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OPINION: हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव का साफ संदेश, गांधी परिवार के बिना भी चुनाव लड़ सकती है कांग्रेस!

News18Hindi
Updated: October 26, 2019, 10:11 AM IST
OPINION: हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव का साफ संदेश, गांधी परिवार के बिना भी चुनाव लड़ सकती है कांग्रेस!
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी की फाइल फोटो

हरियाणा (Haryana) और महाराष्ट्र (Maharashtra) विधानसभा चुनावों के परिणाम कई संदेश दे रहे हैं. पहली बार यहां गांधी परिवार ने बहुत कम प्रचार किया.

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  • Last Updated: October 26, 2019, 10:11 AM IST
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रशीद किदवई
एक मुहावरा है कि राजनीति में एक हफ्ता बहुत लंबा वक्त होता है. जिस तरह कांग्रेस अनिच्छुक और बीमार सोनिया गांधी को बदलने के लिए नए नेता को चुनने पर विचार कर रही थी, उसी दौरान हरियाणा विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन ने संकेत दे दिया है कि अंतरिम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) प्रमुख केवल भाग्यशाली नहीं हैं, बल्कि बेटे राहुल गांधी से बेहतर फैसले लेने का उन्हें उपहार मिला हुआ है.

भूपिंदर सिंह हुड्डा में सोनिया के विश्वास ने पार्टी में एक आसन्न विभाजन पैदा कर दी. अधिक महत्वपूर्ण शब्दों में समझे तो (भले ही हरियाणा में सरकार गठन के सवाल को छोड़ दें तो), इसने पार्टी में एक प्रमुख जाति 'जाटों' का विश्वास दोबारा हासिल कर लिया है.

पार्टी के पुराने नेता भीतर ही भीतर खुश हैं. इन नतीजों के बाद सोनिया को आसानी से अध्यक्ष छोड़ने नहीं देंगे. कांग्रेस की अंदरूनी सियासत से परिचित कोई भी व्यक्ति कहेगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी एक बार फिर से एक 'हॉबसन च्वाइस' का सामना कर रही है, जहां सोनिया की चाह बेटे राहुल को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपना है.

राहुल से कार्यशैली बदलने की उम्मीद
कांग्रेस के अधिकांश नेताओं को राहुल की नेतृत्व क्षमता से शिकायत नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि वे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएं. कांग्रेस के 87वें अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी पहले ऐसे प्रमुख थे, जिनका कार्यकाल सबसे कम रहा. इस दौरान पुराने और नई पीढ़ी के बीच पर्दे के पीछे बड़ा खींचतान दिखाई दिया.

कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हारती रही, लेकिन राहुल और उनकी कोर टीम ने पार्टी के एक वर्ग को दरकिनार किए रखा और कुछ नेताओं के सफल होने पर भी उनकी आलोचना की. 23 मई को लोकसभा परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद एआईसीसी प्रमुख ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी थी, उसमें यह झलक रहा था.
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देवड़ा, सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा
एआईसीसी प्रमुख का पद छोड़ते हुए राहुल ने कथित रूप से अशोक गहलोत, कमलनाथ, पी चिदंबरम और अन्य लोगों का नाम लिया, जिन्होंने कांग्रेस की मदद करने के बजाय अपने बेटों के चुनावी भाग्य पर अधिक समय और ध्यान दे रहे थे. नकुल नाथ और कार्ति चिदंबरम दोनों चुनाव जीते, लेकिन राहुल के समर्थक जैसे कि मिलिंद देवड़ा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा.

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का परिणाम कई मायने रखता है. पहली बार, यहां गांधी परिवार ने बहुत कम प्रचार किया.


उदाहरण के लिए असंतुष्ट कांग्रेसी यह भी बता सकते हैं कि जिन स्थानों पर राहुल ने हरियाणा (नूंह और महेंद्रगढ़) और मुंबई में प्रचार किया वहां पार्टी सीटें हार गई. सोनिया महाराष्ट्र में नौ जनसभाओं को संबोधित करने वाली थीं, लेकिन उन्होंने एक भी सभा नहीं की.

अब से गांधी के बिना चुनावी लड़ाई का सामना करने का साहस!
इन नतीजों के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि कांग्रेस नेता अब से गांधी के बिना चुनावी लड़ाई का सामना करने का साहस जुटा सकते हैं. अगर मराठा और जाट कांग्रेस में लौट सकते हैं तो देश के बाकी हिस्सों में यादव, रेड्डी, मीणा, पाटिल, गुर्जर, आदिवासी और अनुसूचित जाति क्यों नहीं?

राज्य के चुनाव पारंपरिक रूप से स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, लेकिन भाजपा ने जानबूझकर इसमें राष्ट्रवाद की त्योरी चढ़ाई. अनुच्छेद 370, पाकिस्तान विरोधी बयानबाजी सहित दूसरे मुद्दों की लंबी सूची है. इसे सफल माना जा रहा था.

फिर भी महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान संकट, हरियाणा के मानेसर में ऑटोमोबाइल निर्माताओं की दुर्दशा, नौकरियों में कमी और जाटों और मराठों जैसी प्रमुख जातियों में नाराजगी को नजरअंदाज करना बहुत साफ और घातक दिखा.


क्षेत्रीय क्षत्रपों में अधिक निवेश करने की जरूरत
कांग्रेस को अमरिंदर सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत और हुड्डा की तर्ज पर हर राज्य में क्षत्रपों में अधिक निवेश करने की जरूरत है. दक्षिण में 2004 और 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस का उत्कृष्ट प्रदर्शन काफी हद तक एकजुट आंध्र प्रदेश में दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी के कारण था. अगर कांग्रेस जगन मोहन रेड्डी और के. चंद्रशेखर राव को पार्टी में बनाए रखने में कामयाब होती, तो यह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों पर शासन कर रही होती.

कांग्रेस को नए नेतृत्व, संगठनात्मक सुधार और पार्टी पदानुक्रम के सभी स्तरों पर जवाबदेही तय करने की तत्काल आवश्यकता है और यह एकमात्र अवसर है जो उसके नेताओं के पास है. पार्टी कथित तौर पर अगले साल जनवरी में उदयपुर में एआईसीसी की बैठक की योजना बना रही है. राहुल को 2013 में जयपुर में जो वादा किया था, उसका खुलासा करने के लिए मंच का उपयोग करना चाहिए.

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के साथ फेलो हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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First published: October 26, 2019, 9:32 AM IST
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