किशनगंज से काशी तक मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है जीत की चाभी

दोनों शहरों के बीच 20 संसदीय क्षेत्र पड़ते हैं. इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 18 से 70 फीसदी के बीच है.

Asheet Kunal
Updated: April 17, 2019, 1:09 PM IST
किशनगंज से काशी तक मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है जीत की चाभी
भागलपुर में चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार.
Asheet Kunal
Updated: April 17, 2019, 1:09 PM IST
(अशोक मिश्रा )

पूर्वी बिहार में नेपाल, बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे सीमांचल के तीन मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्रों में इस बार चुनावी नारा 'पालेंद्री टोपी-सूर्यपुरी पिरहन एक हो' चल रहा है. इस नारे से साफ है कि स्थानीय मुस्लिम नेता कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज में अपने समुदाय के चार धड़ों को भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए प्रत्याशियों को हराने के लिए लामबंद करने की कोशिशों में जुटे हैं. स्थानीय मुस्लिम नेता चाहते हैं कि इन सीटों पर 18 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान में उनका समुदाय एकजुट होकर राजद-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशियों के पक्ष में वोटिंग करे.

क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग कुल्हिया मुसलमानों का है. अमूमन लोग उन्हें उनकी कुछ अलग सी दिखने वाली पालेंद्री टोपी से पहचानते हैं. वहीं, किशनगंज सीट पर बड़ा उलटफेर करने का दमखम रखने वाले सूर्यपुरी मुसलमान अपने लंबे कुर्ते पिरहन और खास अंदाज की बोली से पहचाने जाते हैं. क्षेत्र में रहने वाले शेरशाहाब्दी या भाटी पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल से आकर बसे हैं, जबकि पस्चीमा मुस्लिम बिहार के पश्चिमी जिले चंपारण, मुजफ्फरपुर और दरभंगा से आए हैं.

इस बार मुस्लिम सीमांचल की सियासत के केंद्र में हैं. दरअसल, क्षेत्र में अलग-अलग दलों से खड़े हुए नौ मुस्लिम प्रत्याशियों में पांच उम्मीदवार तीन सीटों पर ताल ठोक रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2014 में प्रमुख दलों ने बिहार में कुल 16 मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव लगाया था. इस बार क्षेत्र में खड़े हुए पांच प्रत्याशियों में कटिहार से कांग्रेस के तारिक अनवर और अररिया से राजद के सरफराज अहमद को हिंदू प्रत्याशियों से कड़ी चुनौती मिल रही है. वहीं, किशनगंज संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के मोहम्मद जावेद, जदयू के मोहम्मद अशरफ और एआईएमएआईएम के अखतरुल ईमान के बीच जबरदस्त मुकाबला दिख रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर किशनगंज के बीच मुस्लिम आबादी को देखते हुए कहा जा सकता है कि सीमांचल में जीत-हार का फैसला मुसलमान मतदाताओं के हाथों में है. भारत-नेपाल सीमा से सटे सीमांचल क्षेत्र में 20 संसदीय क्षेत्र हैं. इन क्षेत्रों में 18 से 70 फीसदी मुस्लिम आबादी है. यह क्षेत्र मुस्लिम राजनीति की प्रयोगशाला बन चुका है. हालांकि, इस क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे होने के कारण कई आतंकी माड्यूल भी सामने आ चुके हैं, जिनमें स्थानीय युवाओं की संलिप्तता पाई गई है.

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सांकेतिक फोटो.

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मुस्लिम वोटबैंक को नहीं बंटने देने की कोशिशें जारी 

बहुतायत मुस्लिम मतदाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विराध करते हैं. बावजूद इसके मुस्लिम नेता कोशिश कर रहे हैं कि उनके वोट किसी भी सूरत में नहीं बंटें. पिछले लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के आप नेता अरविंद केजरीवाल का समर्थन करने के बाद जदयू ने अपने प्रत्याशी अखतरुल ईमान का नामांकन भी वापस ले लिया था ताकि अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट होकर मोदी को सत्ता में आने से रोक सकें.

किशनगंज में कई प्रत्याशियों के कारण उलझन में वोटर्स 

मुस्लिम मतदाता इस बार भी बीजेपी के खिलाफ हैं, लेकिन किशनगंज सीट पर कई प्रत्याशियों के कारण वे उलझन में हैं. एआईएमआईएम प्रत्याशी ईमान जदयू-कांग्रेस प्रत्याशी को कड़ी चुनौती दे रहे हैं. पार्टी नेता असदुद्दीन ओवैसी ईमान के समर्थन में कई जनसभाएं कर चुके हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव 2015 में राजद सहयोगी के तौर पर अल्पसंख्यक मतों की खूब फसल काटी. बाद में बीजेपी की गोदी में जाकर बैठ गए.

अल्पसंख्यक वोट बंटा तो जदयू प्रत्याशी को होगा फायदा 

किशनगंज देश का अकेला लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां 70 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इस सीट पर 1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लखन लाल कपूर के अलावा कभी कोई हिंदू प्रत्याशी नहीं जीता. स्थानीय पत्रकार और अध्यापक रुस्तम राही का कहना है कि अगर किशनगंज में तीन मुस्लिम प्रत्याशी बने रहे तो अल्पसंख्यक वोट बंट जाएगा. इसका फायदा जदयू प्रत्याशी को मिलेगा, क्योंकि उन्हें करीब 30 फीसदी हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है. वह कहते हैं कि मुस्लिम नेता कांग्रेस या एमआईएम प्रत्याशी में किसी एक के समर्थन का फैसला मतदान के एक दिन पहले करेंगे.

ओवैसी लोगों का भरोसा जीतने की कर रहे हरसंभव कोशिश 

एकजुटता की कोशिशों के बीच सीमांचल के मुस्लिम मतदाता उहापोह की स्थिति में हैं. दरअसल, उन्हें रास्ता दिखाने वाले मौलाना अशरुल हक कासमी और मोहम्मद तस्लीमुद्दीन का पिछले साल निधन हो गया. उनके निधन के बाद मुस्लिम समुदाय अंधेरे में है. युवा नेताओं में अनुभव की कमी है. वे अपनी पार्टियों के इशारे पर फैसले लेते हैं. क्षेत्र के दोनों बड़े मुस्लिम नेताओं के निधन के बाद ओवैसी यहां के लोगों का भरोसा जीतने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. वे एक दशक से ज्यादा समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने विधानसभा चुनाव में भी राज्य की कई सीटों से अपने प्रत्याशी उतारे थे. किशनगंज के मोहम्मद मुद्दसर आलम का कहना है कि ओवैसी में दोनों नेताओं की जगह लेने की पूरी क्षमता है. वह सीमांचल और पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर जिले के मुस्लिमों के नेता बनना चाहते हैं.

सीमांचल में मुस्लिमों के हैं दो अहम मुद्दे 

सीमांचल की मुस्लिम सियासत दो अहम मुद्दों के इर्दगिर्द घूमती है. पहला, राजनीतिक दल उनके फायदे की क्या बात रहे हैं? दूसरा, सांप्रदायिक दंगों से उनकी सुरक्षा के मुद्दे पर पार्टी क्या करेगी? लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों दावा करते रहे हैं कि उन्होंने मुस्लिम हितों के लिए बहुत कुछ किया है. अब नीतीश के बीजेपी के साथ जाने और लालू के जेल में होने के कारण सीमांचल किसी बड़े नेता की सरपरस्ती की राह देख रहा है.

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