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Analysis: कोरोना के खौफ के बीच बिहार में चमकी बुखार से मर रहे बच्चे

News18Hindi
Updated: April 5, 2020, 11:47 AM IST
Analysis: कोरोना के खौफ के बीच बिहार में चमकी बुखार से मर रहे बच्चे
पिछले साल चमकी बुखा से बिहार में 185 बच्चों की मौत हो गई थी.

पिछले साल इस बीमारी से बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों के 185 बच्चों की मौत हो गई थी और 615 से अधिक बच्चे जगह-जगह बीमार पड़े थे.

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  • Last Updated: April 5, 2020, 11:47 AM IST
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पूरी दुनिया में फैले कोरोना वायरस (Coronavirus)  के कोहराम के बीच बिहार (Bihar)  में एक और खतरा सिर उठाये हुए है. यह पुराना खतरा है जो हर साल सैकड़ों बच्चों की जान ले लेता है. मगर इस साल कोरोना (Corona)  की दहशत इतनी है कि यह पुराना, जाना-पहचाना खतरा लोगों की ध्यान तक नहीं खींच पा रहा. इस सूचना के बावजूद कि इस साल भी इसका मौसम शुरू हो चुका है और पिछले एक सप्ताह में यह तीन बच्चों की जान ले चुका है.

चमकी बुखार (Chamki Fever) को मेडिकल साइंस एईएस यानी एक्यूट इम्यूनो सिंड्रोम कहता है. पिछले साल इस बीमारी से बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों के 185 बच्चों की मौत हो गई थी और 615 से अधिक बच्चे जगह-जगह बीमार पड़े थे. जो बच्चे मारे गए, सो तो मर ही गए, जो बचे हैं उनमें से भी एक तिहाई अभी अलग-अलग किस्म की सेहत संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं. ऐसी आशंका है कि कोरोना संक्रमण, लॉक डाउन और दूसरी तमाम वैश्विक मुसीबतों का सामना कर रहे बिहार को इस साल यह बीमारी कुछ और ही परेशान कर सकती है. दरअसल पिछले साल तक जब बच्चे बीमार पड़ते थे, उनके आस पड़ोस के लोग, ऑटो वाले या अन्य परिचित उन्हें अस्पताल पहुंचा देते थे. जहां डॉक्टरों की भरपूर कोशिश रहती थी कि उनकी जान बचाई जाए. क्योंकि तब स्थानीय चिकित्सकों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती थी, चमकी बुखार से निबटना. इस साल तो संक्रमण के खतरे और लॉकडाउन की सीमाओं के बीच कोई इन बच्चों की मदद के लिए सहज तैयार नहीं होने वाला है. स्वास्थ्य विभाग की भी पहली प्राथमिकता कोरोना वायरस है. फिर उनकी मदद कौन करेगा.

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29 मार्च, 2020 को इस बुखार से पीड़ित पहले बच्चे की मौत हुई थी.




पिछले साल के अनुभव और जमीनी सर्वेक्षण से यही बात समझ में आई है कि चमकी बुखार से पीड़ित होने वाले बच्चे ज्यादातर गरीब और वंचित समुदाय के होते हैं. सेंटर फॉर रिसर्च एंड डायलॉग द्वारा 227 पीड़ित बच्चों के परिवार के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक इनमें से 97.8 फीसदी परिवार की मासिक आमदनी 10 हजार रुपये से कम थी और 96.5 फीसदी बच्चे दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित थे. इनमें से ज्यादातर बच्चों के कुपोषित होने की बात कही जाती है. जाहिर सी बात है कि ऐसे परिवार इस गंभीर बीमारी का मुकाबला करने में अकेले सक्षम नहीं हो पाते, इन्हें सरकार और समाज दोनों का सहयोग चाहिए. जबकि इस बार दोनों सहयोग कितना मिल पायेगा, कहना मुश्किल है.



इस बीमारी में बच्चों के पास अमूमन छह से आठ घंटे का समय होता है, अगर इस अवधि में बच्चे अस्पताल पहुंच जाए और उनका इलाज शुरू हो जाए तो उनके बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है. मगर लॉकडाउन और कोरोना संक्रमण के इस दौर में किसी वंचित परिवार के बच्चों को तत्काल अस्पताल पहुंचाने में क्या समाज सहयोग कर पाएगा, क्या इस दौर में अस्पतालों में उसे तत्काल इलाज मिल पाएगा. यह बड़ा गंभीर प्रश्न है.

सरकार ने मौत के आंकड़ों को कम करने का किया था वादा
पिछले साल इस बीमारी से बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होने के बाद सरकार ने तय किया था कि इस साल वह बच्चों की मौत के आंकड़े को कम से कम करने की कोशिश करेगा. तय हुआ था कि मार्च महीने से ही इसके लिए जागरुकता अभियान चलाया जाएगा. पूरे क्षेत्र में सघन टीकाकरण होगा. चूंकि इस बीमारी का रिश्ता कुपोषण और बच्चों के रात में भूखे सोने से हैं तो इस संबंध में भी आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की मदद से अभियान चलाए जाने की बात कही गई थी. बच्चों को जल्द से जल्द अस्पताल लाने के लिए एंबुलेंस के अलावा दूसरे विकल्पों का इंतजाम होगा. मुजफ्फरपुर में 100 बेडों का स्पेशल पीकू वार्ड तैयार किया जायेगा. जागरुकता और बचाव के काम में विभिन्न संस्थाओं की मदद ली जायेगी. मगर दुर्भाग्य से सभी मंसूबे बंधे के बंधे रह गये. एक भी उपाय पूरा नहीं हो पाया.

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चमकी बुखार से अप्रैल में ही तीन बच्चों की मौत हो चुकी है.


लॉकडाउन की वजह से जागरूकता का काम ठप पड़ा
कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से जागरूकता का काम ठप पड़ा है. जापानी बुखार के टीकाकरण में घपलेबाजी सामने आ गई और कई बच्चों के छूटने की खबर है, उसे दुबारा शुरू नहीं कराया जा सका है. जिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और आशा वर्कर को इन बच्चों के बचाव के अभियान में जुटना था, वे कोरोना संक्रमितों की पहचान में लगी हैं. मुजफ्फरपुर में सिर्फ 38 सरकारी एंबुलेंस हैं, जिनमें आधे जर्जर बताई जा रही हैं. उन पर दोहरी जिम्मेदारी है. कोरोना की भी और चमकी बुखार की भी. जिले के हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो बेड का पीकू वार्ड तैयार किया गया था, उसे अब कोरोना आइसोलेशन वार्ड में बदल दिया गया है. पहले से ही कम मैनपावर की समस्या से जूझ रहा मुजफ्फरपुर के स्वास्थ्य विभाग का इस बार पूरा फोकस कोरोना संक्रमण से मुकाबले पर है.

लॉकडाउन की वजह से हर काम रुका
100 बेडों का स्पेशल पीकू वार्ड अभी भी बन ही रहा है. लॉकडाउन की वजह से काम रुका हुआ है. जागरुकता और बचाव के लिए अभियान चलाने का प्रण करके बैठी संस्थाओं को खुद समझ नहीं आ रहा कि क्या करें और कैसे करें. इस बीच में मार्च के दूसरे-तीसरे सप्ताह से ही चमकी बुखार के बच्चे अस्पताल में एडमिट होने लगे हैं. 29 मार्च, 2020 को इस बुखार से पीड़ित पहले बच्चे की मृत्यु हो गयी, फिर तीन अप्रैल को दो अन्य बच्चों की मौत हो गयी. इस बीच रोज किसी न किसी बच्चे के एडमिट होने की खबर आ रही है. चार अप्रैल को भी एक बच्चा एडमिट हुआ है.

इस बार नए इलाकों में पैर पसार सकता है चमकी बुखार
इस बार चमकी बुखार के नये इलाके में पांव पसारने की भी खबर है. अमूमन इस बीमारी से मुजफ्फपुर और आसपास के जिले के बच्चे पीड़ित होते थे, इस साल नालंदा जिले से भी तीन बच्चों के इस बीमारी की चपेट में आने की खबर है. जिसमें एक की मौत भी हो गयी है. सरकार इन इलाकों में चमकी बुखार को लेकर कोई तैयारी नहीं करती.

अप्रैल में ही हो चुकी है तीन बच्चों की मौत
कोरोना संक्रमण के इस भीषण दौर के बीच ये खबरें विचलित करती हैं. बिहार सरकार, राज्य के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव और मुजफ्फरपुर का जिला प्रशासन बार-बार दावा करता है कि इस बार चमकी बुखार को लेकर कोई कोताही नहीं बरती जायेगी. कोरोना की वजह से चमकी बुखार से बीमार बच्चों की उपेक्षा नहीं होगी. मगर जमीनी हालात इस बात का समर्थन नहीं कर पाते. अप्रैल महीने में अमूमन चमकी बुखार शुरुआती दौर में ही रहता है, इसका बड़ा खतरा मई औऱ जून महीने में होता है. मगर इस साल अप्रैल में ही तीन बच्चों के मरने की खबर आ गयी है. इसलिए सरकारी दावा बहुत आश्वस्त नहीं करता. खुद समाज के पांव भी बंधे हैं, ऐसे में समझ नहीं आ रहा कि यह बीमारी बिहार के गरीब और वंचित बच्चों पर कितना कहर बरपायेगी और हम उनकी जान बचा पाने में कितने सक्षम हो पायेंगे.

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First published: April 5, 2020, 11:06 AM IST
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