Opinion: विपक्ष की जिद के कारण किसान आंदोलन में खत्म हुई बातचीत की गुंजाइश!


कृषि कानूनों के लेकर दिल्ली की सीमा पर किसान 2 महीने से ज्यादा वक्त से प्रदर्शन कर रहे हैं.

कृषि कानूनों के लेकर दिल्ली की सीमा पर किसान 2 महीने से ज्यादा वक्त से प्रदर्शन कर रहे हैं.

क्या आज के किसान नेतृत्व में यह नैतिक साहस हैं कि हिंसक हुए आंदोलन पर पर्दा डालकर अपनी जिद को ही जायज मान रहे हैं और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को अपने जिद और जुनून के बल पर झुकाने पर तुले हैं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 5, 2021, 5:23 PM IST
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क्या किसान आंदोलन और विपक्ष अब इस जिद पर आमादा हैं कि सरकार की बात भी नहीं सुनेंगे और संसद में चर्चा भी नहीं होने देंगे? क्या बातचीत से समाधान की गुंजाइश बिल्कुल खत्म हो गई हैं? आज दो महीने से ज्यादा समय से दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन से तो यहीं संकेत मिल रहा है. यह भी इतिहास का अजीब संयोग है कि आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में हुए शहादत की शताब्दी वर्ष की शुरुआत हो रहीं हैं.

उधर इस हिंसक घटना के विरोध में महात्मा गांधीजी ने बारदोली किसान सत्याग्रह आंदोलन को स्थगित कर दिया था. तब बारदोली के किसान सूखे की वजह से कम पैदवार और इस विपत्ति की घड़ी में ब्रिटीश हुकुमत द्वारा 35% टैक्स बढ़ाये जाने के विरोध में सरदार बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में लामबंद हुए, आज का किसान आंदोलन सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य देने और कृषि उपज समिति बहाल रखने के वादे पर भी भरोसा नही कर रहें हैं. आखिर इसमें दोष किसका हैं?

गांधीजी के किसी भी आंदोलन में सन् 1942 के करो या मरो के जिद को छोड़ कर, बातचीत की गुंजाइश कभी खत्म नहीं हुई. यहां तक कि उनके नेतृत्व में देश में जब पहला राजनीतिक आंदोलन रौलट एक्ट के विरुद्ध सन् 1919 में हुआ और पंजाब में यह आंदोलन हिंसक हो गया, तब गांधीजी ने न सिर्फ आन्दोलन स्थगित कर दिया, बल्कि उचित प्रशिक्षण के अभाव में हुई हिंसक वारदात की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए, इसे अपनी हिमालय जैसी गलती करार दिया.

क्या आज के किसान नेतृत्व में यह नैतिक साहस हैं कि हिंसक हुए आंदोलन पर पर्दा डालकर अपनी जिद को ही जायज मान रहे हैं और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को अपने जिद और जुनून के बल पर झुकाने पर तुले हैं? इस जिद से और कुछ हासिल हो न हो, लोकतंत्र के चेहरे पर खरोंच जरूर लग जाएगा और किसान आंदोलन पर वे सारी तोहमतें लगने लगेंगी, जो अब तक किसी भी जन आंदोलन पर लगते रहें हैं. क्या किसान आंदोलन के नेताओं को कुछ अभिनेताओं, अभिनेत्रियों, एन जी ओ मार्क चंद आंदोलनकारियो, पॉप गायिकाओ पर ज्यादा भरोसा हैं कि सरकार इनके दबाव अथवा प्रभाव में आकर झुक जाएगी? अव्वल तो ऐसा होना नहीं चाहिए. अगर ऐसा कुछ होता भी है, तो एक लोकतांत्रिक देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ हो नहीं सकता.
क्योंकि जिद और जुनून के आवेश के बजाय वाद विवाद और संवाद के जरिये किसी समस्या के समाधान तक पहुंचने की कोशिश किसी भी लोकतंत्र की खूबसूरती होती हैं और यहीं उसकी असली ताकत भी. हठ, जिद जुनून, पगड़ी उछाले जाने भय ठीक वैसे ही है, जैसे बिना देखे समझे,कोई कौवा किसानों का कान लेकर उड़ और किसान उस पर भरोसा भी कर रहें हैं. यहां याद आती हैं भारत के किसान आंदोलन एक बड़े नेता सर छोटू राम की यह बात कि ए किसान भोले पहले तो खुद अपनी बात करना सीख लें और अपने दुश्मन को ठीक से पहचान लें. बात दें कि सर छोटू राम संयुक्त पंजाब के जब राजस्व मंत्री थे, तब से पंजाब में कृषि मंडी कानून लागू है, जिसकी चर्चा आज हो रहीं है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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