पहले जब भारत दौरे पर आए तो उन्होंने दावा किया कि साल 2009 में एलटीटीई के खिलाफ जंग में तत्कालीन संप्रग सरकार ने लंका सरकार की मदद की थी. इस टिप्पणी पर तमिलनाडु में कड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई. संप्रग का हिस्सा रही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने राजपक्षे पर ना केवल तुरंत पलटवार किया बल्कि उन्हें 'मास मर्डरर' बताया. डीएमके का कहना है कि उसने उस जंग जोरदार विरोध किया था, जिसमें हजारों श्रीलंकाई तमिलों की मौत हो गई थी.

द्रमुक ने राजपक्षे पर सत्तारूढ़ बीजेपी के इशारों पर ये टिप्पणी करने का आरोप लगाया है. डीएमके ने आरोप लगाया कि सुब्रमण्यम स्वामी की सहायता से बीजेपी नेतृत्व ने ये टिप्पणी कराई. श्रीलंका और एलटीटीई के साथ भारत और द्रमुक के रिश्ते का एक लंबा गुप्त इतिहास है. ये बेहद संवेदनशील मुद्दा है, लेकिन राजपक्षे ने जिस समय में ये टिप्पणी की है, वो जरूर गौरतलब है.



राजपक्षे का ये बयान डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन के लिए किसी झटके से कम नहीं, जो अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं और खुद के साथ अपनी पार्टी को द्रविड़ और तमिल मूल्यों के पैरोकार के रूप में पेश कर रहे हैं. वो साफ तौर पर बीजेपी और नरेन्द्र मोदी के विचारों के विरोधी हैं. मौजूदा हाल में ऐसा लगता है कि डीएमके की लड़ाई 2019 के चुनावों में केवल AIADMK नहीं बल्कि एक बड़े राष्ट्रीय और वैचारिक विरोधी बीजेपी से होगी. इसीलिए  डीएमके ने ये कहने में कोई देर नहीं की कि राजपक्षे जो कुछ कह रहे हैं, वो उनसे बीजेपी के जरिए कहवाया जा रहा है ताकि तमिल संरक्षक की उनकी इमेज को ठेस पहुंचे.
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स्टालिन को उम्मीद है कि वह दिवंगत पिता एम करुणानिधि की तरह खुद को तमिलों के नेता के रूप में स्थापित कर सकेंगे और उस अन्नाद्रमुक को जवाब दे सकेंगे, जो जयललिता के निधन के बाद कमजोर पड़ी है, उसके पास कोई दमदार नेतृत्व भी है, फिलहाल  पास मजबूत नेतृत्व नहीं है. फिलहाल वो बीजेपी की मदद से बची हुई लगती है.

द्रमुक का तर्क है कि द्रविड़ राजनीतिक मूल्यों में विश्वास रखने वाली किसी भी राजनीतिक दल से गठबंधन कर सकती है. यही वह जगह है जहां श्रीलंकाई तमिल मुद्दे पर उसकी विश्वसनीयता मायने रखती है, जिसे राजपक्षे ने चुनौती दी है.

बेशक ये चुनावी मुद्दा नहीं है, लेकिन इसने ये द्रमुक और स्टालिन के कद के साथ असर को भी प्रभावित करेगी. लिहाजा वो अपने छोटे जातियों के बीच आधार रखने वाली छोटी राजनीतिक तमिल पार्टियों को साथ लेकर चलना चाहती है.


मसलन शक्तिशाली अनुसूचित जाति के बीच आधार रखने वाली वीसेकी से स्टालिन से संपर्क किया है. वीसेकी का उत्तरी तमिलनाडु में दमदार आधार है और ये एलटीटीई का एक सशक्त समर्थक भी रहा है. डीएमके और यूपीए ने श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ जंग के दौरान क्या किया और क्या नहीं- ये बात शायद दोनों के बीच गठजोड़ में बाधक तो नहीं बनेगी लेकिन तब भी एक हल्का फुल्का कारक जरूर रहेगी.

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वैसे ये बात तमिल में हर दूसरी पार्टी के साथ दीख जाती है, जो जमीनी स्तर जातिगत आधार पर विरोधी होती हैं लेकिन एक बड़ी तमिल छतरी के नीचे मिल भी जाती हैं.

मिसाल के तौर पर, पीएमके के पास उत्तरी तमिलनाडु में एक मजबूत वन्नियार जाति का आधार है. वहीं वीसेकी का आधार अनुसूचित जाति का है. दोनों जातियों में अक्सर गंभीर संघर्ष होता है लेकिन वे द्रमुक के तहत गठबंधन का हिस्सा रहे हैं, साथ ही श्रीलंकाई तमिल मुद्दे पर एकजुट भी हैं.

यह बात दीगर है कि कांग्रेस, द्रमुक के साथ गठबंधन का हिस्सा बनने को लेकर निश्चिंत है लेकिन तमिलनाडु में इसकी चुनावी स्थिति राज्य में केवल एक छोटी पार्टी सरीखी होगी. इसके अलावा, करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद, छोटी पार्टियां भी राज्य में द्रमुक-एआईएडीएमके द्विध्रुवीय संरचना को चुनौती देने वाली ताकतों के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा को बढ़ावा देती हैं.

अब तक उन्हें सीटों के मामले में प्रभाव बनाने के लिए करुणानिधि या जयललिता के साथ सहयोग करना पड़ा था. वे इसमें बदलाव करने का इच्छुक होंगे, क्योंकि यदि स्टालिन किंग बन जाएंगे तो उनकी संभावनाएं सीमित हो जाएंगी.

मिसाल के तौर पर, पीएमके नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमणि रामदास ने खुद को संभावित मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया है. अंबुमणि की पार्टी ने बीजेपी के साथ गठबंधन में 2014 के लोकसभा चुनाव लड़ा था और साल 2016 के विधानसभा चुनावों में अकेले मैदान में उतरे थे.

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इसी तरह एमडीएमके का नेतृत्व वाइको कर रहे हैं. स्टालिन के साथ प्रतिद्वंद्विता के चलते उन्हें 1992 में द्रमुक छोड़नी पड़ी थी.


खुद ये पार्टियां अलग अलग शायद कोई प्रभाव नहीं डाल सकें लेकिन अगर वो स्टालिन के खिलाफ अपनी सेना एकजुट करते हैं तो द्रमुक को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इन पार्टियों और नेताओं में तमिल संरक्षक होने के कारण द्रमुक की भव्यता को चुनौती देने की क्षमता है.

यह देखते हुए कि तमिलनाडु की राजनीति में कमल हासन और रजनीकांत जैसे अभिनेताओं का आना मतदाताओं को रिझा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि फिलहाल स्टालिन को स्थिति को मजबूत करने और चुनावी अंकगणित बेहतर करने के लिए एक मजबूत गठबंधन की जरूरत है.

वास्तव में, स्टालिन ने साल 2016 के विधानसभा चुनावों में जयललिता के खिलाफ अकेले मैदान में उतरने की गलती की और हार गए. इसने जाहिर कर दिया कि उन्हें AIADMK को हटाने के लिए गठबंधन की जरूरत है. करुणानिधि का कद ऐसा था कि वो सभी ताकतों को साथ ला पाते थे लेकिन क्या स्टालिन एेसा कर सकते हैं?

इस विचारधारा की लड़ाई में, विरोधी दल द्रमुक को निश्चित तौर पर जबरदस्त चुनौती देंगे.  और स्टालिन को विपक्षियों को हराने के लिए सहयोगियों की जरूरत होगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनकी निजी राय है)

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