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OPINION: 'राष्‍ट्रीय राजधानी में वकील ही बन गए हैं कानून, पुलिसकर्मी पर हमला करने से पहले एक बार भी सोचते'

OPINION: 'राष्‍ट्रीय राजधानी में वकील ही बन गए हैं कानून, पुलिसकर्मी पर हमला करने से पहले एक बार भी सोचते'

2 नवंबर को एक पुलिस कांस्‍टेबल ने एक वकील को जेल वैन की जगह पर कार पार्क करने से रोक दिया था. इसके बाद उन दोनों में कहासुनी हुई और वकीलों व पुलिसकर्मियों के हिंसक झड़प शुरू हो गई.

2 नवंबर को एक पुलिस कांस्‍टेबल ने एक वकील को जेल वैन की जगह पर कार पार्क करने से रोक दिया था. इसके बाद उन दोनों में कहासुनी हुई और वकीलों व पुलिसकर्मियों के हिंसक झड़प शुरू हो गई.

दिल्‍ली पुलिस के पूर्व आयुक्‍त (Ex-Police Commissioner) नीरज कुमार (Neeraj Kumar) ने कहा, निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि खुलेआम बर्बरता (Vandalism), आगजनी (Arson) या पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट (Assaulting) करते हुए कैमरे पर स्‍पष्‍ट नजर आ रहे एक भी वकील के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई (Punitive Action) नहीं की जाएगी. 2 नवंबर को तीस हजारी कोर्ट (Tis Hazari Court) के वकीलों और दिल्‍ली पुलिस (Delhi Police) के जवानों को बीच हिंसक झड़प हो गई थी.

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    नीरज कुमार

    नई दिल्‍ली. राष्‍ट्रीय राजधानी (National Capital) में तीस हजारी कोर्ट (Tis Hazari Court) के वकीलों और दिल्‍ली पुलिस (Delhi Police) के जवानों के बीच हुई हिंसक झड़प (Clashes) के वीडियो पूरी कहानी बयां कर रहे हैं. शायद उस दिन की घटना काफी नहीं थी, जो सोमवार को ऐसी ही एक और घटना हो गई. साकेत कोर्ट (Saket Court) के बाहर एक पुलिसकर्मी को विरोध कर रहे वकीलों (Lawyers) ने घेरा और उसके साथ धक्‍का-मुक्‍की की. इसे बाद बिना किसी उकसावे के उसे कई थप्‍पड़ जड़ दिए. वकीलों ने पुलिसकर्मियों के साथ कुछ ऐसा ही बर्ताव कड़कड़डूमा कोर्ट (Karkardooma Court) पर भी किया. 2 नवंबर को हिंसा भड़काने और आगजनी में शामिल लोगों के नाम पर या किसी की गलती बताकर साकेत और कड़कड़डूमा कोर्ट की घटनाओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

    पुलिसकर्मी पर हमले से पहले एक बार भी नहीं सोचते वकील
    सभी घटनाओं से स्‍पष्‍ट होता है कि राष्‍ट्रीय राजधानी में वकील खुद कानून बन गए हैं, जो ड्यूटी पर तैनात किसी पुलिसकर्मी पर हमला करने से पहले एक बार भी सोचना जरूरी नहीं समझते. बताया जा रहा है कि 2 नवंबर को एक पुलिस कांस्‍टेबल (Police Constable) ने एक वकील को जेल वैन (Jail Van) के लिए आरक्षित जगह पर कार पार्क करने से रोक दिया था. इसके बाद उन दोनों में कहासुनी हुई और कानून के दो स्‍तंभ काले कोट व खाकी वर्दी में हिंसक झड़प शुरू हो गई. घटना के वीडियो क्लिप्‍स (Video Clips) में साफ दिख रहा है कि वकील उस लॉकअप के गेट से लोहे की रॉड खींच रहे हैं, जहां डरे हुए पुलिसकर्मी सुरक्षा के लिए छुपे हैं. इसके बाद उन्‍होंने एक पुलिसकर्मी को खींचकर धराशायी होने तक पीटा.

    केस-काउंटर केस की जांच के लिए गठित कर दी गई SIT
    खुलेआम लोगों के सामने पुलिस वाहनों में आग लगा दी गई. वर्दी में तैनात पुलिस कर्मियों को बुरी तरह से पीटा (Assaulted) गया. इस मामले में पुलिस‍कर्मियों और वकीलों की शिकायतों (Complaints) के आधार पर केस-काउंटर केस (Cases-Counter Cases) दर्ज कर लिए गए हैं. दिल्‍ली पुलिस के एक विशेष आयुक्‍त (Special CP) और अतिरिक्‍त आयुक्‍त (ACP) का तबादला (Transfer) कर दिया गया है. कई पुलिस अधिकारियों को निलंबित (Suspend) कर दिया गया है. इस पूरी कार्रवाई का आधार अब तक स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है. एकदूसरे पर दर्ज मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया गया है.

    वकीलों और पुलिसकर्मियों की ओर से एकदूसरे पर दर्ज मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन कर दिया गया है.


    किसी वकील पर नहीं की जाएगी कोई दंडात्‍मक कार्रवाई
    यह कहा जा सकता है कि खुलेआम बर्बरता (Vandalism), आगजनी (Arson) या पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट (Assaulting) करते हुए कैमरे पर स्‍पष्‍ट नजर आ रहे एक भी वकील के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई (Punitive Action) नहीं की जाएगी. साफ है कि समाज का एक तबका कानून से ऊपर हो चुका है, जबकि कानून की रक्षा करने वाले लोग आसान शिकार बन रहे हैं. उनके लिए किसी की आंख में आंसू नहीं आते और वे खुद सख्‍त नियमों (Strict Rules) में बंधे हैं. इस पूरे घटनाक्रम से वकील या आम जनता (Common People) ही नाराज नहीं है, बल्कि पुलिस के सबसे बड़े विरोधियों ने भी वर्दी वालों की दुर्दशा पर गुस्‍सा जताया है.

    वकीलों ने पुलिसकर्मियों ही नहीं जजों को भी घेरा है
    ये पहली बार नहीं है जब वकीलों ने पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की है. साल 1980 में एक पुलिस अधिकारी (Police Officer) को वकीलों के कारण ऐसी ही हालत का सामना करना पड़ा था. इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्‍सों से भी ऐसी घटनाओं की सूचनाएं आती रहती हैं. ऐसे ही एक मामले में वकीलों ने एक हाईकोर्ट (High Court) को चारों ओर से घेर लिया था और मुख्‍य न्‍यायाधीश (Chief Justice) घंटों तक कोर्ट के अंदर फंसे रहे थे. इसके बाद सशस्‍त्र बलों (Armed Forces) ने मौके पर पहुंचकर चीफ जस्टिस को वहां से निकाला था. आपराधिक न्‍याय प्रणाली के एक हिस्‍से को छोड़कर दूसरे को हिंसा के साथ देखना घृणित नजरिया है. इससे पता चलता है कि कहीं कुछ गलत चल रहा है.

    इस पूरे घटनाक्रम से वकील या आम जनता ही नाराज नहीं है, बल्कि पुलिस के सबसे बड़े विरोधियों ने भी वर्दी वालों की दुर्दशा पर गुस्‍सा जताया है.


    हिंसा में शामिल लोग काबिल वकील तो नहीं होंगे
    ये तय है कि इस तरह की हिंसा में शामिल लोग काबिल वकील तो नहीं हैं. काबिल वकीलों के पास सड़क पर इस तरह की हिंसा के लिए वक्‍त ही नहीं होता है. कई बार ऐसी जानकारी मिलती है कि बार में आपत्तिजनक पृष्‍ठभूमि के वकील शामिल हैं. उनके पास फर्जी यूनिवर्सिटी की लॉ डिग्री होती है. बार काउंसिल के पदाधिकारी मतदान के जरिये चुने जाते हैं और उन्‍हें छूने की किसी में हिम्‍मत नहीं होती है. एक और उदाहरण है कि दिल्‍ली हाईकोर्ट आने वाले वकील नजदीक की सरकारी आवासीय कॉलोनियों में अपनी गाड़ियां पार्क करते हैं. इससे वहां रहने वाले लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है. दिल्‍ली हाईकोर्ट में मल्‍टीस्‍टोरी पार्किंग में भुगतान व्‍यवस्‍था होने के कारण वकील आसपास की कॉलोनियों में गाड़ियां खड़ी करने को तरजीह देते हैं.

    खाकी वर्दी वाले भी कानून से ऊपर नहीं हैं
    सवाल उठता है कि इस सबका समाधान क्‍या है? इसका जवाब है कि ऐसे वकीलों के खिलाफ सख्‍त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए. साथ ही सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्‍त जज की अध्‍यक्षता में गठित समिति बार में शामिल अराजक तत्‍वों की की पड़ताल करे. जांच के बाद संदिग्‍ध डिग्री और आपत्तिजनक पृष्‍ठभूमि वाले वकीलों को बार से बाहर का रास्‍ता दिखाया जाना चाहिए. बार एसोसिएशन को इसमें आगे बढ़कर काम करना चाहिए. इस सबका मतलब ये भी नहीं कि खाकी वर्दी वाले कानून से ऊपर हैं. वे भी हिंसा भड़काने वाले हालात पैदा करते रहे हैं. ऐसे वीडियो भी सामने आते रहे हैं, जिनमें पुलिसकर्मी असहाय आम नागरिकों को बुरी तरह पीट रहे हैं. ऐसे ही कई कारणों से आम लोग पुलिस वालों की इज्‍जत नहीं करते हैं.

    (लेखक दिल्‍ली पुलिस के पूर्व आयुक्‍त हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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    Tags: DELHI HIGH COURT, Delhi police, Neeraj kumar

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