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'RCEP पर प्रधानमंत्री मोदी का फैसला उनकी गहरी राजनीतिक समझ को दिखाता है...'

News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 11:24 AM IST
'RCEP पर प्रधानमंत्री मोदी का फैसला उनकी गहरी राजनीतिक समझ को दिखाता है...'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकॉक में एक बैठक के दौरान RCEP पर फैसला लिया है.

यह भी कहा जा सकता है कि राजनीतिक अनिवार्यता की दुहाई देकर बड़ी हड़बड़ी में पैर पीछे खींच लिये गये. ये तमाम बातें तो बेशक कही जा सकती हैं लेकिन मसला इतने ही तक सीमित नहीं, बात कुछ और भी है.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 11:24 AM IST
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पिछले कुछ दिनों में RCEP समझौते (Regional Comprehensive Economic Partnership) को लेकर सरगर्मियां काफी ज्यादा थीं. विपक्षी दल इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ पार्टी को घेरने की कोशिश में थे. इसी बीच भारत ने इस समझौते में शामिल न होने का निर्णय लिया. प्रधानमंत्री (PM) नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) भारत की समस्याओं का संतोषजनक निपटारा न होने के चलते अपने पक्ष को लेकर पूरी तरह से मजबूत बने हुए थे, उन्होंने पहले भी कहा था कि भारत (India) के हितों Interest) के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा.

प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद उनके कुछ आलोचक भी इस मुद्दे पर उनके साथ खड़े दिखाई दिए हैं. समझौते में शामिल होने से इनकार करते हुए सोमवार को पीएम मोदी ने कहा था कि मेरा अंतर्मन इस समझौते में भारत के शामिल होने की इजाज़त नहीं देता, भारत इसका हिस्सा नहीं होगा.

राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज इंडिया पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने अंग्रेजी वेबसाइट द प्रिंट में लिखे अपने लेख में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले से अपनी गहरी राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उन्होंने लिखा है, ‘आरसीईपी से बाहर रहना सचमुच बहुत बड़ा फैसला है. अगर भारत इस समझौते में शामिल हो जाता तो दुनिया की तकरीबन आधी आबादी और विश्व की 35 फीसदी जीडीपी आरसीईपी के दायरे में चली आती. इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था के प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्रों में सालों से सक्रिय कई करोड़ नागरिकों पर होता.’

अपने लेख में योगेंद्र यादव ने यह भी लिखा है कि प्रधानमंत्री ने यह फैसला निजी तौर पर लिया होगा, क्योंकि अरुण जेटली के निधन के बाद उनके आसपास ऐसे लोग नहीं दिख रहे जिनकी आर्थिक मामलों में राय पर प्रधानमंत्री भरोसा कर सकें.

प्रधानमंत्री ने अपने फैसले के बाद दिए भाषण में कहा था- आज, जब हम RCEP पर पिछले सात सालों में हुई बातचीत को देखते हैं तो बहुत सी बातें, जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार की परिस्थितियां भी शामिल हैं, बदल चुके हैं. हम इन बदलावों को अनदेखा नहीं कर सकते. RCEP समझौते का वर्तमान स्वरूप इस समझौते की मूल भावना और RCEP समझौते के मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह से प्रदर्शित नहीं करते हैं. यह भारत के अलग मुद्दों और चिंताओं को भी इस स्थिति में संतोषजनक तरीके से नहीं उठाता है, ऐसे में भारत के लिए RCEP समझौते में शामिल होना संभव नहीं है.

योगेंद्र यादव ने अपने लेख में लिखा है, ‘आरसीईपी पर फैसला लेना बड़ा जटिल काम था. लाभ-हानि का आकलन कर पाना आसान नहीं था. कुछ लाभ तो बड़े स्पष्ट दिख रहे थे. सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा क्षेत्र के पेशेवर नजर गड़ाए बैठे थे कि उनके लिए संभावनाओं के नए द्वारा अब बस खुलने ही वाले हैं. लेकिन जो लाभ होते दिखे रहे थे उन्हें संभावित नुकसान के बरक्स तौलकर देखना भी जरूरी था. भारतीय विनिर्माताओं को डर सता रहा था कि चीन के बने सस्ते सामानों की एकबारगी बाढ़ आ जाएगी. खुदरा विक्रेताओं को डर था कि ई-कॉमर्स के क्षेत्र में भारी भरकम निवेश होगा और उनकी कारोबार की संभावनाएं और ज्यादा धूमिल होंगी.’

इनके अलावा, किसानों की चिंताएं थीं, जिसे लेकर किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे थे. डेयरी सेक्टर की अपनी चिंताएं थीं. इन सब के मद्देनजर भी पूरे देश की निगाहें प्रधानमंत्री की तरफ थीं कि वो कैसा फैसला करते हैं.
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योगेंद्र यादव लिखते हैं, ‘आरसीईपी में शामिल न होने का फैसला अपने स्वभाव में राजनीतिक है. आरसीईपी पर दस्तखत करने पर विपक्ष प्रधानमंत्री के खिलाफ गोलबंद हो जाता- आंदोलन और विपक्षी पार्टियां दोनों ही मोदी के खिलाफ एकजुट हो जाते. आरोप लगते कि किसान-विरोधी तथा छोटे व्यापारियों के विरोध की नीति अपनाई गई है. मैं आरसीईपी के बाबत लिए गए फैसले को राजनीतिक मिजाज का फैसला कहूंगा. अब इस बात पर नाक-भौं मत सिकोड़िए क्योंकि राजनीतिक फैसले आजकल शायद ही कहीं दिखाई देते हैं.’

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First published: November 6, 2019, 11:51 PM IST
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